ईरानी विदेश मंत्री अराघची पाकिस्तान, ओमान और रूस दौरे पर रवाना, क्षेत्रीय तनाव के बीच बड़ी कूटनीतिक पहल
सारांश
Key Takeaways
- ईरानी विदेश मंत्री अराघची शुक्रवार रात पाकिस्तान, ओमान और रूस की तीन देशों की कूटनीतिक यात्रा पर रवाना हुए।
- यात्रा का उद्देश्य क्षेत्रीय घटनाक्रमों पर परामर्श और द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करना है।
- यात्रा से पहले अराघची ने पाकिस्तानी उप प्रधानमंत्री इशाक डार से युद्धविराम और क्षेत्रीय हालात पर फोन पर बात की।
- ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिका ईरान के 75%25 सैन्य लक्ष्यों को निशाना बना चुका है और शेष 25%25 पर कार्रवाई का विकल्प खुला है।
- ओमान ईरान-अमेरिका के बीच गुप्त कूटनीति का ऐतिहासिक केंद्र रहा है, जो इस दौरे को विशेष महत्व देता है।
- यह दौरा ईरान-अमेरिका परमाणु वार्ता के अगले संभावित दौर से पहले तेहरान की रणनीतिक तैयारी का हिस्सा माना जा रहा है।
तेहरान, 25 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। अमेरिका के बढ़ते सैन्य दबाव और पश्चिम एशिया में गहराते तनाव के बीच ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची शुक्रवार रात पाकिस्तान, ओमान और रूस की तीन देशों की महत्वपूर्ण कूटनीतिक यात्रा पर रवाना हुए। इस दौरे का प्रमुख उद्देश्य साझेदार देशों के साथ द्विपक्षीय संबंधों को प्रगाढ़ करना और क्षेत्र में चल रहे घटनाक्रमों पर समन्वय स्थापित करना है।
तीन देशों की यात्रा — मकसद और रणनीति
अराघची ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट 'एक्स' पर लिखा, ''इस्लामाबाद, मस्कट और मॉस्को की यात्रा पर निकल रहा हूं। इन यात्राओं का उद्देश्य हमारे साझेदारों के साथ द्विपक्षीय मामलों पर निकट समन्वय स्थापित करना और क्षेत्रीय घटनाक्रमों पर परामर्श करना है। हमारे पड़ोसी हमारी प्राथमिकता हैं।''
ईरान की सरकारी समाचार एजेंसी आईआरएनए के अनुसार, इस यात्रा का केंद्रबिंदु पश्चिम एशिया के मौजूदा हालात और क्षेत्र में हाल में घटी घटनाओं पर साझेदार देशों से विचार-विमर्श करना है। यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब ईरान पर अमेरिकी दबाव चरम पर है।
पाकिस्तान से पहले हुई फोन वार्ता
यात्रा से पहले अराघची ने पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री इशाक डार से टेलीफोन पर बातचीत की। इस वार्ता में क्षेत्रीय हालात और युद्धविराम (सीजफायर) की संभावनाओं पर चर्चा हुई।
पाकिस्तान की यात्रा इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि इस्लामाबाद परंपरागत रूप से ईरान और पश्चिमी देशों के बीच एक अनौपचारिक मध्यस्थ की भूमिका निभाता रहा है। 2024 में दोनों देशों के बीच सीमा तनाव के बाद जो कूटनीतिक दूरी बनी थी, वह अब धीरे-धीरे पाटी जा रही है।
ट्रंप की चेतावनी और ईरान की कूटनीतिक प्रतिक्रिया
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में स्पष्ट संकेत दिए हैं कि अगर ईरान के साथ परमाणु वार्ता विफल रही, तो अमेरिका फिर से सैन्य कार्रवाई कर सकता है। उन्होंने कहा, ''मैं अभी तुरंत समझौता कर सकता हूं… लेकिन मैं एक स्थायी समझौता चाहता हूं।''
ट्रंप का दावा है कि अमेरिका ने ईरान के करीब 75 प्रतिशत सैन्य लक्ष्यों को पहले ही निशाना बना लिया है और ईरान की नौसेना, वायुसेना व मिसाइल प्रणाली को भारी नुकसान पहुंचाया है। उन्होंने यह भी कहा कि शेष 25 प्रतिशत लक्ष्यों पर सैन्य कार्रवाई का विकल्प खुला है।
विश्लेषकों का मानना है कि अराघची की यह तीन देशों की यात्रा दरअसल ट्रंप के दबाव के जवाब में ईरान की कूटनीतिक काउंटर-स्ट्रैटेजी का हिस्सा है — जहां तेहरान अपने पड़ोसी और रणनीतिक साझेदारों को एकजुट कर अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहा है।
ओमान और रूस की भूमिका — क्यों अहम हैं ये दोनों देश
ओमान ऐतिहासिक रूप से ईरान और अमेरिका के बीच पर्दे के पीछे की कूटनीति में मध्यस्थ की भूमिका निभाता रहा है। 2013-2015 के ईरान परमाणु समझौते (JCPOA) की प्रारंभिक गुप्त वार्ताएं भी मस्कट में ही हुई थीं। ऐसे में अराघची की ओमान यात्रा को किसी नई पर्दे की कूटनीति की शुरुआत के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
रूस ईरान का सबसे बड़ा रणनीतिक साझेदार है। यूक्रेन युद्ध के बाद से दोनों देशों के बीच सैन्य और आर्थिक सहयोग और गहरा हुआ है। मॉस्को यात्रा के दौरान संभावित रूप से ईरान की सुरक्षा गारंटी और अमेरिकी प्रतिबंधों से राहत के विकल्पों पर चर्चा हो सकती है।
क्षेत्रीय प्रभाव और आगे की राह
यह दौरा ऐसे नाजुक दौर में हो रहा है जब हाल की झड़पों के बाद हालात थोड़े शांत हुए हैं, लेकिन स्थायी स्थिरता अभी दूर है। ईरान एक साथ कई मोर्चों पर दबाव झेल रहा है — अमेरिकी सैन्य खतरा, आर्थिक प्रतिबंध और घरेलू असंतोष।
अगर अराघची की यह कूटनीतिक पहल सफल रही, तो ईरान को वार्ता की मेज पर मजबूत स्थिति से बैठने का अवसर मिल सकता है। आने वाले हफ्तों में ईरान-अमेरिका परमाणु वार्ता के अगले दौर की संभावनाओं पर सबकी नजरें टिकी रहेंगी।