23 अक्टूबर 2026
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UN धार्मिक स्वतंत्रता रिपोर्ट पक्षपातपूर्ण, आतंकवाद की अनदेखी : भारत का कड़ा जवाब

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UN धार्मिक स्वतंत्रता रिपोर्ट पक्षपातपूर्ण, आतंकवाद की अनदेखी : भारत का कड़ा जवाब

सारांश

भारत ने संयुक्त राष्ट्र के मंच पर धार्मिक स्वतंत्रता रिपोर्ट को एकतरफा बताते हुए सीधे पाकिस्तान को घेरा — याद दिलाया कि 1999 के कारगिल युद्ध में उसने अपने सैनिकों के शव तक स्वीकार नहीं किए थे। यह भारत की बढ़ती कूटनीतिक मुखरता का ताज़ा उदाहरण है।

मुख्य बातें

भारत ने 23 अक्टूबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति में UN विशेष दूत नजीला घनेया की धार्मिक स्वतंत्रता रिपोर्ट को पक्षपातपूर्ण करार दिया।
भारतीय मिशन की प्रथम सचिव भाविका मंगलानंदन ने कहा कि रिपोर्ट में आतंकवाद के पीड़ितों की उपेक्षा की गई और आतंकवादियों के अधिकारों की अधिक वकालत की गई।
भारत ने आरोप लगाया कि कोविड-19 दौरान दफनाने संबंधी भेदभाव की चर्चा केवल ग्लोबल साउथ तक सीमित रखी गई; न्यूयॉर्क की सामूहिक कब्रों जैसी घटनाओं को नज़रअंदाज़ किया गया।
पाकिस्तान को याद दिलाया गया कि उसने 1999 के कारगिल युद्ध में अपने सैनिकों के शव स्वीकार करने से इनकार किया था, जबकि भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सैनिकों को इस्लामी रीति-रिवाजों के अनुसार दफनाया।
भारत ने कहा कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के अधिकार लगातार कम हो रहे हैं और उसे भारत को उपदेश देने का कोई अधिकार नहीं है।

संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति में भारत ने 23 अक्टूबर 2026 को धार्मिक स्वतंत्रता पर संयुक्त राष्ट्र की विशेष दूत नजीला घनेया की रिपोर्ट को पक्षपातपूर्ण करार दिया और कहा कि रिपोर्ट में आतंकवाद की गंभीरता को उचित महत्व नहीं दिया गया। संयुक्त राष्ट्र में भारतीय मिशन की प्रथम सचिव भाविका मंगलानंदन ने यह भी स्पष्ट किया कि जो देश अपने ही अल्पसंख्यकों की रक्षा नहीं कर सकता, उसे भारत को उपदेश देने का कोई अधिकार नहीं है — यह टिप्पणी पाकिस्तान की ओर से लगाए गए आरोपों के जवाब में की गई।

रिपोर्ट में क्या था और भारत की आपत्ति क्यों

विशेष दूत नजीला घनेया — जो ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून की प्रोफेसर हैं — की रिपोर्ट का विषय था 'असाधारण परिस्थितियों में धार्मिक या आस्था की स्वतंत्रता और अंतिम संस्कार के अधिकार'। रिपोर्ट में कथित तौर पर कहा गया था कि कश्मीर में सुरक्षा अभियानों के दौरान मारे गए कुछ लोगों के शव उनके परिवारों को नहीं सौंपे गए और उन्हें दूर-दराज़ के इलाकों में दफनाया गया।

रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया था कि नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के विरोध प्रदर्शनों के दौरान मारे गए कुछ लोगों के अंतिम संस्कार पर अधिकारियों ने 'कानून-व्यवस्था' के आधार पर कुछ प्रतिबंध लगाए। भारत ने इन दावों को संदर्भ से काटकर प्रस्तुत करने वाला बताया।

ग्लोबल साउथ पर एकतरफा फोकस का आरोप

मंगलानंदन ने कहा, 'रिपोर्ट को पढ़कर ऐसा लगता है कि कोविड-19 के दौरान सभी गलतियाँ और भेदभाव केवल ग्लोबल साउथ में ही हुए थे।' उन्होंने तर्क दिया कि विकसित देशों की समान घटनाओं को नज़रअंदाज़ करना रिपोर्ट की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है।

उन्होंने उदाहरण दिया कि न्यूयॉर्क शहर में कोविड-19 के दौरान हज़ारों मृतकों को शहर से दूर एक अलग द्वीप पर सामूहिक कब्रों में दफनाया गया था, लेकिन रिपोर्ट में ऐसी घटनाओं का कोई उल्लेख नहीं है। उन्होंने सवाल उठाया, 'विकसित देशों में हुई ऐसी ही दुखद घटनाओं का जिक्र न करके रिपोर्ट को क्या हासिल होता है?'

आतंकवाद के पीड़ितों की अनदेखी पर आपत्ति

भारत ने कहा कि रिपोर्ट में आतंकवादियों के अधिकारों की जोरदार वकालत तो की गई, लेकिन आतंकवाद के पीड़ितों के लिए वैसी संवेदनशीलता नहीं दिखाई गई। मंगलानंदन ने कहा, 'लोगों के दर्द और नुकसान से राजनीतिक फायदा उठाना ऐसा विषय नहीं होना चाहिए, जिसके आधार पर विशेष दूत अपनी रिपोर्ट तैयार करें।'

उन्होंने यह भी कहा, 'आतंकवादी मानव के सबसे बुनियादी अधिकार — यानी जीवन के अधिकार — का उल्लंघन करते हैं। वे न सिर्फ निर्दोष लोगों की जान लेते हैं, बल्कि पूरे देश की मानसिकता और मनोबल को भी नुकसान पहुँचाते हैं।' गौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत मानवाधिकार परिषद की ओर से नियुक्त किए जाते हैं और स्वतंत्र रूप से कार्य करते हैं।

पाकिस्तान को भारत का कड़ा जवाब

बैठक में पाकिस्तान द्वारा लगाए गए आरोपों को मंगलानंदन ने विडंबनापूर्ण करार दिया। उन्होंने कहा, 'यह बेहद विडंबना है कि एक ऐसा देश, जिसने 1999 के कारगिल युद्ध में मारे गए अपने सैनिकों के शव तक स्वीकार नहीं किए थे, वह आज धर्म, धार्मिक स्वतंत्रता और दफनाने के अधिकारों पर बड़े उत्साह से बोल रहा है।' उन्होंने यह भी बताया कि भारतीय सेना ने कई पाकिस्तानी सैनिकों को सैन्य सम्मान के साथ और इस्लामी रीति-रिवाजों के अनुसार दफनाया था।

मंगलानंदन ने कहा कि भारत पर लगातार टिप्पणी करने के बजाय पाकिस्तान को उस कश्मीर क्षेत्र पर ध्यान देना चाहिए जिस पर उसने अवैध कब्ज़ा कर रखा है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के अधिकार लगातार सिमट रहे हैं और उनके साथ दुर्व्यवहार की घटनाएँ नियमित रूप से सामने आती हैं।

आगे की स्थिति

भारत की यह प्रतिक्रिया संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच पर दी गई है, जो वैश्विक मानवाधिकार विमर्श में भारत की बढ़ती मुखरता को दर्शाती है। यह ऐसे समय में आई है जब भारत-पाकिस्तान के बीच कूटनीतिक तनाव पहले से ही उच्च स्तर पर है। विशेषज्ञों का मानना है कि संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टिंग में भौगोलिक संतुलन की कमी एक पुरानी आलोचना है, और भारत का यह रुख इस बहस को नए सिरे से केंद्र में ला सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि एक सुनियोजित आक्रामक रुख है — जो संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टिंग में संरचनात्मक पक्षपात के उस पुराने सवाल को फिर उठाती है जिसे ग्लोबल साउथ के कई देश महसूस करते हैं पर खुलकर नहीं कहते। कारगिल का संदर्भ विशेष रूप से तीखा है — यह पाकिस्तान की नैतिक साख को उसी के इतिहास से चुनौती देता है। हालाँकि, कश्मीर में दफनाने से जुड़े रिपोर्ट के दावों पर भारत ने तथ्यात्मक खंडन कम और राजनीतिक पलटवार अधिक किया — यह अंतर वैश्विक मंचों पर भारत की स्थिति को पूरी तरह निर्विवाद नहीं बनाता।
RashtraPress
23 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

संयुक्त राष्ट्र की धार्मिक स्वतंत्रता रिपोर्ट में भारत के बारे में क्या कहा गया था?
रिपोर्ट में कथित तौर पर कहा गया था कि कश्मीर में सुरक्षा अभियानों में मारे गए कुछ लोगों के शव परिवारों को नहीं सौंपे गए और दूर-दराज़ क्षेत्रों में दफनाए गए। इसके अलावा CAA विरोध प्रदर्शनों के दौरान मारे गए कुछ लोगों के अंतिम संस्कार पर भी 'कानून-व्यवस्था' के आधार पर प्रतिबंध लगाने का दावा किया गया था।
भारत ने रिपोर्ट को पक्षपातपूर्ण क्यों बताया?
भारत का कहना है कि रिपोर्ट में कोविड-19 दौरान दफनाने से जुड़ी समस्याओं का जिक्र केवल ग्लोबल साउथ के संदर्भ में किया गया, जबकि न्यूयॉर्क जैसे विकसित देशों की सामूहिक दफनाने की घटनाओं को नज़रअंदाज़ किया गया। साथ ही, रिपोर्ट में आतंकवाद के पीड़ितों के बजाय आतंकवादियों के अधिकारों पर अधिक ज़ोर दिया गया।
भारत ने पाकिस्तान को क्या जवाब दिया?
भारतीय मिशन की प्रथम सचिव भाविका मंगलानंदन ने कहा कि पाकिस्तान ने 1999 के कारगिल युद्ध में अपने ही सैनिकों के शव स्वीकार करने से इनकार किया था, जबकि भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सैनिकों को सैन्य सम्मान और इस्लामी रीति-रिवाजों के अनुसार दफनाया। जो देश अपने अल्पसंख्यकों की रक्षा नहीं कर सकता, उसे भारत को उपदेश देने का अधिकार नहीं है।
UN विशेष दूत नजीला घनेया कौन हैं?
नजीला घनेया ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून की प्रोफेसर हैं। वे संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद द्वारा धार्मिक या आस्था की स्वतंत्रता पर विशेष दूत के रूप में नियुक्त हैं और स्वतंत्र रूप से कार्य करती हैं।
यह मामला भारत-पाकिस्तान कूटनीति के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
यह घटना संयुक्त राष्ट्र के बहुपक्षीय मंच पर भारत-पाकिस्तान के बीच जारी कूटनीतिक तनाव का ताज़ा उदाहरण है। भारत ने न केवल रिपोर्ट को चुनौती दी, बल्कि पाकिस्तान के मानवाधिकार रिकॉर्ड को सीधे निशाना बनाया, जो भारत की बढ़ती कूटनीतिक आक्रामकता को दर्शाता है।
राष्ट्र प्रेस
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