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लेबनान पर इजरायली हमले: ईरान ने यूएनएससी से माँगा जवाब, अमेरिकी भूमिका पर उठाए तीखे सवाल

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लेबनान पर इजरायली हमले: ईरान ने यूएनएससी से माँगा जवाब, अमेरिकी भूमिका पर उठाए तीखे सवाल

सारांश

ईरान के उप-विदेश मंत्री गरीबाबादी ने यूएनएससी को सीधी चुनौती दी — इजरायल पर बाध्यकारी कार्रवाई करो, वरना अंतरराष्ट्रीय कानून महज कागज़ी निंदा बनकर रह जाएगा। ट्रंप के बेरूत दावे को उन्होंने शांति-प्रयास नहीं, बल्कि अमेरिकी संलिप्तता का सबूत बताया।

मुख्य बातें

ईरान के उप-विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने यूएनएससी से इजरायल के खिलाफ 'दंडात्मक और बाध्यकारी निर्णय' लेने की माँग की।
गरीबाबादी ने एक्स पर कहा कि 'अंतरराष्ट्रीय कानून केवल कमजोर और प्रभावहीन निंदा से लागू नहीं होता।' अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि उन्होंने नेतन्याहू से बातचीत कर बेरूत पर सैन्य कार्रवाई रुकवाई और हिज्बुल्लाह से भी हमले रोकने का समझौता कराया।
ईरान ने ट्रंप के दावे को शांति-प्रयास नहीं, बल्कि अमेरिका की सीधी संलिप्तता का प्रमाण बताया।
ईरान की अर्ध-सरकारी एजेंसी तस्नीम के अनुसार, लेबनान हमलों के विरोध में ईरान ने मध्यस्थ के ज़रिए अमेरिका से संदेश-आदान-प्रदान रोक दिया है।

ईरान के उप-विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा है कि परिषद इजरायल को जवाबदेह ठहराने में बुरी तरह विफल रही है। उन्होंने माँग की कि यूएनएससी महज 'चिंता व्यक्त करने के चरण से आगे बढ़े' और इजरायल के विरुद्ध 'दंडात्मक और बाध्यकारी निर्णय' ले। 2 जून को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर की गई इस पोस्ट ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है।

गरीबाबादी का यूएनएससी पर सीधा हमला

गरीबाबादी ने एक्स पर लिखा कि पश्चिम एशिया का मौजूदा संकट 'इजरायली शासन के अपराधों और सजा से उन्हें मुक्त रखने का नतीजा है, जो सरकारों की संप्रभुता का उल्लंघन करता है, युद्धविराम को अर्थहीन बनाता है और फिलिस्तीनियों के पवित्र स्थलों का अपमान करता है।' उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, 'अंतरराष्ट्रीय कानून केवल कमजोर और प्रभावहीन निंदा से लागू नहीं होता।'

यह बयान ऐसे समय में आया है जब लेबनान पर इजरायली सैन्य कार्रवाइयों को लेकर वैश्विक स्तर पर आलोचना तेज हो रही है और यूएनएससी में स्थायी सदस्यों के बीच गहरे मतभेद उजागर हो चुके हैं।

ट्रंप के दावे पर ईरान की तीखी प्रतिक्रिया

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को एक सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा था कि उन्होंने इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ बातचीत में तय किया कि बेरूत पर कोई सैन्य टुकड़ी नहीं भेजी जाएगी और जो रास्ते में हैं उन्हें वापस बुला लिया जाएगा। ट्रंप ने यह भी कहा कि हिज्बुल्लाह के प्रतिनिधियों से बातचीत हुई और दोनों पक्ष हमले रोकने पर सहमत हुए।

गरीबाबादी ने इस दावे को अमेरिका की शांति-प्रयास की मिसाल मानने से इनकार करते हुए कहा कि यह दरअसल इस बात का प्रमाण है कि अमेरिका सीधे तौर पर इजरायल की सैन्य कार्रवाइयों को 'मैनेज' करने में शामिल है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि किसी स्वतंत्र देश की राजधानी पर हमले का निर्णय एक फोन कॉल से बदल सकता है, तो महीनों तक युद्धविराम उल्लंघन, लेबनान पर हमले, नागरिकों का विस्थापन और संप्रभुता की धमकियाँ क्यों जारी रहीं।

ईरान ने अमेरिका से संदेश-आदान-प्रदान रोका

ईरान की अर्ध-सरकारी न्यूज़ एजेंसी तस्नीम ने शीर्ष अधिकारियों के हवाले से बताया कि लेबनान पर हमलों के कारण ईरान ने मध्यस्थ के ज़रिए अमेरिका से संदेशों का आदान-प्रदान रोक दिया है। यह कदम दोनों देशों के बीच पहले से तनावपूर्ण संबंधों को और जटिल बनाता है।

गौरतलब है कि यह ऐसे समय में हुआ है जब ईरान-अमेरिका के बीच परमाणु वार्ता की संभावनाओं पर भी चर्चा चल रही थी, और इस कदम को कूटनीतिक विशेषज्ञ एक महत्वपूर्ण संकेत मान रहे हैं।

व्यापक संदर्भ और अंतरराष्ट्रीय निहितार्थ

यह विवाद उस बड़े सवाल को फिर से केंद्र में ला देता है कि क्या यूएनएससी पश्चिम एशिया के संकट में प्रभावी भूमिका निभाने में सक्षम है। आलोचकों का कहना है कि स्थायी सदस्यों के वीटो अधिकार ने परिषद को बार-बार निष्प्रभावी बनाया है। ईरान के इस बयान को इस व्यापक असंतोष की एक और अभिव्यक्ति के रूप में देखा जा रहा है।

आने वाले दिनों में यूएनएससी की बैठकों और ईरान-अमेरिका के बीच कूटनीतिक संपर्क की स्थिति पर सभी की नज़रें टिकी रहेंगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि यूएनएससी में वीटो की दीवार के रहते ईरान की यह माँग कितनी व्यावहारिक है। ट्रंप के 'एक फोन कॉल' वाले दावे को ईरान ने जिस तरह पलटा है, वह अमेरिकी कूटनीति की दोहरी भूमिका पर पुरानी बहस को नए सिरे से खोलता है। लेबनान पर हमलों के बाद ईरान का अमेरिका से संवाद तोड़ना संकेत देता है कि तेहरान अब सीधे टकराव की मुद्रा में है — और यह क्षेत्रीय स्थिरता के लिए एक नई जटिलता है जिसे मुख्यधारा की कवरेज अक्सर नज़रअंदाज़ करती है।
RashtraPress
20 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ईरान ने यूएनएससी से क्या माँग की है?
ईरान के उप-विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने यूएनएससी से माँग की है कि वह 'चिंता व्यक्त करने के चरण से आगे बढ़े' और इजरायल के खिलाफ 'दंडात्मक और बाध्यकारी निर्णय' ले। उनका कहना है कि अंतरराष्ट्रीय कानून केवल निंदा प्रस्तावों से लागू नहीं होता।
ट्रंप ने बेरूत को लेकर क्या दावा किया था?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा कि उन्होंने नेतन्याहू से बातचीत कर बेरूत पर सैन्य कार्रवाई रुकवाई और हिज्बुल्लाह से भी हमले रोकने का समझौता कराया। ट्रंप के अनुसार दोनों पक्ष एक-दूसरे को निशाना नहीं बनाने पर सहमत हुए।
ईरान ने अमेरिका से संवाद क्यों रोका?
ईरान की अर्ध-सरकारी एजेंसी तस्नीम के अनुसार, लेबनान पर इजरायली हमलों के विरोध में ईरान ने मध्यस्थ के ज़रिए अमेरिका से संदेशों का आदान-प्रदान रोक दिया है। यह कदम दोनों देशों के बीच पहले से तनावपूर्ण कूटनीतिक संबंधों को और जटिल बनाता है।
गरीबाबादी ने ट्रंप के दावे को किस रूप में देखा?
गरीबाबादी ने ट्रंप के दावे को शांति-प्रयास नहीं, बल्कि इस बात का प्रमाण बताया कि अमेरिका सीधे तौर पर इजरायल की सैन्य कार्रवाइयों को 'मैनेज' करने में शामिल है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि एक फोन कॉल से हमला रुक सकता है, तो महीनों तक युद्धविराम उल्लंघन और नागरिकों का विस्थापन क्यों जारी रहा।
इस विवाद का पश्चिम एशिया की स्थिति पर क्या असर पड़ सकता है?
ईरान का अमेरिका से संवाद तोड़ना और यूएनएससी पर बाध्यकारी कार्रवाई की माँग क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ा सकती है। कूटनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, इससे ईरान-अमेरिका परमाणु वार्ता की संभावनाएँ भी प्रभावित हो सकती हैं।
राष्ट्र प्रेस
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