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रक्षा क्षेत्र में एआई के सुरक्षित उपयोग के लिए भारत तैयार कर रहा है घरेलू फ्रेमवर्क: सांसद कमलजीत सहरावत

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रक्षा क्षेत्र में एआई के सुरक्षित उपयोग के लिए भारत तैयार कर रहा है घरेलू फ्रेमवर्क: सांसद कमलजीत सहरावत

सारांश

भारत ने संयुक्त राष्ट्र में स्पष्ट किया कि वह सैन्य एआई के जिम्मेदार उपयोग के लिए एक घरेलू मूल्यांकन ढाँचा बना रहा है। सांसद कमलजीत सहरावत ने CCW प्रोटोकॉल, IED खतरों और 30 से अधिक देशों में 15,000 से ज़्यादा पीड़ितों को कृत्रिम अंग देने की भारतीय पहल का भी उल्लेख किया।

मुख्य बातें

भारत रक्षा क्षेत्र में एआई के सुरक्षित उपयोग के लिए भरोसे, सुरक्षा और पारदर्शिता पर आधारित घरेलू मूल्यांकन फ्रेमवर्क विकसित कर रहा है।
BJP सांसद कमलजीत सहरावत ने 22 अक्टूबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र महासभा की प्रथम समिति को यह जानकारी दी।
भारत ने जून 2026 में जिनेवा में आयोजित सैन्य एआई पर यूएन की पहली अनौपचारिक बैठक का समर्थन किया था।
भारत CCW संधि के सभी पाँच प्रोटोकॉल में शामिल है और लैंडमाइन एवं IED संबंधी सभी अंतर्राष्ट्रीय जिम्मेदारियाँ पूरी की हैं।
भारत ने कई देशों में 30 से अधिक कृत्रिम अंग शिविर लगाकर 15,000 से अधिक युद्ध पीड़ितों की मदद की है।

भारत ने संयुक्त राष्ट्र में स्पष्ट किया है कि वह सैन्य और रक्षा क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के सुरक्षित एवं जिम्मेदार उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक सुरक्षा उपाय और एक घरेलू मूल्यांकन ढाँचा विकसित कर रहा है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) की लोकसभा सांसद कमलजीत सहरावत ने 22 अक्टूबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र महासभा की निरस्त्रीकरण एवं अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा समिति (प्रथम समिति) को संबोधित करते हुए यह जानकारी दी। यह बयान ऐसे समय में आया है जब दुनिया भर में रक्षा क्षेत्र में एआई के बढ़ते उपयोग को लेकर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में गहरी चिंता व्याप्त है।

भारत का घरेलू एआई मूल्यांकन ढाँचा

सांसद कमलजीत सहरावत ने बताया कि भारत ने रक्षा क्षेत्र में एआई की विश्वसनीयता परखने के लिए एक विशेष घरेलू फ्रेमवर्क तैयार किया है, जो भरोसे, सुरक्षा और पारदर्शिता के मूल सिद्धांतों पर आधारित है। इस ढाँचे का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सैन्य अभियानों में एआई का उपयोग अंतर्राष्ट्रीय मानवीय कानून के अनुरूप हो।

गौरतलब है कि भारत उन देशों में शामिल था जिन्होंने जून 2026 में जिनेवा में आयोजित सैन्य क्षेत्र में एआई पर संयुक्त राष्ट्र की पहली अनौपचारिक चर्चा का समर्थन किया था। यह बैठक संयुक्त राष्ट्र महासभा के उस प्रस्ताव के अनुपालन में बुलाई गई थी, जो पिछले वर्ष दिसंबर में 'सैन्य क्षेत्र में एआई और अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा पर इसके प्रभाव' विषय पर पारित हुआ था।

सीसीडब्ल्यू प्रोटोकॉल और भारत की प्रतिबद्धता

सहरावत ने कन्वेंशन ऑन सर्टेन कन्वेंशनल वेपन्स (CCW) से जुड़े मुद्दों पर भी विस्तार से प्रकाश डाला। यह अंतर्राष्ट्रीय संधि उन हथियारों पर प्रतिबंध या प्रतिबंधात्मक नियम लागू करती है जो अत्यधिक और अनावश्यक क्षति पहुँचाने में सक्षम हैं। भारत इस संधि के सभी पाँच प्रोटोकॉल में शामिल हो चुका है, जो अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत की रक्षा नीति की व्यापक प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

उन्होंने कहा कि भारत इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइसेज (IED) यानी देसी बमों से होने वाले खतरों को कम करने और पीड़ितों की सहायता को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है। द्वितीय प्रोटोकॉल ऐसे आईईडी से निपटने का एक स्पष्ट ढाँचा प्रदान करता है, जिनका उपयोग प्रायः आतंकवादी संगठन और अवैध सशस्त्र समूह करते हैं।

लैंडमाइन और विस्फोटक अवशेषों पर भारत का रुख

सहरावत ने स्पष्ट किया कि भारत ने इस प्रोटोकॉल के अंतर्गत अपनी समस्त अंतर्राष्ट्रीय जिम्मेदारियों का पालन किया है। भारत ने ऐसी बारूदी सुरंगों का उत्पादन नहीं किया है जिन्हें आसानी से चिह्नित न किया जा सके, और सभी एंटी-पर्सनल माइंस को पहचान-योग्य बनाया है।

भारत प्रोटोकॉल V का भी सदस्य है, जो युद्ध के बाद बच जाने वाले विस्फोटक अवशेषों (ERW) को नष्ट करने से संबंधित है। उन्होंने कहा कि भारत युद्ध के इन अवशेषों से होने वाले मानवीय नुकसान के प्रति पूरी तरह गंभीर है।

पीड़ितों के लिए कृत्रिम अंग शिविर

मानवीय सहायता के क्षेत्र में भारत की सक्रिय भूमिका को रेखांकित करते हुए सहरावत ने बताया कि भारत ने पिछले कुछ वर्षों में कई देशों में 30 से अधिक कृत्रिम अंग (प्रोस्थेटिक) शिविर आयोजित किए हैं। इन शिविरों के माध्यम से 15,000 से अधिक लोगों को कृत्रिम अंग प्रदान किए गए हैं, जिनमें युद्ध और विस्फोटों से प्रभावित पीड़ित शामिल हैं।

यह पहल भारत की 'वसुधैव कुटुम्बकम' की उस भावना को परिलक्षित करती है जिसमें वह वैश्विक मानवीय जिम्मेदारी को रक्षा नीति का अभिन्न हिस्सा मानता है। आने वाले समय में भारत के इस ढाँचे पर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की नज़रें टिकी रहेंगी, क्योंकि सैन्य एआई पर वैश्विक विमर्श तेज़ी से आगे बढ़ रहा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि 'घरेलू फ्रेमवर्क' की रूपरेखा सार्वजनिक जवाबदेही के किस स्तर पर होगी। अमेरिका, चीन और रूस जैसी बड़ी सैन्य शक्तियों के बीच एआई-संचालित हथियार प्रणालियों की होड़ में भारत की पारदर्शिता-केंद्रित नीति एक विशिष्ट कूटनीतिक स्थान बना सकती है। हालाँकि, आलोचक यह पूछेंगे कि क्या यह ढाँचा केवल घोषणात्मक स्तर पर रहेगा या इसमें स्वतंत्र सत्यापन की व्यवस्था भी होगी। CCW प्रोटोकॉल के पालन और कृत्रिम अंग शिविरों जैसी मानवीय पहलें भारत की छवि को बहुआयामी बनाती हैं, पर सैन्य एआई नियमन पर ठोस अंतर्राष्ट्रीय संधि की अनुपस्थिति में राष्ट्रीय ढाँचे पर्याप्त नहीं होंगे।
RashtraPress
22 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भारत रक्षा क्षेत्र में एआई के लिए कौन-सा फ्रेमवर्क विकसित कर रहा है?
भारत ने रक्षा क्षेत्र में एआई की विश्वसनीयता परखने के लिए एक घरेलू मूल्यांकन ढाँचा तैयार किया है, जो भरोसे, सुरक्षा और पारदर्शिता के सिद्धांतों पर आधारित है। इसका उद्देश्य सैन्य अभियानों में एआई का उपयोग अंतर्राष्ट्रीय मानवीय कानून के अनुरूप सुनिश्चित करना है।
संयुक्त राष्ट्र में सैन्य एआई पर भारत का रुख क्या है?
भारत ने जून 2026 में जिनेवा में आयोजित सैन्य एआई पर संयुक्त राष्ट्र की पहली अनौपचारिक बैठक का समर्थन किया था। सांसद कमलजीत सहरावत ने 22 अक्टूबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र महासभा की प्रथम समिति में भारत के इस दृष्टिकोण को विस्तार से रखा।
CCW संधि में भारत की भागीदारी कैसी है?
भारत कन्वेंशन ऑन सर्टेन कन्वेंशनल वेपन्स (CCW) के सभी पाँच प्रोटोकॉल में शामिल है। इसमें IED, लैंडमाइन और युद्ध के विस्फोटक अवशेषों (ERW) से संबंधित नियम शामिल हैं, और भारत ने इनके अंतर्गत अपनी सभी अंतर्राष्ट्रीय जिम्मेदारियाँ पूरी की हैं।
भारत ने युद्ध पीड़ितों की सहायता के लिए क्या किया है?
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में कई देशों में 30 से अधिक कृत्रिम अंग (प्रोस्थेटिक) शिविर आयोजित किए हैं। इन शिविरों के माध्यम से युद्ध और विस्फोटों से प्रभावित 15,000 से अधिक लोगों को कृत्रिम अंग उपलब्ध कराए गए हैं।
IED खतरों पर भारत का क्या रुख है?
भारत IED यानी देसी बमों से होने वाले खतरों को कम करने और पीड़ितों की सहायता को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है। CCW के द्वितीय प्रोटोकॉल के तहत भारत ने ऐसे IED से निपटने का ढाँचा अपनाया है, जिनका उपयोग आतंकवादी और अवैध सशस्त्र समूह करते हैं।
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