आईईए प्रमुख: मौजूदा तेल संकट 1973, 1979 और 2002 से कहीं अधिक गंभीर
सारांश
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पेरिस, 7 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (आईईए) के निदेशक, फातिह बिरोल ने वर्तमान तेल संकट को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है। उनके अनुसार, मौजूदा स्थिति पूर्व के तेल संकटों की तुलना में कहीं अधिक गंभीर है।
फ्रांसीसी समाचार पत्र ले फिगारो को दिए गए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि होर्मुज स्ट्रेट की नाकाबंदी के कारण उत्पन्न हुआ यह तेल और गैस संकट "1973, 1979 और 2002 के संकटों से भी अधिक गंभीर है।"
बिरोल ने कहा, "दुनिया ने कभी भी ऊर्जा आपूर्ति में इतनी बड़ी बाधा नहीं देखी।" उनके अनुसार, यूरोप, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अन्य देशों को भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा, लेकिन विकासशील देशों को सबसे अधिक नुकसान होगा। इन देशों को तेल और गैस की बढ़ती कीमतों, खाद्य वस्तुओं की महंगाई और अन्य आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
आईईए के सदस्य देशों ने पिछले महीने अपने स्ट्रेटेजिक रिजर्वईरान ने होर्मुज स्ट्रेट में ट्रैफिक लगभग पूरी तरह से रोक दिया है, जो कि विश्व का लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस का मार्ग है। वर्तमान में पश्चिम एशिया में संकट के कारण ऊर्जा की कीमतों में तेज वृद्धि हो रही है।
यह ध्यान देने योग्य है कि 1973 का तेल संकट विश्व के लिए सबसे कठिन और चुनौतीपूर्ण समय था। उस समय संकट का सबसे बड़ा असर विकसित देशों पर पड़ा था। योम किप्पुर युद्ध के दौरान अरब देशों ने तेल को एक रणनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया था, जिससे अमेरिका और यूरोप की अर्थव्यवस्थाओं पर गंभीर प्रभाव पड़ा था। तेल की कीमतें काफी बढ़ गई थीं और महंगाई तथा बेरोजगारी ने गंभीर संकट उत्पन्न कर दिया था।
हालांकि, वर्तमान संकट का कारण नीतिगत निर्णय नहीं, बल्कि सीधे सैन्य संघर्ष का प्रभाव है। फारस की खाड़ी से ऊर्जा आपूर्ति बाधित होने के कारण वैश्विक बाजार में अस्थिरता बढ़ रही है। इस बार का सबसे बड़ा अंतर यह है कि संकट का असर विकासशील देशों पर अधिक पड़ रहा है। विकसित देशों के पास पर्याप्त रणनीतिक भंडार, मजबूत अर्थव्यवस्था और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत हैं, जबकि कई एशियाई और अफ्रीकी देश तेल आयात पर निर्भर हैं। इनके लिए बढ़ती ऊर्जा कीमतें सीधा महंगाई, खाद्य संकट और सामाजिक अस्थिरता का कारण बन सकती हैं।