FDA ने हेपेटाइटिस बी की नई दवा 'हिबसागो' को मंजूरी दी, 24% मरीज एंटीवायरल थेरेपी बंद करने में सफल
सारांश
मुख्य बातें
अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) ने 21 अक्टूबर 2026 को क्रोनिक हेपेटाइटिस बी के इलाज के लिए एक नई इंजेक्शन-आधारित दवा 'हिबसागो' (बेपिरोविरसेन) को मंजूरी दी है। GSK PLC द्वारा विकसित यह दवा उन वयस्क मरीजों के लिए स्वीकृत की गई है जिन्हें सिरोसिस नहीं है और जो पहले से एंटीवायरल थेरेपी ले रहे हैं। क्लिनिकल ट्रायल के अनुसार, इस दवा को लेने वाले 24 प्रतिशत मरीज निर्धारित मानदंड पूरे होने पर अपनी एंटीवायरल दवाएं बंद करने में सफल रहे।
हिबसागो क्या है और यह कैसे काम करती है
हिबसागो हेपेटाइटिस बी के लिए FDA द्वारा स्वीकृत पहला 'एंटीसेंस ओलिगोन्यूक्लियोटाइड' है। यह एक ऐसी उन्नत तकनीक पर आधारित है जो उन जेनेटिक निर्देशों में बाधा डालती है जिनकी मदद से वायरस अपनी संख्या बढ़ाता है और वायरल प्रोटीन का निर्माण करता है। परंपरागत एंटीवायरल दवाएं केवल वायरस को दबाती हैं, जबकि यह नई दवा इलाज बंद होने के बाद भी कुछ मरीजों में वायरस पर नियंत्रण बनाए रखने की क्षमता दिखाती है।
यह दवा उन वयस्क मरीजों के लिए है जो कम से कम छह महीने तक एंटीवायरल थेरेपी ले चुके हों, जिनके रक्त में वायरस का स्तर दबा हुआ हो, और FDA-अधिकृत डायग्नोस्टिक टेस्ट से जिनमें हेपेटाइटिस बी सरफेस एंटीजन का स्तर 3,000 इंटरनेशनल यूनिट प्रति मिलीलीटर या उससे कम पाया गया हो।
क्लिनिकल ट्रायल के नतीजे
FDA ने बताया कि इस दवा का मूल्यांकन दो क्लिनिकल ट्रायल में किया गया, जिनमें हिबसागो की तुलना एक प्लेसबो से की गई। मरीजों को 24 सप्ताह तक इंजेक्शन दिए गए, जबकि वे अपनी नियमित एंटीवायरल दवाएं भी लेते रहे। इसके बाद भी 24 सप्ताह तक एंटीवायरल इलाज जारी रखना अनिवार्य था।
दोनों ट्रायल में हिबसागो लेने वाले 24 प्रतिशत मरीज एंटीवायरल दवाएं बंद करने की शर्तें पूरी करने में सफल रहे, जबकि प्लेसबो ग्रुप में ऐसा कोई भी मरीज नहीं था। इलाज पूरी तरह बंद करने के 24 हफ्तों बाद भी, हिबसागो लेने वाले 19 प्रतिशत मरीजों में वायरस पर नियंत्रण बना रहा और उनके रक्त में हेपेटाइटिस बी सरफेस एंटीजन का पता नहीं चला। हालांकि, अधिकांश मरीजों में यह परिणाम नहीं देखा गया।
FDA की चेतावनियाँ और साइड इफेक्ट्स
FDA ने स्पष्ट किया है कि इस दवा के साथ गंभीर सुरक्षा जोखिम भी जुड़े हैं। दवा की जानकारी में लिवर की गंभीर प्रतिक्रियाओं और प्लेटलेट काउंट में कमी के बारे में एक विशेष चेतावनी दी गई है, जिससे जानलेवा ब्लीडिंग का खतरा हो सकता है।
इसके अतिरिक्त, किडनी की कार्यक्षमता बिगड़ने, गंभीर सूजन जैसे वैस्कुलिटिस, और दवा को गलत तरीके से देने से उत्पन्न जटिलताओं के बारे में भी चेतावनी दी गई है। इलाज कराने वाले मरीजों को थेरेपी शुरू होने से पहले और उसके दौरान नियमित रूप से ब्लड टेस्ट कराने और चिकित्सक की निगरानी में रहने की आवश्यकता होगी। सामान्य साइड इफेक्ट्स में इंजेक्शन वाली जगह पर प्रतिक्रिया, बुखार, थकान और सिरदर्द शामिल हैं।
डायग्नोस्टिक टेस्ट और दवा की विशेष स्थिति
FDA ने रोश द्वारा विकसित एक डायग्नोस्टिक टेस्ट को भी एक साथ मंजूरी दी है, जो सही मरीजों की पहचान करने और इलाज की निगरानी में सहायक होगा। हिबसागो को 'फास्ट ट्रैक', 'ब्रेकथ्रू थेरेपी' और 'प्रायोरिटी रिव्यू' का दर्जा दिया गया है, जो यह दर्शाता है कि यह एक महत्वपूर्ण चिकित्सा आवश्यकता को पूरा करने की क्षमता रखती है।
भारत और एशिया पर असर
FDA के 'ऑफिस ऑफ इंफेक्शियस डिसीज' की कार्यवाहक निदेशक वेंडी कार्टर ने कहा, 'क्रोनिक हेपेटाइटिस बी से पीड़ित कई लोगों के लिए, वायरस को दबाए रखने के लिए सालों तक एंटीवायरल दवाएं लेनी पड़ती हैं। हिबसागो इलाज का एक नया तरीका पेश करता है — यह मंजूरी इस गंभीर बीमारी से जूझ रहे लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण प्रगति है।'
गौरतलब है कि क्रोनिक हेपेटाइटिस बी भारत सहित पूरे एशिया में सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। यह लंबे समय तक चलने वाला वायरल संक्रमण लिवर को प्रभावित करता है और सिरोसिस व लिवर कैंसर जैसी जटिलताओं का कारण बन सकता है। FDA की घोषणा में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि यह दवा अमेरिका के बाहर, जिसमें भारत भी शामिल है, कब से व्यावसायिक रूप से उपलब्ध होगी — यह जानकारी भविष्य की नियामक प्रक्रियाओं पर निर्भर करेगी।