संयुक्त राष्ट्र में भारत का कड़ा जवाब: अप्रमाणित रिपोर्टें यूएन की विश्वसनीयता घटा रही हैं
सारांश
मुख्य बातें
संयुक्त राष्ट्र महासभा की थर्ड कमेटी की न्यूयॉर्क में हुई बैठक में 17 अक्टूबर 2026 को भारत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि बिना पुष्टि वाली सुनी-सुनाई बातों पर आधारित मनमानी रिपोर्टें संयुक्त राष्ट्र (यूएन) और उससे जुड़ी संस्थाओं की विश्वसनीयता को गंभीर रूप से नुकसान पहुँचा रही हैं। भारत के राजनयिक अनुज स्वरूप ने शांतिपूर्ण सभा और संगठन बनाने की स्वतंत्रता पर यूएन की विशेष प्रतिवेदक जीना रोमेरो की रिपोर्ट को पूरी तरह खारिज कर दिया।
रिपोर्ट पर भारत की आपत्ति
विशेष प्रतिवेदक जीना रोमेरो की रिपोर्ट में दावा किया गया था कि भारत के कुछ युवाओं को मानसिक स्वास्थ्य या लैंगिक न्याय जैसे विषयों पर बोलने के कारण विरोध या सामाजिक कलंक का सामना करना पड़ा। हालाँकि, रिपोर्ट में इस दावे का एकमात्र आधार एक 'सबमिशन' बताया गया था और स्रोत की कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई थी।
स्वरूप ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, 'जब कोई पदाधिकारी गुमनाम सूचनाओं के आधार पर 1.4 अरब लोगों के बारे में सामान्य निष्कर्ष निकालता है, तो वह अपनी जिम्मेदारी के साथ न्याय नहीं करता।' उन्होंने जोड़ा कि दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी के खिलाफ गुमनाम और अप्रमाणित आरोपों के आधार पर लगाए गए व्यापक दावे कोई सबूत नहीं होते।
दोहरे मानदंडों पर भी उठाया सवाल
गौरतलब है कि यह इसी सप्ताह का दूसरा अवसर था जब भारत ने संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। बुधवार को भी स्वरूप ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर तुर्क पर अलग-अलग मामलों में अलग मानदंड अपनाने का आरोप लगाया था।
भारतीय राजनयिक ने तर्क दिया कि भारत के पड़ोसी देशों और पश्चिमी देशों में प्रदर्शनों पर हुई हिंसक कार्रवाइयों का कई बार रिपोर्टों में उल्लेख तक नहीं किया जाता। स्वरूप ने कहा, 'ऐसे दोहरे मानदंड लोगों का भरोसा कम करते हैं।'
भारतीय लोकतंत्र के उदाहरण
स्वरूप ने रिपोर्ट के भीतर मौजूद एक विरोधाभास की ओर ध्यान दिलाया — उसी रिपोर्ट में यह भी स्वीकार किया गया है कि भारत के युवाओं ने एक व्यंग्यात्मक राजनीतिक आंदोलन खड़ा किया। उन्होंने सवाल उठाया, 'किस दमनकारी देश में कोई व्यंग्यात्मक युवा पार्टी सरकार से सवाल पूछ सकती है, राजधानी तक मार्च कर सकती है और फिर देश के वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठकर बातचीत कर सकती है?' यह टिप्पणी कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संदर्भ में मानी जा रही है।
उन्होंने यह भी कहा कि सार्वजनिक परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों पर छात्रों के प्रदर्शन के बाद सरकार ने रचनात्मक संवाद किया और कुछ ही हफ्तों में संसद ने सार्वजनिक परीक्षा अधिनियम में संशोधन कर दिया। नए प्रावधानों में पेपर लीक पर सजा बढ़ाना, परीक्षा प्रणाली में सुधार और राज्यों में विशेष फास्ट-ट्रैक अदालतों की स्थापना शामिल है।
तुर्क के बयान का हवाला
स्वरूप ने कहा कि शायद जीना रोमेरो ने पिछले महीने मानवाधिकार परिषद में वोल्कर तुर्क का वह बयान नहीं देखा, जिसमें उन्होंने भारत में युवाओं के नेतृत्व वाले आंदोलनों के संदर्भ में संवाद की सराहना की थी। 7 सितंबर को तुर्क ने कहा था, 'भारत में हालिया प्रदर्शनों ने दिखाया कि युवाओं के नेतृत्व वाले आंदोलनों के मामले में सबसे अच्छा जवाब बातचीत है, न कि जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग।'
जीना रोमेरो की प्रतिक्रिया और आगे की राह
भारत की आलोचना के जवाब में जीना रोमेरो ने स्वीकार किया कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और यहाँ युवाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए कई संस्थागत व्यवस्थाएँ मौजूद हैं। हालाँकि उन्होंने यह भी कहा कि सड़कों पर विरोध कर रहे युवाओं की उपस्थिति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
यह टकराव संयुक्त राष्ट्र की विशेष प्रक्रियाओं की विश्वसनीयता और स्रोत-सत्यापन के मानकों पर व्यापक बहस को एक बार फिर केंद्र में ले आया है, और आने वाले सत्रों में भारत के रुख की गहन समीक्षा होना तय मानी जा रही है।