29 सितंबर 2026
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यूएन महासभा में यूएई के द्वीप दावों पर ईरान की दो-टूक: 'झूठे आरोपों से हकीकत नहीं बदलती'

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यूएन महासभा में यूएई के द्वीप दावों पर ईरान की दो-टूक: 'झूठे आरोपों से हकीकत नहीं बदलती'

सारांश

यूएन महासभा के मंच पर यूएई के तीन द्वीपों संबंधी दावों पर ईरान के उपविदेश मंत्री गरीबाबादी ने कड़ा जवाब दिया। 1971 से जारी इस विवाद में होर्मुज जलसंधि और खाड़ी की भू-राजनीति दाँव पर है।

मुख्य बातें

ईरान के उपविदेश मंत्री काजम गरीबाबादी ने 29 सितंबर 2026 को यूएई के द्वीप दावों को 'बेबुनियाद' बताते हुए खारिज किया।
ग्रेटर टुनब, लेसर टुनब और अबू मूसा को ईरान अपने क्षेत्र का अभिन्न अंग मानता है।
यूएई के मंत्री खलीफा शाहीन अल मरार ने द्विपक्षीय वार्ता या अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के माध्यम से शांतिपूर्ण समाधान की माँग की।
ईरान ने 1971 में इन द्वीपों पर नियंत्रण किया था; आईआरजीसी के सैन्य ठिकाने वहाँ मौजूद हैं।
ये द्वीप होर्मुज जलसंधि के निकट रणनीतिक स्थान पर हैं, जहाँ से वैश्विक तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है।

ईरान के कानूनी और अंतरराष्ट्रीय मामलों के उपविदेश मंत्री काजम गरीबाबादी ने 29 सितंबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) द्वारा लगाए गए तीन द्वीपों पर कब्जे के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि संयुक्त राष्ट्र के मंच पर झूठे दावे दोहराने से ज़मीनी हकीकत नहीं बदलती। गरीबाबादी ने स्पष्ट किया कि ग्रेटर टुनब, लेसर टुनब और अबू मूसा ईरान के अभिन्न अंग हैं और इन्हें किसी भी परिस्थिति में अलग नहीं किया जा सकता।

गरीबाबादी का कड़ा जवाब

गरीबाबादी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, 'ईरानी द्वीपों को लेकर बिना आधार के दावों को बार-बार दोहराने से हकीकत नहीं बदलती, भले ही ये दावे संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच से ही क्यों न किए जाएं। ग्रेटर टुनब, लेसर टुनब और अबू मूसा ईरान के क्षेत्र का ऐसा हिस्सा हैं, जिन्हें उससे अलग नहीं किया जा सकता।'

उन्होंने आगे कहा कि यूएई के अधिकारियों को बेबुनियाद दावे दोहराने की बजाय 'अच्छे पड़ोसी संबंधों की जरूरतों का सम्मान करना चाहिए और इस क्षेत्र की ऐतिहासिक और कानूनी सच्चाइयों को स्वीकार करना चाहिए।'

यूएई ने क्या आरोप लगाया

यूएई के विदेश मामलों के राज्य मंत्री खलीफा शाहीन अल मरार ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में ग्रेटर टुनब, लेसर टुनब और अबू मूसा द्वीपों का मुद्दा उठाते हुए ईरान पर अवैध कब्जे का आरोप लगाया। अल मरार ने कहा कि ये द्वीप होर्मुज जलसंधि तक पहुंच के लिहाज से रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

उन्होंने कहा, 'ईरान ने तीन अमीराती द्वीपों पर अपना कब्जा जारी रखा है, जिसे हम स्वीकार नहीं करते। यूएई लगातार इस विवाद के शांतिपूर्ण समाधान की मांग करता रहा है — इसे सीधे बातचीत के जरिए या अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में ले जाकर सुलझाया जा सकता है।'

विवाद की पृष्ठभूमि

ईरान ने 1971 में इन तीनों द्वीपों पर नियंत्रण स्थापित किया था। तब से यह क्षेत्र खाड़ी की भू-राजनीति में एक स्थायी विवाद बिंदु बना हुआ है। ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) के सैन्य ठिकाने भी इन द्वीपों पर मौजूद हैं। रिपोर्टों के अनुसार, खाड़ी में हाल के संघर्ष के दौरान अमेरिका ने अबू मूसा और ग्रेटर टुनब पर हमले किए।

यह ऐसे समय में आया है जब खाड़ी क्षेत्र में तनाव पहले से ऊँचे स्तर पर है और होर्मुज जलसंधि से गुजरने वाले वैश्विक तेल व्यापार की सुरक्षा को लेकर अंतरराष्ट्रीय चिंताएँ बढ़ी हैं। अल मरार ने जहाजों की 'स्वतंत्र और सुरक्षित आवाजाही' के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानून और समुद्री कानून के तहत सप्लाई चेन, व्यापार और ऊर्जा की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करना अनिवार्य है।

यूएई का रुख और आगे की राह

अल मरार ने इस दौरान यूएई की व्यापक विदेश नीति का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि तमाम संकटों के बावजूद यूएई ने विकास और प्रगति की अपनी कोशिश जारी रखी है — 'इस देश का निर्माण चुनौतियों की गैरमौजूदगी में नहीं हुआ, बल्कि उनका सामना करते हुए हुआ है।'

गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब यूएई ने संयुक्त राष्ट्र मंच पर इस मुद्दे को उठाया हो — खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के सदस्य देश भी नियमित रूप से इन द्वीपों पर ईरान के नियंत्रण की आलोचना करते आए हैं। दोनों देशों के बीच यह विवाद तब तक अनसुलझा रहने की आशंका है जब तक कोई द्विपक्षीय वार्ता या अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता का ठोस ढाँचा नहीं बनता।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि होर्मुज जलसंधि के नियंत्रण और खाड़ी में शक्ति-संतुलन का है — एक तथ्य जिसे मुख्यधारा की कवरेज अक्सर नज़रअंदाज़ करती है। ईरान का 1971 से इन द्वीपों पर भौतिक नियंत्रण एक ज़मीनी हकीकत है, जबकि यूएई का अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दावा एक राजनयिक दबाव की रणनीति — दोनों के बीच की खाई को भरने के लिए न तो द्विपक्षीय वार्ता आगे बढ़ी है, न ही अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में कोई औपचारिक प्रक्रिया शुरू हुई है। खाड़ी में हाल के अमेरिकी सैन्य हमलों की पृष्ठभूमि में यह राजनयिक आदान-प्रदान और भी महत्वपूर्ण हो जाता है — असली सवाल यह है कि क्या कोई पक्ष वास्तव में कूटनीतिक समाधान चाहता है, या यूएन का मंच महज़ घरेलू दर्शकों के लिए है।
RashtraPress
29 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ईरान और यूएई के बीच तीन द्वीपों का विवाद क्या है?
यह विवाद खाड़ी में स्थित तीन द्वीपों — ग्रेटर टुनब, लेसर टुनब और अबू मूसा — के स्वामित्व को लेकर है। ईरान ने 1971 में इन पर नियंत्रण स्थापित किया था और इन्हें अपने क्षेत्र का अभिन्न अंग मानता है, जबकि यूएई इन्हें अपने अमीरात रास अल खैमाह और शारजाह का हिस्सा बताता है।
यूएन महासभा में यूएई ने क्या माँग की?
यूएई के विदेश मामलों के राज्य मंत्री खलीफा शाहीन अल मरार ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में ईरान पर अवैध कब्जे का आरोप लगाते हुए द्विपक्षीय वार्ता या अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के माध्यम से शांतिपूर्ण समाधान की माँग की। उन्होंने होर्मुज जलसंधि में समुद्री आवाजाही की स्वतंत्रता और सुरक्षा पर भी जोर दिया।
ईरान ने यूएई के आरोपों का जवाब कैसे दिया?
ईरान के उपविदेश मंत्री काजम गरीबाबादी ने एक्स पर पोस्ट करते हुए यूएई के दावों को 'बिना आधार' का बताया और कहा कि संयुक्त राष्ट्र मंच पर झूठे दावे दोहराने से हकीकत नहीं बदलती। उन्होंने यूएई से अच्छे पड़ोसी संबंधों का सम्मान करने और क्षेत्र की ऐतिहासिक व कानूनी सच्चाइयों को स्वीकार करने की अपील की।
ये तीन द्वीप रणनीतिक रूप से क्यों महत्वपूर्ण हैं?
ग्रेटर टुनब, लेसर टुनब और अबू मूसा होर्मुज जलसंधि के निकट स्थित हैं, जो वैश्विक तेल व्यापार का एक प्रमुख मार्ग है। इन द्वीपों पर ईरान के आईआरजीसी के सैन्य ठिकाने भी हैं, जिससे खाड़ी की सुरक्षा और ऊर्जा आपूर्ति की दृष्टि से इनका महत्व और भी बढ़ जाता है।
इस विवाद का अब तक समाधान क्यों नहीं निकला?
ईरान इन द्वीपों पर किसी भी तरह की वार्ता को अपनी संप्रभुता पर समझौता मानता है, जबकि यूएई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दावा करता रहा है। 1971 से जारी इस गतिरोध में न तो सार्थक द्विपक्षीय वार्ता हुई है और न ही मामला अंतरराष्ट्रीय न्यायालय तक पहुँचा है, जिससे विवाद अनसुलझा बना हुआ है।
राष्ट्र प्रेस
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