लेबनान पर इजरायली हमले: ईरान ने यूएनएससी से माँगा जवाब, अमेरिकी भूमिका पर उठाए तीखे सवाल
सारांश
मुख्य बातें
ईरान के उप-विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा है कि परिषद इजरायल को जवाबदेह ठहराने में बुरी तरह विफल रही है। उन्होंने माँग की कि यूएनएससी महज 'चिंता व्यक्त करने के चरण से आगे बढ़े' और इजरायल के विरुद्ध 'दंडात्मक और बाध्यकारी निर्णय' ले। 2 जून को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर की गई इस पोस्ट ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है।
गरीबाबादी का यूएनएससी पर सीधा हमला
गरीबाबादी ने एक्स पर लिखा कि पश्चिम एशिया का मौजूदा संकट 'इजरायली शासन के अपराधों और सजा से उन्हें मुक्त रखने का नतीजा है, जो सरकारों की संप्रभुता का उल्लंघन करता है, युद्धविराम को अर्थहीन बनाता है और फिलिस्तीनियों के पवित्र स्थलों का अपमान करता है।' उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, 'अंतरराष्ट्रीय कानून केवल कमजोर और प्रभावहीन निंदा से लागू नहीं होता।'
यह बयान ऐसे समय में आया है जब लेबनान पर इजरायली सैन्य कार्रवाइयों को लेकर वैश्विक स्तर पर आलोचना तेज हो रही है और यूएनएससी में स्थायी सदस्यों के बीच गहरे मतभेद उजागर हो चुके हैं।
ट्रंप के दावे पर ईरान की तीखी प्रतिक्रिया
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को एक सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा था कि उन्होंने इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ बातचीत में तय किया कि बेरूत पर कोई सैन्य टुकड़ी नहीं भेजी जाएगी और जो रास्ते में हैं उन्हें वापस बुला लिया जाएगा। ट्रंप ने यह भी कहा कि हिज्बुल्लाह के प्रतिनिधियों से बातचीत हुई और दोनों पक्ष हमले रोकने पर सहमत हुए।
गरीबाबादी ने इस दावे को अमेरिका की शांति-प्रयास की मिसाल मानने से इनकार करते हुए कहा कि यह दरअसल इस बात का प्रमाण है कि अमेरिका सीधे तौर पर इजरायल की सैन्य कार्रवाइयों को 'मैनेज' करने में शामिल है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि किसी स्वतंत्र देश की राजधानी पर हमले का निर्णय एक फोन कॉल से बदल सकता है, तो महीनों तक युद्धविराम उल्लंघन, लेबनान पर हमले, नागरिकों का विस्थापन और संप्रभुता की धमकियाँ क्यों जारी रहीं।
ईरान ने अमेरिका से संदेश-आदान-प्रदान रोका
ईरान की अर्ध-सरकारी न्यूज़ एजेंसी तस्नीम ने शीर्ष अधिकारियों के हवाले से बताया कि लेबनान पर हमलों के कारण ईरान ने मध्यस्थ के ज़रिए अमेरिका से संदेशों का आदान-प्रदान रोक दिया है। यह कदम दोनों देशों के बीच पहले से तनावपूर्ण संबंधों को और जटिल बनाता है।
गौरतलब है कि यह ऐसे समय में हुआ है जब ईरान-अमेरिका के बीच परमाणु वार्ता की संभावनाओं पर भी चर्चा चल रही थी, और इस कदम को कूटनीतिक विशेषज्ञ एक महत्वपूर्ण संकेत मान रहे हैं।
व्यापक संदर्भ और अंतरराष्ट्रीय निहितार्थ
यह विवाद उस बड़े सवाल को फिर से केंद्र में ला देता है कि क्या यूएनएससी पश्चिम एशिया के संकट में प्रभावी भूमिका निभाने में सक्षम है। आलोचकों का कहना है कि स्थायी सदस्यों के वीटो अधिकार ने परिषद को बार-बार निष्प्रभावी बनाया है। ईरान के इस बयान को इस व्यापक असंतोष की एक और अभिव्यक्ति के रूप में देखा जा रहा है।
आने वाले दिनों में यूएनएससी की बैठकों और ईरान-अमेरिका के बीच कूटनीतिक संपर्क की स्थिति पर सभी की नज़रें टिकी रहेंगी।