7 अक्टूबर 2026
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पहलगाम हमले का हवाला देकर भारत ने CCIT को जल्द अपनाने की मांग की, UN में पाकिस्तान पर निशाना

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पहलगाम हमले का हवाला देकर भारत ने CCIT को जल्द अपनाने की मांग की, UN में पाकिस्तान पर निशाना

सारांश

पहलगाम में 26 निर्दोष लोगों की जान लेने वाले हमले का हवाला देते हुए भारत ने संयुक्त राष्ट्र में 30 साल से अटके CCIT को अपनाने की माँग दोहराई। भाजपा नेता बिप्लब कुमार देब ने पाकिस्तान को आतंकवाद का राज्य-प्रायोजक बताया और 'अच्छे-बुरे आतंकवादी' के भेद को सिरे से खारिज किया।

मुख्य बातें

BJP नेता एवं पूर्व CM बिप्लब कुमार देब ने 7 अक्टूबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र महासभा की छठी समिति में भारत का पक्ष रखा।
भारत ने CCIT (अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक सम्मेलन) को तत्काल अपनाने की माँग की, जो 1996 से 30 वर्षों से अनुमोदन का इंतजार कर रहा है।
पहलगाम आतंकी हमले में मारे गए 26 नागरिकों का हवाला देते हुए दोषियों, वित्तपोषकों और प्रायोजकों की जवाबदेही की माँग की गई।
हमले की जिम्मेदारी लश्कर-ए-तैयबा के प्रॉक्सी 'द रेज़िस्टेंस फ्रंट' ने ली थी; भारत ने पाकिस्तान को सीमा-पार आतंकवाद का राज्य-प्रायोजक करार दिया।
देब ने आतंकवाद में 'अच्छे-बुरे' के भेद को खारिज करते हुए 6 प्राथमिकताओं का उल्लेख किया — तकनीक के दुरुपयोग पर अंकुश, आतंकी वित्तपोषण समाप्त करना, पीड़ितों को केंद्र में रखना शामिल।

संयुक्त राष्ट्र महासभा की छठी समिति में 7 अक्टूबर 2026 को भारत ने 'अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक सम्मेलन' (CCIT) को तत्काल अपनाने की माँग की और पहलगाम आतंकी हमले में मारे गए 26 निर्दोष नागरिकों के दोषियों के विरुद्ध कानूनी जवाबदेही सुनिश्चित करने पर बल दिया। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के वरिष्ठ नेता एवं त्रिपुरा के पूर्व मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देब ने संयुक्त राष्ट्र में भारतीय प्रतिनिधिमंडल की ओर से यह दृढ़ वक्तव्य दिया।

पहलगाम हमले का संदर्भ और भारत की स्थिति

देब ने कहा कि पहलगाम जैसे सीमा-पार आतंकवादी हमलों के दोषियों, आयोजकों, वित्तपोषकों और प्रायोजकों को अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत जवाबदेह ठहराया जाना आवश्यक है। उल्लेखनीय है कि इस हमले की जिम्मेदारी पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तैयबा के प्रॉक्सी संगठन 'द रेज़िस्टेंस फ्रंट' ने ली थी।

भारत का स्पष्ट कहना है कि पाकिस्तान सीमा-पार आतंकवाद का राज्य-प्रायोजक है। पहलगाम हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान में संचालित आतंकी ठिकानों के विरुद्ध जवाबी कार्रवाई भी की थी। देब ने अपने लोगों की रक्षा करने के भारत के संप्रभु अधिकार को दृढ़ता से दोहराया।

CCIT क्यों है ज़रूरी — तीन दशक से अटका प्रस्ताव

CCIT का प्रस्ताव 1996 में भारत ने ही पहली बार संयुक्त राष्ट्र में रखा था, किंतु यह 30 वर्षों से अनुमोदन की प्रतीक्षा में है। कुछ देशों ने इसे रोक रखा है जो 'अच्छे आतंकवादियों' और 'बुरे आतंकवादियों' के बीच भेद करते हैं तथा तर्क देते हैं कि 'स्वतंत्रता सेनानियों' को इसके दायरे से बाहर रखा जाए।

देब ने इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि आतंकवाद में 'अच्छे' और 'बुरे' का कोई विभाजन नहीं हो सकता। उनका कहना था कि निर्दोष नागरिकों को निशाना बनाने का कोई भी औचित्य स्वीकार्य नहीं है।

आतंकवाद से निपटने की भारत की छह प्राथमिकताएँ

देब ने महासभा को भारत की छह प्रमुख प्राथमिकताओं से अवगत कराया, जो इस प्रकार हैं:

पहली — आतंकी भर्ती, कट्टरपंथ, प्रचार, ऑपरेशन नियोजन और वित्तपोषण के लिए नई तकनीकों के दुरुपयोग पर अंकुश; दूसरी — आतंकी वित्तपोषण को पूरी तरह समाप्त करना; तीसरी — पीड़ितों को केंद्र में रखना; चौथी — राष्ट्रीय स्तर पर क्षमता निर्माण को मजबूत करना; पाँचवीं — आतंकवादी विचारधारा का सामना करना; और छठी — आतंकी बुनियादी ढाँचे को बाधित करना।

व्यापक भू-राजनीतिक संदर्भ

यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारत और पाकिस्तान के बीच कूटनीतिक तनाव पहलगाम हमले के बाद से चरम पर है। संयुक्त राष्ट्र के मंच पर भारत का यह रुख बताता है कि वह सीमा-पार आतंकवाद के मुद्दे को बहुपक्षीय कानूनी ढाँचे में भी उतनी ही मजबूती से उठाने का इरादा रखता है, जितनी द्विपक्षीय स्तर पर।

गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब भारत ने CCIT की वकालत की हो, लेकिन पहलगाम हमले के बाद इस माँग को नई तात्कालिकता और राजनयिक धार मिली है। आलोचकों का कहना है कि CCIT पर सहमति तब तक कठिन रहेगी जब तक प्रमुख देश 'आतंकवाद' की परिभाषा पर एकमत नहीं होते।

आगे की राह

भारत का लक्ष्य CCIT को अंतरराष्ट्रीय समर्थन दिलाकर आतंकवाद के विरुद्ध एक सार्वभौमिक, बाध्यकारी कानूनी तंत्र स्थापित करना है। यदि यह सम्मेलन अपनाया जाता है, तो आतंकी वित्तपोषण और शरण देने वाले देशों पर अंतरराष्ट्रीय दबाव काफी बढ़ सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन पहलगाम हमले के बाद इसे उठाने का राजनयिक संदर्भ बदल गया है — अब यह महज सैद्धांतिक प्रस्ताव नहीं, सीधी जवाबदेही की माँग है। असली समस्या यह है कि CCIT को रोकने वाले देश कोई छोटे खिलाड़ी नहीं हैं; वे 'स्वतंत्रता सेनानी' की परिभाषा को हथियार बनाते हैं। जब तक P5 और इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) के प्रमुख सदस्य इस परिभाषागत विवाद को नहीं सुलझाते, CCIT की राह में यही सबसे बड़ी बाधा रहेगी। भारत की छह-सूत्री प्राथमिकता सूची ठोस है, परंतु बहुपक्षीय मंचों पर नतीजे घोषणाओं से नहीं, सहमति-निर्माण की कूटनीति से तय होते हैं।
RashtraPress
7 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

CCIT (अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक सम्मेलन) क्या है?
CCIT एक प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय कानूनी संधि है जो आतंकवाद को परिभाषित करेगी और दोषियों के विरुद्ध सार्वभौमिक कानूनी कार्रवाई का रास्ता खोलेगी। इसे 1996 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र में पहली बार प्रस्तावित किया था, लेकिन 'स्वतंत्रता सेनानियों' की परिभाषा को लेकर मतभेदों के कारण यह 30 वर्षों से पारित नहीं हो पाया है।
भारत ने CCIT की माँग के साथ पहलगाम हमले का जिक्र क्यों किया?
पहलगाम आतंकी हमले में 26 निर्दोष नागरिक मारे गए थे, जिसकी जिम्मेदारी पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तैयबा के प्रॉक्सी 'द रेज़िस्टेंस फ्रंट' ने ली थी। भारत ने इस हमले को सीमा-पार आतंकवाद का ताज़ा उदाहरण बताते हुए CCIT जैसे बाध्यकारी कानूनी ढाँचे की तात्कालिकता को रेखांकित किया।
CCIT को अब तक क्यों नहीं अपनाया गया?
कुछ देश 'आतंकवादी' और 'स्वतंत्रता सेनानी' के बीच भेद करते हैं और चाहते हैं कि बाद वाली श्रेणी को CCIT के दायरे से बाहर रखा जाए। इस परिभाषागत विवाद के कारण सर्वसम्मति नहीं बन पाई है और यह प्रस्ताव 1996 से लंबित है।
भारत ने UN में आतंकवाद से निपटने की कौन-सी प्राथमिकताएँ रखीं?
भारत ने छह प्राथमिकताएँ रखीं: नई तकनीकों के आतंकी दुरुपयोग पर अंकुश, आतंकी वित्तपोषण समाप्त करना, पीड़ितों को केंद्र में रखना, राष्ट्रीय क्षमता निर्माण, आतंकी विचारधारा का सामना करना और आतंकी बुनियादी ढाँचे को बाधित करना। ये प्राथमिकताएँ बिप्लब कुमार देब ने महासभा की छठी समिति में रखीं।
संयुक्त राष्ट्र में भारत का प्रतिनिधित्व किसने किया?
BJP के राष्ट्रीय महासचिव और त्रिपुरा के पूर्व मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देब ने महासभा में भारतीय प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के रूप में यह वक्तव्य दिया। वे 7 अक्टूबर 2026 को अंतर्राष्ट्रीय कानूनी मामलों से संबंधित छठी समिति में बोले।
राष्ट्र प्रेस
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