भारत-अमेरिका संबंधों की असली नींव लोगों के बीच का जुड़ाव: पूर्व राजदूत केनेथ जस्टर
सारांश
मुख्य बातें
भारत में अमेरिका के पूर्व राजदूत केनेथ आई. जस्टर ने 30 जून 2026 को वाशिंगटन में आयोजित अमेरिका-भारत रणनीतिक साझेदारी फोरम (USISPF) लीडरशिप समिट में कहा कि दोनों देशों के लोगों के बीच का मानवीय जुड़ाव ही वह अदृश्य धागा है जिसने कूटनीतिक उतार-चढ़ाव के बावजूद भारत और अमेरिका को एक-दूसरे से बाँधे रखा है। उन्होंने 1792 में कलकत्ता में स्थापित पहले अमेरिकी कॉन्सुलेट से लेकर आज की बहुआयामी वैश्विक रणनीतिक साझेदारी तक के सफर का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया।
ऐतिहासिक जड़ें: सदियों पुराना रिश्ता
जस्टर ने रेखांकित किया कि भारत और अमेरिका के बीच संबंध किसी आधुनिक रणनीतिक गणना से नहीं, बल्कि सदियों पुरानी साझेदारी से उपजे हैं। उन्होंने बताया कि अमेरिका ने पेरिस में अपना मिशन खोलने के कुछ ही वर्षों बाद, 1792 में कलकत्ता और 1794 में मद्रास में अपने दो सबसे शुरुआती विदेशी कूटनीतिक मिशन स्थापित किए थे। उन्होंने कहा, "भौगोलिक तौर पर इतने दूर कोई भी दो देश अमेरिका और भारत जितने करीब से नहीं जुड़े हुए हैं।"
जस्टर ने यह भी स्मरण कराया कि तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट ने भारत की स्वतंत्रता के लिए ब्रिटेन पर दबाव डाला था और अमेरिका ने सितंबर 1946 में — भारत के औपचारिक स्वतंत्रता से 11 महीने से भी पहले — भारत की अंतरिम सरकार के साथ राजनयिक संबंध स्थापित किए थे।
शीत युद्ध के बाद का नया अध्याय
पूर्व राजदूत ने बताया कि शीत युद्ध की समाप्ति के बाद 1991 के भारतीय आर्थिक सुधारों ने द्विपक्षीय संबंधों को नई गति दी। हालाँकि 1998 के भारतीय परमाणु परीक्षणों के बाद संबंधों को गहरा झटका लगा। इसके बाद अमेरिका के तत्कालीन उप-विदेश सचिव स्ट्रोब टैलबोट और भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह के बीच हुई बातचीत ने रिश्तों को पुनः पटरी पर लाया और तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की 2000 की भारत यात्रा का मार्ग प्रशस्त किया।
एक के बाद एक सरकारों ने बढ़ाया साझेदारी का दायरा
जस्टर ने रेखांकित किया कि पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने दुनिया के सबसे पुराने और सबसे बड़े लोकतंत्र के बीच संबंधों को बदलने की पहल की, जिसमें हाई टेक्नोलॉजी और सिविल न्यूक्लियर समझौता केंद्र में रहे। पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में भारत को 'बड़ा रक्षा साझेदार' का दर्जा मिला। पहले ट्रंप कार्यकाल में 2+2 मंत्रीस्तरीय डायलॉग की शुरुआत हुई और क्वाड को मंत्री स्तर पर पुनर्जीवित किया गया। पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन के समय क्वाड बैठकें नेताओं के स्तर तक पहुँचीं। उन्होंने कहा कि दूसरे ट्रंप कार्यकाल में रक्षा सहयोग और ऊर्जा सुरक्षा पर काम जारी रहा और पहली बार द्विपक्षीय व्यापार समझौते की कोशिश शुरू हुई।
व्यापार: 19 अरब डॉलर से 250 अरब डॉलर का सफर
जस्टर ने आँकड़ों के साथ बताया कि 2001 में — जब वे अमेरिकी वाणिज्य विभाग के अवर-सचिव थे — दोनों देशों के बीच वस्तुओं और सेवाओं का आपसी व्यापार मात्र 19 अरब डॉलर था, जो आज बढ़कर लगभग 250 अरब डॉलर हो गया है। उन्होंने कहा, "एक व्यापार समझौता पूरा होने से इसमें काफी आसानी होगी।" दोनों देश इस दशक के अंत तक इसे 500 अरब डॉलर तक पहुँचाने की उम्मीद रखते हैं।
लोगों का जुड़ाव: साझेदारी की असली ताकत
जस्टर ने जोर देकर कहा कि भारत-अमेरिका साझेदारी आज रक्षा, नॉन-प्रोलिफरेशन, काउंटर-टेररिज्म, व्यापार, निवेश, विज्ञान-तकनीक, स्वास्थ्य, ऊर्जा, कृषि, शिक्षा, अंतरिक्ष और समुद्र सहित मानवीय प्रयासों के लगभग हर क्षेत्र में फैल चुकी है। उन्होंने 2019 के ह्यूस्टन में 'हाउडी मोदी' और 2020 के अहमदाबाद में 'नमस्ते ट्रंप' आयोजनों को जन-स्तरीय सद्भावना के ठोस उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि 50 लाख से अधिक भारतीय-अमेरिकियों का अमेरिकी अर्थव्यवस्था और समाज पर गहरा प्रभाव है। जस्टर के शब्दों में, "हमारे लोगों के बीच का संबंध खास तौर पर ज़रूरी रहा है — कई तरह से, यह वह 'सीक्रेट सॉस' है जो हमें एक साथ बाँधे रखता है, सरकारी संबंधों के उतार-चढ़ाव के दौर में भी।"
समिट के अंत में जस्टर ने USISPF और उसके व्यापारिक नेताओं की साझेदारी को मजबूत करने में निभाई भूमिका की सराहना की। आने वाले समय में द्विपक्षीय व्यापार समझौते की दिशा में होने वाली प्रगति यह तय करेगी कि यह ऐतिहासिक रिश्ता अगले पड़ाव पर कितनी तेजी से पहुँचता है।