पहलगाम हमले का हवाला देकर भारत ने CCIT को जल्द अपनाने की मांग की, UN में पाकिस्तान पर निशाना
सारांश
मुख्य बातें
संयुक्त राष्ट्र महासभा की छठी समिति में 7 अक्टूबर 2026 को भारत ने 'अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक सम्मेलन' (CCIT) को तत्काल अपनाने की माँग की और पहलगाम आतंकी हमले में मारे गए 26 निर्दोष नागरिकों के दोषियों के विरुद्ध कानूनी जवाबदेही सुनिश्चित करने पर बल दिया। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के वरिष्ठ नेता एवं त्रिपुरा के पूर्व मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देब ने संयुक्त राष्ट्र में भारतीय प्रतिनिधिमंडल की ओर से यह दृढ़ वक्तव्य दिया।
पहलगाम हमले का संदर्भ और भारत की स्थिति
देब ने कहा कि पहलगाम जैसे सीमा-पार आतंकवादी हमलों के दोषियों, आयोजकों, वित्तपोषकों और प्रायोजकों को अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत जवाबदेह ठहराया जाना आवश्यक है। उल्लेखनीय है कि इस हमले की जिम्मेदारी पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तैयबा के प्रॉक्सी संगठन 'द रेज़िस्टेंस फ्रंट' ने ली थी।
भारत का स्पष्ट कहना है कि पाकिस्तान सीमा-पार आतंकवाद का राज्य-प्रायोजक है। पहलगाम हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान में संचालित आतंकी ठिकानों के विरुद्ध जवाबी कार्रवाई भी की थी। देब ने अपने लोगों की रक्षा करने के भारत के संप्रभु अधिकार को दृढ़ता से दोहराया।
CCIT क्यों है ज़रूरी — तीन दशक से अटका प्रस्ताव
CCIT का प्रस्ताव 1996 में भारत ने ही पहली बार संयुक्त राष्ट्र में रखा था, किंतु यह 30 वर्षों से अनुमोदन की प्रतीक्षा में है। कुछ देशों ने इसे रोक रखा है जो 'अच्छे आतंकवादियों' और 'बुरे आतंकवादियों' के बीच भेद करते हैं तथा तर्क देते हैं कि 'स्वतंत्रता सेनानियों' को इसके दायरे से बाहर रखा जाए।
देब ने इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि आतंकवाद में 'अच्छे' और 'बुरे' का कोई विभाजन नहीं हो सकता। उनका कहना था कि निर्दोष नागरिकों को निशाना बनाने का कोई भी औचित्य स्वीकार्य नहीं है।
आतंकवाद से निपटने की भारत की छह प्राथमिकताएँ
देब ने महासभा को भारत की छह प्रमुख प्राथमिकताओं से अवगत कराया, जो इस प्रकार हैं:
पहली — आतंकी भर्ती, कट्टरपंथ, प्रचार, ऑपरेशन नियोजन और वित्तपोषण के लिए नई तकनीकों के दुरुपयोग पर अंकुश; दूसरी — आतंकी वित्तपोषण को पूरी तरह समाप्त करना; तीसरी — पीड़ितों को केंद्र में रखना; चौथी — राष्ट्रीय स्तर पर क्षमता निर्माण को मजबूत करना; पाँचवीं — आतंकवादी विचारधारा का सामना करना; और छठी — आतंकी बुनियादी ढाँचे को बाधित करना।
व्यापक भू-राजनीतिक संदर्भ
यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारत और पाकिस्तान के बीच कूटनीतिक तनाव पहलगाम हमले के बाद से चरम पर है। संयुक्त राष्ट्र के मंच पर भारत का यह रुख बताता है कि वह सीमा-पार आतंकवाद के मुद्दे को बहुपक्षीय कानूनी ढाँचे में भी उतनी ही मजबूती से उठाने का इरादा रखता है, जितनी द्विपक्षीय स्तर पर।
गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब भारत ने CCIT की वकालत की हो, लेकिन पहलगाम हमले के बाद इस माँग को नई तात्कालिकता और राजनयिक धार मिली है। आलोचकों का कहना है कि CCIT पर सहमति तब तक कठिन रहेगी जब तक प्रमुख देश 'आतंकवाद' की परिभाषा पर एकमत नहीं होते।
आगे की राह
भारत का लक्ष्य CCIT को अंतरराष्ट्रीय समर्थन दिलाकर आतंकवाद के विरुद्ध एक सार्वभौमिक, बाध्यकारी कानूनी तंत्र स्थापित करना है। यदि यह सम्मेलन अपनाया जाता है, तो आतंकी वित्तपोषण और शरण देने वाले देशों पर अंतरराष्ट्रीय दबाव काफी बढ़ सकता है।