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एच-1बी वीजा पर $1 लाख शुल्क रद्द: अमेरिकी अदालत का बड़ा फैसला, राज्यों को राहत

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एच-1बी वीजा पर $1 लाख शुल्क रद्द: अमेरिकी अदालत का बड़ा फैसला, राज्यों को राहत

सारांश

अमेरिकी अदालत ने ट्रंप प्रशासन के एच-1बी वीजा पर $1 लाख के शुल्क को गैरकानूनी करार देते हुए रद्द कर दिया। कांग्रेस की मंजूरी के बिना लगाए गए इस शुल्क को कई राज्यों ने चुनौती दी थी। यह फैसला उन लाखों भारतीय पेशेवरों और अमेरिकी संस्थानों के लिए बड़ी राहत है जो कुशल विदेशी कार्यबल पर निर्भर हैं।

मुख्य बातें

मैसाचुसेट्स की अमेरिकी जिला अदालत ने ट्रंप प्रशासन का $1 लाख (एक लाख डॉलर) का एच-1बी वीजा शुल्क रद्द कर दिया।
यह शुल्क 21 सितंबर 2025 के बाद दाखिल सभी नए एच-1बी आवेदनों पर लागू था।
अदालत ने माना कि कांग्रेस की मंजूरी के बिना यह शुल्क लगाना संवैधानिक रूप से अवैध था।
कैलिफोर्निया के नेतृत्व में कई राज्यों के गठबंधन ने इस नीति को अदालत में चुनौती दी थी।
वॉशिंगटन राज्य की 30 से अधिक सरकारी एजेंसियों और संस्थानों में लगभग 500 एच-1बी धारक कार्यरत हैं, जिन्हें सीधा लाभ मिलेगा।
एआई, साइबर सुरक्षा और चिकित्सा क्षेत्र के संस्थानों को भर्ती प्रक्रिया में अब बाधा नहीं आएगी।

मैसाचुसेट्स की अमेरिकी जिला अदालत ने 9 जून 2025 को एक ऐतिहासिक फैसले में ट्रंप प्रशासन द्वारा नए एच-1बी वीजा आवेदनों पर लगाए गए $1 लाख (एक लाख डॉलर) के शुल्क को पूरी तरह रद्द कर दिया। यह शुल्क 21 सितंबर 2025 के बाद दाखिल सभी नए एच-1बी आवेदनों पर लागू किया गया था, जिसे कई राज्यों के गठबंधन ने अदालत में चुनौती दी थी। अदालत ने माना कि कांग्रेस की मंजूरी के बिना प्रशासन को इस तरह का शुल्क लगाने का संवैधानिक अधिकार नहीं था।

मुख्य घटनाक्रम

कैलिफोर्निया के अटॉर्नी जनरल रॉब बोंटा, जिनके कार्यालय ने राज्यों के इस गठबंधन का नेतृत्व किया, ने फैसले का स्वागत करते हुए कहा, "फैसला आ गया है। ट्रंप प्रशासन की ओर से लगाया गया यह गैरकानूनी और महंगा $1 लाख का टैक्स रद्द कर दिया गया है। यह टैक्स अमेरिका की उस क्षमता पर हमला था, जिसके ज़रिए देश उच्च कौशल वाले प्रतिभाशाली लोगों को आकर्षित और बनाए रखता है।"

बोंटा ने आगे कहा, "कैलिफोर्निया कारोबार के लिए खुला है, प्रतिभा के लिए खुला है और यह सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है कि स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा जैसी ज़रूरी सुविधाओं को एक मज़बूत और कुशल कार्यबल मिलता रहे।"

राज्यों की प्रतिक्रिया

वॉशिंगटन राज्य के अटॉर्नी जनरल निक ब्राउन ने कहा कि यह फैसला राज्य को विशेष कौशल वाले लोगों को आकर्षित करने में मदद करेगा। उन्होंने कहा, "यह जीत हमारे राज्य को उन अत्यधिक विशेषज्ञता वाले शोध कार्यों में आगे बनाए रखने में मदद करेगी, जो दुनिया के सबसे गतिशील उद्योगों को आगे बढ़ाते हैं।"

ब्राउन ने यह भी रेखांकित किया, "अगर इस गैरकानूनी शुल्क को नहीं रोका जाता, तो इससे वॉशिंगटन की सरकारी एजेंसियों, सार्वजनिक विश्वविद्यालयों और कॉलेजों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ता।" उनके कार्यालय के अनुसार, वॉशिंगटन राज्य की 30 से अधिक सरकारी एजेंसियों, सार्वजनिक विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में लगभग 500 एच-1बी वीजा धारक कार्यरत हैं।

आम जनता और संस्थानों पर असर

यह शुल्क विशेष रूप से उन शैक्षणिक और चिकित्सा संस्थानों के लिए बाधा बन रहा था, जो एआई, साइबर सुरक्षा और चिकित्सा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में योग्य विदेशी पेशेवरों की भर्ती करते हैं। अधिकारियों का कहना था कि इतने भारी शुल्क के कारण अस्पतालों और शोध संस्थानों के लिए ज़रूरी कर्मचारी जुटाना व्यावहारिक रूप से असंभव हो जाता।

गौरतलब है कि एच-1बी वीजा कार्यक्रम अमेरिका में प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्रों की रीढ़ माना जाता है, और भारतीय पेशेवर इसके सबसे बड़े लाभार्थी हैं।

कानूनी पृष्ठभूमि

यह ऐसे समय में आया है जब ट्रंप प्रशासन आव्रजन नीतियों को लेकर कई मोर्चों पर अदालती चुनौतियों का सामना कर रहा है। राज्यों के गठबंधन ने तर्क दिया था कि प्रशासन ने कांग्रेस को दरकिनार कर एकतरफा तरीके से यह शुल्क लागू किया, जो कि संवैधानिक अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन है। अदालत ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए शुल्क को रद्द किया।

क्या होगा आगे

फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि ट्रंप प्रशासन इस फैसले को उच्च अदालत में चुनौती देगा या नहीं। कंपनियों, विश्वविद्यालयों और अस्पतालों के लिए तत्काल राहत यह है कि 21 सितंबर 2025 के बाद दाखिल आवेदनों पर यह अतिरिक्त शुल्क अब लागू नहीं होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में प्रशासनिक शुल्क नीतियों पर एक महत्वपूर्ण नज़ीर स्थापित करता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन $1 लाख का शुल्क व्यवहार में अमेरिकी अस्पतालों और विश्वविद्यालयों को ही सबसे अधिक नुकसान पहुँचाता — वे संस्थाएँ जो देश के स्वास्थ्य और शोध तंत्र की धुरी हैं। विडंबना यह है कि 'अमेरिका फर्स्ट' के नाम पर लागू यह नीति अमेरिकी संस्थानों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को ही कमज़ोर कर रही थी। अब असली सवाल यह है कि क्या प्रशासन इसे उच्च अदालत में ले जाएगा, या आव्रजन नीति में एक नई रणनीति अपनाएगा।
RashtraPress
26 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एच-1बी वीजा पर $1 लाख का शुल्क क्या था और इसे क्यों रद्द किया गया?
ट्रंप प्रशासन ने 21 सितंबर 2025 के बाद दाखिल सभी नए एच-1बी वीजा आवेदनों पर $1 लाख (एक लाख डॉलर) का अतिरिक्त शुल्क लागू किया था। मैसाचुसेट्स की अमेरिकी जिला अदालत ने इसे इस आधार पर रद्द किया कि कांग्रेस की मंजूरी के बिना प्रशासन को ऐसा शुल्क लगाने का संवैधानिक अधिकार नहीं था।
इस फैसले से किन संस्थानों को सबसे अधिक फायदा होगा?
इस फैसले से अमेरिका की कंपनियों, विश्वविद्यालयों, अस्पतालों और शोध संस्थानों को सबसे अधिक राहत मिलेगी, जो एआई, साइबर सुरक्षा और चिकित्सा जैसे क्षेत्रों में कुशल विदेशी पेशेवरों की भर्ती करते हैं। वॉशिंगटन राज्य की 30 से अधिक सरकारी एजेंसियों और सार्वजनिक संस्थानों में कार्यरत लगभग 500 एच-1बी धारकों को भी सीधा लाभ मिलेगा।
अदालत में इस शुल्क को किसने चुनौती दी थी?
कैलिफोर्निया के अटॉर्नी जनरल रॉब बोंटा के नेतृत्व में कई अमेरिकी राज्यों के अटॉर्नी जनरल्स के गठबंधन ने इस नीति को अदालत में चुनौती दी थी। उनका तर्क था कि यह शुल्क कांग्रेस को दरकिनार कर एकतरफा तरीके से लागू किया गया, जो संवैधानिक अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन है।
भारतीय पेशेवरों पर इस फैसले का क्या असर होगा?
एच-1बी वीजा के सबसे बड़े लाभार्थियों में भारतीय पेशेवर शामिल हैं, विशेषकर प्रौद्योगिकी और चिकित्सा क्षेत्र में। $1 लाख के शुल्क के रद्द होने से भारतीय आवेदकों के लिए अमेरिकी कंपनियों और संस्थानों में रोज़गार के अवसर पुनः सुलभ होंगे, क्योंकि नियोक्ता अब इस भारी अतिरिक्त लागत के बिना स्पॉन्सरशिप दे सकेंगे।
क्या ट्रंप प्रशासन इस फैसले को उच्च अदालत में चुनौती दे सकता है?
फिलहाल इस बारे में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। हालाँकि, कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार प्रशासन के पास अपील का विकल्प उपलब्ध है। तब तक के लिए अदालत का यह अंतिम फैसला लागू रहेगा और 21 सितंबर 2025 के बाद दाखिल आवेदनों पर यह शुल्क वसूल नहीं किया जाएगा।
राष्ट्र प्रेस
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