भारत 'सबसे कठिन बाजार' — अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि ग्रीर का बड़ा बयान
सारांश
Key Takeaways
- अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीर ने 23 अप्रैल 2025 को भारत को अमेरिका के लिए सबसे कठिन व्यापारिक बाजारों में से एक बताया।
- हाउस वेज एंड मीन्स समिति के सामने ग्रीर ने कहा कि भारत को व्यापार समझौते के लिए राजी करना आसान नहीं है।
- अमेरिका भारत में डीडीजीएस, सोयाबीन मील और एथेनॉल के लिए बाजार पहुंच चाहता है।
- इसी सप्ताह वाशिंगटन डीसी में भारतीय व्यापार अधिकारियों और अमेरिकी प्रशासन के बीच द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर बातचीत हुई।
- भारत का कृषि क्षेत्र राजनीतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील है क्योंकि यह करोड़ों ग्रामीण परिवारों की आजीविका से जुड़ा है।
- अमेरिका की 'रेसिप्रोसिटी' नीति के तहत भारत पर अपने बाजार खोलने का दबाव लगातार बढ़ रहा है।
वाशिंगटन, 23 अप्रैल 2025 — अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीर ने हाउस वेज एंड मीन्स समिति के समक्ष स्पष्ट रूप से कहा कि भारत अमेरिका के लिए व्यापारिक दृष्टि से अब भी सबसे कठिन बाजारों में से एक बना हुआ है। उन्होंने बताया कि दोनों देश एक द्विपक्षीय व्यापार समझौते की दिशा में सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं, लेकिन कृषि क्षेत्र और बाजार पहुंच जैसे संवेदनशील मुद्दों पर अभी भी गंभीर चुनौतियां बनी हुई हैं।
ग्रीर का सीधा बयान — 'भारत को मनाना आसान नहीं'
जेमिसन ग्रीर ने समिति के सामने बेबाकी से कहा, "भारत को व्यापार समझौते के लिए तैयार करना कोई आसान काम नहीं है।" उनका कहना था कि भारत ने दशकों से अपने कृषि बाजार को ऊंचे शुल्कों और नीतिगत प्रतिबंधों के जरिए संरक्षित रखा है। यह बात तब सामने आई जब समिति में अमेरिकी कृषि उत्पादों के निर्यात विस्तार पर विचार-विमर्श हो रहा था।
अमेरिका विशेष रूप से भारत में डीडीजीएस (डिस्टिलर्स ड्राइड ग्रेन्स विद सॉल्यूबल्स), सोयाबीन मील और एथेनॉल जैसे उत्पादों के लिए व्यापक बाजार अवसर तलाश रहा है। ग्रीर ने डीडीजीएस को एक ऐसे संभावित क्षेत्र के रूप में रेखांकित किया जहां दोनों देश जल्दी सहमति बना सकते हैं, क्योंकि इससे भारत के घरेलू हित सीधे तौर पर प्रभावित नहीं होते।
वाशिंगटन में जारी है भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता
ग्रीर ने यह भी खुलासा किया कि इसी सप्ताह भारतीय व्यापार अधिकारियों की एक वरिष्ठ टीम वाशिंगटन डीसी में अमेरिकी प्रशासन के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत के लिए मौजूद थी। बुधवार को यह दौर की वार्ता संपन्न हुई जिसमें दोनों देशों के बीच एक व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA) की रूपरेखा पर चर्चा हुई।
हालांकि वार्ता की प्रगति धीमी है, फिर भी दोनों पक्ष उन क्षेत्रों की पहचान करने में जुटे हैं जहां आपसी सहमति संभव हो। ग्रीर ने माना कि भारत की पुरानी व्यापार नीतियों के कारण इस प्रक्रिया में समय लगेगा।
कृषि क्षेत्र — भारत का सबसे संवेदनशील मोर्चा
भारत में कृषि क्षेत्र केवल एक आर्थिक विषय नहीं, बल्कि करोड़ों ग्रामीण परिवारों की आजीविका का आधार है। यही कारण है कि भारत सरकार इस क्षेत्र में विदेशी उत्पादों को खुली छूट देने से हमेशा परहेज करती रही है। अमेरिकी नेता लंबे समय से यह शिकायत करते आए हैं कि उनके कृषि उत्पादों को भारतीय बाजार में उचित प्रवेश नहीं मिलता।
गौरतलब है कि 2020-21 में भारत में हुए कृषि कानूनों पर बड़े विरोध प्रदर्शन के बाद सरकार ने उन्हें वापस लिया था — यह घटना दर्शाती है कि कृषि नीति में किसी भी बदलाव की राजनीतिक कीमत कितनी बड़ी हो सकती है। ऐसे में अमेरिकी दबाव में भारत का कृषि बाजार खोलना घरेलू राजनीति के लिहाज से अत्यंत जटिल है।
अमेरिका की 'रेसिप्रोसिटी' नीति और भारत पर असर
ग्रीर ने स्पष्ट किया कि अमेरिका की मौजूदा व्यापार नीति 'पारस्परिकता' (Reciprocity) के सिद्धांत पर आधारित है — यानी जो देश अमेरिकी बाजार से लाभ उठाते हैं, उन्हें भी अपने बाजार उसी अनुपात में खोलने होंगे। यह नीति राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की व्यापार रणनीति की मूल धुरी है।
समिति में प्रतिनिधियों ने यह भी स्वीकार किया कि भारत ने कुछ उत्पादों पर पहले से शुल्क घटाए हैं, लेकिन अमेरिका को और व्यापक बदलाव की उम्मीद है। दूसरी ओर, भारत अपनी सेवा क्षेत्र और आईटी निर्यात के लिए अमेरिकी बाजार में बेहतर पहुंच की मांग रख सकता है — यह वार्ता का एक महत्वपूर्ण पहलू होगा।
रणनीतिक साझेदारी और व्यापारिक तनाव — एक साथ
पिछले एक दशक में भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार तेजी से बढ़ा है और भारत अब अमेरिका का एक अहम रणनीतिक एवं आर्थिक साझेदार बन चुका है, विशेषकर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के संदर्भ में। फिर भी टैरिफ, डिजिटल व्यापार नीति और कृषि बाजार पहुंच जैसे मुद्दों पर दोनों देशों के बीच समय-समय पर तनाव उभरता रहा है।
विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले महीनों में यदि दोनों देश किसी प्रारंभिक व्यापार पैकेज (Early Harvest Deal) पर सहमति बना लेते हैं, तो यह न केवल आर्थिक संबंधों को मजबूत करेगा बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भारत की भूमिका को भी और सुदृढ़ करेगा। अगले कुछ हफ्तों में वार्ता के अगले दौर पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी।