30 जून 2026
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भारत-अमेरिका संबंधों की असली नींव लोगों के बीच का जुड़ाव: पूर्व राजदूत केनेथ जस्टर

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भारत-अमेरिका संबंधों की असली नींव लोगों के बीच का जुड़ाव: पूर्व राजदूत केनेथ जस्टर

सारांश

पूर्व अमेरिकी राजदूत केनेथ जस्टर ने USISPF समिट में स्पष्ट किया कि भारत-अमेरिका संबंधों की असली नींव सरकारी समझौते नहीं, बल्कि दोनों देशों के लोगों के बीच का मानवीय जुड़ाव है — 1792 के कलकत्ता कॉन्सुलेट से लेकर आज के 250 अरब डॉलर के व्यापार तक।

मुख्य बातें

पूर्व अमेरिकी राजदूत केनेथ आई.
जस्टर ने 30 जून 2026 को USISPF लीडरशिप समिट, वाशिंगटन में भारत-अमेरिका संबंधों का ऐतिहासिक विश्लेषण प्रस्तुत किया।
अमेरिका ने 1792 में कलकत्ता और 1794 में मद्रास में अपने शुरुआती विदेशी कूटनीतिक मिशन स्थापित किए थे।
द्विपक्षीय व्यापार 2001 के 19 अरब डॉलर से बढ़कर आज 250 अरब डॉलर हो गया है; लक्ष्य इस दशक के अंत तक 500 अरब डॉलर का है।
50 लाख से अधिक भारतीय-अमेरिकी अमेरिकी अर्थव्यवस्था और समाज पर गहरा प्रभाव रखते हैं।
जस्टर ने 'हाउडी मोदी' ( 2019, ह्यूस्टन ) और 'नमस्ते ट्रंप' ( 2020, अहमदाबाद ) को जन-स्तरीय सद्भावना के प्रतीक बताया।
पहली बार द्विपक्षीय व्यापार समझौते की कोशिश दूसरे ट्रंप कार्यकाल में शुरू हुई।

भारत में अमेरिका के पूर्व राजदूत केनेथ आई. जस्टर ने 30 जून 2026 को वाशिंगटन में आयोजित अमेरिका-भारत रणनीतिक साझेदारी फोरम (USISPF) लीडरशिप समिट में कहा कि दोनों देशों के लोगों के बीच का मानवीय जुड़ाव ही वह अदृश्य धागा है जिसने कूटनीतिक उतार-चढ़ाव के बावजूद भारत और अमेरिका को एक-दूसरे से बाँधे रखा है। उन्होंने 1792 में कलकत्ता में स्थापित पहले अमेरिकी कॉन्सुलेट से लेकर आज की बहुआयामी वैश्विक रणनीतिक साझेदारी तक के सफर का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया।

ऐतिहासिक जड़ें: सदियों पुराना रिश्ता

जस्टर ने रेखांकित किया कि भारत और अमेरिका के बीच संबंध किसी आधुनिक रणनीतिक गणना से नहीं, बल्कि सदियों पुरानी साझेदारी से उपजे हैं। उन्होंने बताया कि अमेरिका ने पेरिस में अपना मिशन खोलने के कुछ ही वर्षों बाद, 1792 में कलकत्ता और 1794 में मद्रास में अपने दो सबसे शुरुआती विदेशी कूटनीतिक मिशन स्थापित किए थे। उन्होंने कहा, "भौगोलिक तौर पर इतने दूर कोई भी दो देश अमेरिका और भारत जितने करीब से नहीं जुड़े हुए हैं।"

जस्टर ने यह भी स्मरण कराया कि तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट ने भारत की स्वतंत्रता के लिए ब्रिटेन पर दबाव डाला था और अमेरिका ने सितंबर 1946 में — भारत के औपचारिक स्वतंत्रता से 11 महीने से भी पहले — भारत की अंतरिम सरकार के साथ राजनयिक संबंध स्थापित किए थे।

शीत युद्ध के बाद का नया अध्याय

पूर्व राजदूत ने बताया कि शीत युद्ध की समाप्ति के बाद 1991 के भारतीय आर्थिक सुधारों ने द्विपक्षीय संबंधों को नई गति दी। हालाँकि 1998 के भारतीय परमाणु परीक्षणों के बाद संबंधों को गहरा झटका लगा। इसके बाद अमेरिका के तत्कालीन उप-विदेश सचिव स्ट्रोब टैलबोट और भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह के बीच हुई बातचीत ने रिश्तों को पुनः पटरी पर लाया और तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की 2000 की भारत यात्रा का मार्ग प्रशस्त किया।

एक के बाद एक सरकारों ने बढ़ाया साझेदारी का दायरा

जस्टर ने रेखांकित किया कि पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने दुनिया के सबसे पुराने और सबसे बड़े लोकतंत्र के बीच संबंधों को बदलने की पहल की, जिसमें हाई टेक्नोलॉजी और सिविल न्यूक्लियर समझौता केंद्र में रहे। पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में भारत को 'बड़ा रक्षा साझेदार' का दर्जा मिला। पहले ट्रंप कार्यकाल में 2+2 मंत्रीस्तरीय डायलॉग की शुरुआत हुई और क्वाड को मंत्री स्तर पर पुनर्जीवित किया गया। पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन के समय क्वाड बैठकें नेताओं के स्तर तक पहुँचीं। उन्होंने कहा कि दूसरे ट्रंप कार्यकाल में रक्षा सहयोग और ऊर्जा सुरक्षा पर काम जारी रहा और पहली बार द्विपक्षीय व्यापार समझौते की कोशिश शुरू हुई।

व्यापार: 19 अरब डॉलर से 250 अरब डॉलर का सफर

जस्टर ने आँकड़ों के साथ बताया कि 2001 में — जब वे अमेरिकी वाणिज्य विभाग के अवर-सचिव थे — दोनों देशों के बीच वस्तुओं और सेवाओं का आपसी व्यापार मात्र 19 अरब डॉलर था, जो आज बढ़कर लगभग 250 अरब डॉलर हो गया है। उन्होंने कहा, "एक व्यापार समझौता पूरा होने से इसमें काफी आसानी होगी।" दोनों देश इस दशक के अंत तक इसे 500 अरब डॉलर तक पहुँचाने की उम्मीद रखते हैं।

लोगों का जुड़ाव: साझेदारी की असली ताकत

जस्टर ने जोर देकर कहा कि भारत-अमेरिका साझेदारी आज रक्षा, नॉन-प्रोलिफरेशन, काउंटर-टेररिज्म, व्यापार, निवेश, विज्ञान-तकनीक, स्वास्थ्य, ऊर्जा, कृषि, शिक्षा, अंतरिक्ष और समुद्र सहित मानवीय प्रयासों के लगभग हर क्षेत्र में फैल चुकी है। उन्होंने 2019 के ह्यूस्टन में 'हाउडी मोदी' और 2020 के अहमदाबाद में 'नमस्ते ट्रंप' आयोजनों को जन-स्तरीय सद्भावना के ठोस उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि 50 लाख से अधिक भारतीय-अमेरिकियों का अमेरिकी अर्थव्यवस्था और समाज पर गहरा प्रभाव है। जस्टर के शब्दों में, "हमारे लोगों के बीच का संबंध खास तौर पर ज़रूरी रहा है — कई तरह से, यह वह 'सीक्रेट सॉस' है जो हमें एक साथ बाँधे रखता है, सरकारी संबंधों के उतार-चढ़ाव के दौर में भी।"

समिट के अंत में जस्टर ने USISPF और उसके व्यापारिक नेताओं की साझेदारी को मजबूत करने में निभाई भूमिका की सराहना की। आने वाले समय में द्विपक्षीय व्यापार समझौते की दिशा में होने वाली प्रगति यह तय करेगी कि यह ऐतिहासिक रिश्ता अगले पड़ाव पर कितनी तेजी से पहुँचता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह एक असुविधाजनक सच्चाई को ढक देता है — भारत-अमेरिका संबंध बार-बार सरकारी फैसलों के कारण संकट में आए हैं, न कि जन-भावना के कारण। 1998 के परमाणु परीक्षण के बाद लगे प्रतिबंध और व्यापार विवाद इसके ताजा उदाहरण हैं। 500 अरब डॉलर का व्यापार लक्ष्य महत्वाकांक्षी है, लेकिन टैरिफ और वीज़ा नीतियों पर जारी घर्षण को देखते हुए यह बिना ठोस व्यापार समझौते के हासिल होना कठिन है। असली परीक्षा यह है कि क्या यह 'सीक्रेट सॉस' भविष्य के भू-राजनीतिक दबावों में भी उतना ही कारगर साबित होगा।
RashtraPress
30 जून 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पूर्व अमेरिकी राजदूत केनेथ जस्टर ने USISPF समिट में क्या कहा?
जस्टर ने कहा कि दोनों देशों के लोगों के बीच का मानवीय जुड़ाव ही भारत-अमेरिका संबंधों की असली ताकत है, जिसने कूटनीतिक उतार-चढ़ाव के दौर में भी दोनों देशों को बाँधे रखा। उन्होंने 1792 से लेकर आज तक के संबंधों का ऐतिहासिक विवरण प्रस्तुत किया।
भारत और अमेरिका के बीच व्यापार कितना बढ़ा है?
जस्टर के अनुसार, 2001 में दोनों देशों के बीच वस्तुओं और सेवाओं का व्यापार मात्र 19 अरब डॉलर था, जो आज बढ़कर लगभग 250 अरब डॉलर हो गया है। दोनों देश इस दशक के अंत तक इसे 500 अरब डॉलर तक पहुँचाने की उम्मीद रखते हैं।
अमेरिका ने भारत में अपना पहला कूटनीतिक मिशन कब स्थापित किया था?
जस्टर ने बताया कि अमेरिका ने 1792 में कलकत्ता में और 1794 में मद्रास में अपने दो सबसे शुरुआती विदेशी कूटनीतिक मिशन स्थापित किए थे — यह पेरिस में अमेरिकी मिशन खुलने के कुछ ही वर्षों बाद हुआ।
भारत-अमेरिका संबंधों में 1998 के परमाणु परीक्षण का क्या असर पड़ा?
भारत के 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद दोनों देशों के संबंधों को गहरा झटका लगा। इसके बाद अमेरिकी उप-विदेश सचिव स्ट्रोब टैलबोट और भारतीय विदेश मंत्री जसवंत सिंह के बीच हुई बातचीत ने रिश्तों को पटरी पर लाया और राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की 2000 की भारत यात्रा का रास्ता बनाया।
USISPF क्या है और इसमें जस्टर ने क्यों हिस्सा लिया?
USISPF यानी अमेरिका-भारत रणनीतिक साझेदारी फोरम एक प्रमुख द्विपक्षीय व्यापार और नीति संगठन है जो दोनों देशों के व्यापारिक व नीतिगत नेताओं को एक मंच पर लाता है। जस्टर ने इसके लीडरशिप समिट में भारत-अमेरिका संबंधों के ऐतिहासिक और भविष्योन्मुखी पहलुओं पर विचार रखे।
राष्ट्र प्रेस
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