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रूस तेल खरीद पर अमेरिकी 'सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट': भारत बोला — 140 करोड़ नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा से नहीं होगा समझौता

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रूस तेल खरीद पर अमेरिकी 'सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट': भारत बोला — 140 करोड़ नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा से नहीं होगा समझौता

सारांश

अमेरिकी संसद ने रूसी तेल खरीदारों पर 100% तक शुल्क लगाने वाला कानून पारित कर दिया है — और भारत सीधे निशाने पर नहीं है, पर खतरा वास्तविक है। विदेश मंत्रालय की सतर्क भाषा बताती है कि नई दिल्ली इस भूराजनीतिक दबाव को गंभीरता से ले रही है।

मुख्य बातें

अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने 'लिंडसे ओ.
ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट' को 262 बनाम 159 मतों से पारित किया; सीनेट पहले ही 86 बनाम 11 मतों से इसे मंजूरी दे चुकी है।
यह कानून रूस से तेल-गैस खरीदने वाले देशों के सामान पर 100 प्रतिशत तक शुल्क लगाने का प्रावधान करता है।
भारत का नाम इस कानून में किसी विशेष लक्षित देश के रूप में नहीं है, न ही कोई अलग शुल्क-दर तय की गई है।
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि हर 180 दिन में समीक्षा करेगा; अन्य देशों को सूची में जोड़ा जा सकता है।
विदेश मंत्रालय ने कहा — 140 करोड़ नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए जाएंगे।
विधेयक अब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास है; उनके हस्ताक्षर की उम्मीद जताई जा रही है।

भारत के विदेश मंत्रालय ने 17 सितंबर 2026 को स्पष्ट किया कि अमेरिकी कांग्रेस द्वारा पारित 'लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट' पर सरकार बारीकी से नज़र रख रही है और 140 करोड़ भारतीय नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए जाएंगे। यह कानून रूस से तेल और गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों के सामान पर 100 प्रतिशत तक शुल्क लगाने का प्रावधान करता है।

कानून का स्वरूप और मतदान

अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने बुधवार को इस विधेयक को 262 बनाम 159 मतों से पारित किया। इससे पहले 7 अगस्त को सीनेट ने भी इसे 86 बनाम 11 मतों से मंजूरी दे दी थी। अब यह विधेयक राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास हस्ताक्षर के लिए भेजा जाएगा, जिनके सलाहकारों ने भी इसे अनुमोदित करने की सिफारिश की है।

इस कानून का मूल उद्देश्य यूक्रेन के विरुद्ध रूस के सैन्य अभियान को आर्थिक रूप से कमज़ोर करना है। इसके तहत रूसी अधिकारियों, बैंकों, ऊर्जा क्षेत्र की संस्थाओं और रूस के सैन्य अभियानों का समर्थन करने वाली विदेशी इकाइयों को निशाना बनाया गया है।

भारत पर संभावित असर

गौरतलब है कि भारत का नाम इस कानून में किसी विशेष लक्षित देश के रूप में नहीं रखा गया है और न ही भारत के लिए कोई अलग शुल्क-दर निर्धारित की गई है। हालाँकि, कानून के प्रावधान उन बड़े देशों पर लागू हो सकते हैं जो रूस से बड़ी मात्रा में ऊर्जा आयात करते हैं या रूस पर लगे तेल-प्रतिबंधों को दरकिनार करने में मदद करते हैं।

अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि हर 180 दिन में इस सूची की समीक्षा करेगा और जरूरत पड़ने पर अन्य देशों को भी इसमें शामिल किया जा सकता है — यह प्रावधान भारत जैसे बड़े रूसी ऊर्जा-आयातकों के लिए दीर्घकालिक अनिश्चितता का स्रोत बन सकता है।

भारत की आधिकारिक स्थिति

विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत ने पिछले कुछ महीनों में इस मुद्दे पर अमेरिका के विभिन्न अधिकारियों के साथ उच्च स्तर पर चर्चा की है। भारत ने स्पष्ट रूप से अमेरिका को बताया है कि इस कानून का असर केवल भारत-अमेरिका द्विपक्षीय संबंधों पर नहीं, बल्कि समूचे अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाज़ार पर भी पड़ सकता है।

मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत विभिन्न स्रोतों से ऊर्जा हासिल करने की नीति जारी रखेगा और बाज़ार की बदलती परिस्थितियों के अनुसार अपनी रणनीति को अनुकूलित करता रहेगा।

व्यापार और उद्योग पर प्रभाव

सरकार ने कहा कि वह इन घटनाक्रमों के संभावित प्रभावों से निपटने के लिए भारतीय व्यापार और उद्योग संगठनों के साथ मिलकर काम करेगी। यह ऐसे समय में आया है जब भारत रूसी तेल के सबसे बड़े खरीदारों में से एक बना हुआ है — एक ऐसी स्थिति जो 2022 के बाद से भारत की ऊर्जा आयात-नीति की धुरी बन चुकी है।

यदि भविष्य में भारत को इस कानून के दायरे में लाया गया, तो यह देश के ऊर्जा आयात बिल और व्यापार संतुलन दोनों को प्रभावित कर सकता है। आने वाले हफ्तों में राष्ट्रपति ट्रंप के हस्ताक्षर और उसके बाद की समीक्षा-प्रक्रिया भारत की ऊर्जा कूटनीति की दिशा तय करेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

न चुनौती — लेकिन इसके पीछे की चिंता स्पष्ट है। भारत 2022 के बाद से रूसी तेल का सबसे बड़े लाभार्थियों में रहा है, जिससे उसे सस्ती ऊर्जा मिली और व्यापार घाटे पर कुछ राहत भी। अब जब 180-दिनी समीक्षा-तंत्र के ज़रिए भारत को किसी भी वक्त सूची में डाला जा सकता है, तो यह कूटनीतिक 'प्रतीक्षा-और-देखो' रणनीति कब तक टिकेगी, यह सबसे बड़ा सवाल है। मुख्यधारा की कवरेज अक्सर यह नज़रअंदाज़ करती है कि भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता और रूस-भारत ऊर्जा संबंध अब एक-दूसरे से अलग नहीं रहे — दोनों का भविष्य इस एक कानून के क्रियान्वयन पर टिका है।
RashtraPress
17 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट' क्या है और इसमें क्या प्रावधान हैं?
यह अमेरिकी कानून रूस से तेल और गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों के सामान पर 100 प्रतिशत तक शुल्क लगाने का प्रावधान करता है। इसका उद्देश्य यूक्रेन के विरुद्ध रूस के युद्ध को आर्थिक रूप से कमज़ोर करना है। इसमें रूसी अधिकारियों, बैंकों और ऊर्जा संस्थाओं को भी निशाना बनाया गया है।
क्या भारत इस कानून के दायरे में आता है?
फिलहाल भारत का नाम इस कानून में किसी विशेष लक्षित देश के रूप में नहीं है और न ही कोई अलग शुल्क-दर तय की गई है। हालाँकि, अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि हर 180 दिन में समीक्षा करेगा, जिसके तहत भविष्य में भारत को भी सूची में शामिल किया जा सकता है।
भारत सरकार ने इस कानून पर क्या रुख अपनाया है?
विदेश मंत्रालय ने कहा है कि सरकार 140 करोड़ नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है और अपने व्यापारिक व आर्थिक हितों की रक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएगी। पिछले कुछ महीनों में इस मुद्दे पर अमेरिकी अधिकारियों के साथ उच्च स्तर पर चर्चा हो चुकी है।
यह विधेयक अब किस चरण में है?
प्रतिनिधि सभा ने इसे 262 बनाम 159 मतों से और सीनेट ने 86 बनाम 11 मतों से पारित किया है। अब यह राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास हस्ताक्षर के लिए है, जिनके इसे कानून बनाने की उम्मीद है।
इस कानून का भारत-अमेरिका संबंधों पर क्या असर पड़ सकता है?
भारत ने अमेरिका को स्पष्ट किया है कि इस कानून का असर केवल द्विपक्षीय संबंधों पर नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाज़ार पर भी पड़ सकता है। सरकार भारतीय व्यापार और उद्योग संगठनों के साथ मिलकर संभावित प्रभावों से निपटने की तैयारी कर रही है।
राष्ट्र प्रेस
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