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भारत एआई नीति में पिछड़ा, पर भारतीय तकनीक को आकार दे रहे हैं: सैम पित्रोदा

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भारत एआई नीति में पिछड़ा, पर भारतीय तकनीक को आकार दे रहे हैं: सैम पित्रोदा

सारांश

भारतीय तकनीकी विशेषज्ञ दुनिया में एआई को आकार दे रहे हैं, लेकिन भारत खुद एआई नीति और शासन में पिछड़ा हुआ है — यही विरोधाभास सैम पित्रोदा ने न्यूयॉर्क से उठाया। उनका सवाल सीधा है: यह तकनीक अदालतों, खेतों और अस्पतालों तक कब पहुँचेगी?

मुख्य बातें

सैम पित्रोदा ने कहा कि एआई के मामले में भारत एक देश के रूप में अच्छी स्थिति में नहीं है, जबकि भारतीय विशेषज्ञ वैश्विक एआई विकास में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं।
भारत के पास एआई पर कोई स्पष्ट राष्ट्रीय नीति नहीं है और शासन व्यवस्था में इसका उपयोग नगण्य है।
पित्रोदा ने एआई को न्यायपालिका के करोड़ों लंबित मामलों , शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और कृषि में लागू करने की वकालत की।
उन्होंने सी-डॉट और सी-डैक जैसे स्वदेशी प्रयासों का उल्लेख करते हुए कहा कि इनसे आईटी क्षेत्र में 70 लाख नौकरियाँ पैदा हुईं।
पित्रोदा ने कहा कि भारत के लिए बनाई गई तकनीक लैटिन अमेरिका सहित अन्य विकासशील देशों के लिए भी उपयोगी हो सकती है।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और दूरसंचार विशेषज्ञ सैम पित्रोदा ने न्यूयॉर्क में दिए एक विशेष साक्षात्कार में कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के क्षेत्र में भारत एक देश के रूप में बहुत कम प्रगति कर पाया है, जबकि दुनिया भर में एआई को आकार देने में भारतीय विशेषज्ञों की भूमिका उल्लेखनीय रही है। उनके अनुसार, भारत के पास अभी तक एआई पर कोई स्पष्ट राष्ट्रीय नीति नहीं है और शासन व्यवस्था में इस तकनीक का उपयोग नगण्य है।

मुख्य बयान: 'भारतीय आगे, भारत पीछे'

पित्रोदा ने अपनी बात को स्पष्ट करते हुए कहा, "मुझे यह कहते हुए दुख हो रहा है, लेकिन एआई के मामले में भारत अच्छी स्थिति में नहीं है। हालांकि भारतीय लोग एआई के क्षेत्र में अच्छी स्थिति में हैं। ये दोनों अलग बातें हैं।"

उन्होंने आगे कहा, "बहुत से भारतीय एआई को आकार दे रहे हैं। लेकिन एक देश के तौर पर हमने बहुत कम प्रगति की है। हमारे पास एआई पर कोई स्पष्ट नीति नहीं है। कोई दिशा नहीं है। हमने शासन व्यवस्था में एआई का उपयोग नहीं किया है।"

न्यायपालिका, शिक्षा और स्वास्थ्य में एआई की संभावना

पित्रोदा ने एआई के उपयोग को लेकर ठोस उदाहरण दिए। उन्होंने अदालतों में करोड़ों लंबित मामलों का हवाला देते हुए कहा कि यह वह क्षेत्र है जहाँ एआई वास्तविक बदलाव ला सकता है। उनके शब्दों में, "क्या मैं एआई का उपयोग अपने अदालतों के मामलों को निपटाने के लिए कर सकता हूं? अगर एआई के जरिए अदालतों के मामलों को सुलझाने के लिए कोई विशेष तकनीकी मिशन शुरू किया जाए और वह सफल हो जाए, तो मुझे बहुत खुशी होगी।"

उन्होंने कहा कि एआई की सफलता का असली मापदंड वित्तीय बाजार नहीं, बल्कि आम जनता की समस्याओं का समाधान होना चाहिए। उनके अनुसार, "सवाल यह है कि एआई हमारी शिक्षा को कैसे बेहतर बनाएगा? हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था को कैसे मजबूत करेगा? क्या एआई स्वास्थ्य सेवाओं की लागत कम कर सकता है? हमारे किसानों की मदद कैसे कर सकता है? यही असली मुद्दे हैं।"

भारत के लिए बनी तकनीक वैश्विक स्तर पर उपयोगी

पित्रोदा ने उस धारणा को खारिज किया कि भारत की जरूरतों के लिए विकसित तकनीक की वैश्विक उपयोगिता सीमित होगी। उन्होंने कहा कि जब आप भारत के लिए कुछ बनाते हैं, तो वह दुनिया के लिए भी उपयोगी बन सकता है, क्योंकि आज हर उत्पाद वैश्विक उत्पाद है। उन्होंने लैटिन अमेरिका सहित कई विकासशील देशों में न्यायिक लंबितता जैसी समान चुनौतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत के समाधान इन देशों के लिए भी प्रासंगिक हो सकते हैं।

सी-डॉट और सी-डैक की विरासत

पित्रोदा ने स्वदेशी तकनीकी विकास का समर्थन करते हुए भारत के शुरुआती प्रयासों को याद किया। उन्होंने कहा, "मैं निश्चित रूप से स्वदेशी विकास का समर्थन करता हूं। हमने सी-डॉट में ऐसा किया। हमने सी-डैक में ऐसा किया। यह करीब 45 साल पहले की बात है।" उनके अनुसार, इन संस्थाओं ने वह मानव संसाधन तैयार किया जिसने बाद में भारत के आईटी क्षेत्र की नींव रखी और 70 लाख नौकरियाँ पैदा कीं।

गरीबों की समस्याओं पर ध्यान देने की अपील

पित्रोदा ने कहा कि पिछले 40 वर्षों से वे यह कहते आए हैं कि दुनिया के सबसे प्रतिभाशाली लोग अमीरों की समस्याएं हल करने में लगे हैं, जबकि गरीबों की समस्याओं को वह ध्यान नहीं मिल पाता जिसकी उन्हें जरूरत है। उन्होंने भारत से आग्रह किया कि वह अपनी तकनीकी प्रतिभा को विकासशील और गरीब देशों की चुनौतियों के समाधान की दिशा में लगाए।

गौरतलब है कि पित्रोदा पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल में टेलीमैटिक्स विकास केंद्र (सी-डॉट) की स्थापना और देश में सार्वजनिक दूरसंचार के विस्तार से जुड़े रहे हैं, और बाद में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में राष्ट्रीय ज्ञान आयोग का नेतृत्व किया। उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब भारत सरकार एआई मिशन और डिजिटल नीति पर काम कर रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन भारत की घरेलू एआई क्षमता और नीतिगत ढाँचा अभी भी शैशवावस्था में है। सरकार का 'इंडिया एआई मिशन' घोषणाओं तक सीमित रहा है और न्यायपालिका, कृषि व स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में ठोस तैनाती अभी दूर है। असली सवाल यह है कि क्या भारत की एआई महत्वाकांक्षा सिलिकॉन वैली की नकल बनकर रह जाएगी, या वह अपनी सामाजिक चुनौतियों को हल करने वाला एक मौलिक मॉडल विकसित करेगी।
RashtraPress
28 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सैम पित्रोदा ने एआई पर भारत के बारे में क्या कहा?
पित्रोदा ने कहा कि एक देश के रूप में भारत एआई के मामले में अच्छी स्थिति में नहीं है — कोई स्पष्ट नीति नहीं है, कोई दिशा नहीं है और शासन में एआई का उपयोग नहीं हुआ है। हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि भारतीय व्यक्तिगत रूप से वैश्विक एआई विकास में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं।
पित्रोदा के अनुसार भारत में एआई का उपयोग कहाँ होना चाहिए?
उनके अनुसार एआई को न्यायपालिका के करोड़ों लंबित मामलों, शिक्षा व्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाओं की लागत में कमी और कृषि क्षेत्र की समस्याओं के समाधान के लिए प्राथमिकता से इस्तेमाल किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि यही एआई की सफलता का असली मापदंड है।
क्या भारत के लिए बनी एआई तकनीक वैश्विक स्तर पर काम की होगी?
पित्रोदा ने इस आशंका को खारिज किया। उनका कहना है कि भारत के लिए बनाई गई तकनीक लैटिन अमेरिका सहित कई विकासशील देशों के लिए भी उपयोगी हो सकती है, क्योंकि न्यायिक लंबितता जैसी चुनौतियाँ वहाँ भी मौजूद हैं।
सी-डॉट और सी-डैक का जिक्र पित्रोदा ने क्यों किया?
पित्रोदा ने इन संस्थाओं को स्वदेशी तकनीकी विकास के सफल उदाहरण के रूप में पेश किया। उनके अनुसार इन प्रयासों ने वह मानव क्षमता तैयार की जिसने भारत के आईटी क्षेत्र में 70 लाख नौकरियाँ पैदा कीं और लाखों परिवारों को गरीबी से बाहर निकाला।
पित्रोदा की तकनीकी पृष्ठभूमि क्या है?
पित्रोदा दूरसंचार इंजीनियर और नीति निर्माता हैं जो पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल में सी-डॉट की स्थापना और सार्वजनिक दूरसंचार विस्तार से जुड़े रहे। बाद में उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में राष्ट्रीय ज्ञान आयोग का नेतृत्व किया।
राष्ट्र प्रेस
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