जयशंकर का म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस में बड़ा बयान: साझा हित ही नए वैश्विक गठबंधनों की बुनियाद
सारांश
मुख्य बातें
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने 4 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में आयोजित म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस में कहा कि उभरता हुआ वैश्विक व्यवस्था अब विचारधाराओं की एकरूपता पर नहीं, बल्कि साझा हितों पर टिकी है। उन्होंने अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा को 'गोल्डीलॉक्स सिनेरियो' की संज्ञा दी — यानी ऐसी स्थिति जो न अत्यधिक गर्म हो, न अत्यधिक ठंडी — और कहा कि इसी संतुलन में मध्यम व उभरती शक्तियों के लिए अवसर निहित हैं।
'गोल्डीलॉक्स सिनेरियो' और नई विश्व व्यवस्था
जयशंकर ने स्पष्ट किया कि अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में दुनिया एक ऐसे मोड़ पर है जहाँ न तो पूर्ण टकराव है, न पूर्ण सहयोग। उनके अनुसार, इस बीच की स्थिति में उभरती और मध्यम शक्तियों के लिए रणनीतिक स्थान बनता है। उन्होंने कहा, 'आप चाहते हैं कि स्थिति इन दोनों के बीच सही संतुलन में रहे।'
यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक भू-राजनीति तेज़ी से बदल रही है और कई देश एकध्रुवीय व्यवस्था की बजाय बहुध्रुवीय ढाँचे की ओर उन्मुख हो रहे हैं।
विकल्प बढ़ाना और जोखिम कम करना: उभरती शक्तियों की प्राथमिकता
जयशंकर ने कहा कि आज अधिकांश उभरती और मध्यम ताकतें अपने विकल्पों का विस्तार करने और जोखिम कम करने पर केंद्रित हैं। यह रणनीति केवल अर्थव्यवस्था या सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि सप्लाई चेन को अधिक मज़बूत और विश्वसनीय बनाने तक फैली हुई है। उनके अनुसार, ये देश अलग-अलग मुद्दों पर नई व्यवस्थाएँ तैयार कर रहे हैं और मुद्दा-आधारित सहयोग को बढ़ावा दे रहे हैं।
गौरतलब है कि यह दृष्टिकोण भारत की दशकों पुरानी 'रणनीतिक स्वायत्तता' की नीति का विस्तार माना जा सकता है, जिसे अब एक व्यापक वैश्विक प्रवृत्ति के रूप में परिभाषित किया जा रहा है।
क्वाड, BRICS और IMEC: सहयोग के नए उदाहरण
विदेश मंत्री ने इस नई व्यवस्था के कई ठोस उदाहरण प्रस्तुत किए। उन्होंने 'क्वाड' को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उभरती और स्थापित शक्तियों के बीच सहयोग का प्रमुख उदाहरण बताया। इसके अलावा उन्होंने IMEC (इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप कनेक्टिविटी कॉरिडोर), इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर, और पोलर रूट (नॉर्दर्न सी रूट) का उल्लेख किया।
वैश्विक स्तर पर सामूहिक आवाज़ के संदर्भ में उन्होंने 'ब्रिक्स' को उदाहरण के रूप में रखा और कहा कि कई देश यह महसूस करते हैं कि उनकी सामूहिक आवाज़ अलग-अलग आवाज़ों से कहीं अधिक प्रभावशाली है। प्रौद्योगिकी और संसाधनों के क्षेत्र में उन्होंने 'पैक्स सिलिका' को एक नए उभरते सहयोग-ढाँचे के रूप में रेखांकित किया।
वैश्विक भलाई के नज़रिए से जयशंकर ने इंटरनेशनल सोलर अलायंस (ISA) और कोएलिशन फॉर डिज़ास्टर रेज़िलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर (CDRI) का विशेष उल्लेख किया, जिनकी शुरुआत भारत ने की और आज ISA के 100 से अधिक सदस्य देश हैं।
विचारधारा से हितों की ओर: नई गठबंधन राजनीति
जयशंकर के अनुसार, वे दिन अब पीछे छूट गए हैं जब गठबंधन के लिए विचारों की पूर्ण समानता अनिवार्य थी। उन्होंने कहा, 'अगर देशों के बीच सहयोग के लिए पर्याप्त साझा मुद्दे हैं, तो उनके लिए मिलकर काम करने के लिए इतना ही काफी है।' यह टिप्पणी शीत युद्ध-कालीन गुटबंदी की मानसिकता से साफ़ विदाई का संकेत देती है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस नई व्यवस्था में देशों का आकार या शक्ति-क्रम निर्णायक नहीं है — जहाँ हित मिलते हैं, वहाँ सहयोग स्वाभाविक रूप से उभरता है, चाहे साझेदार छोटे हों या बड़े।
आगे का रास्ता
जयशंकर के इस संबोधन को भारत की बहुध्रुवीय विश्व-दृष्टि के एक सुस्पष्ट कूटनीतिक बयान के रूप में देखा जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह भाषण न केवल भारत की विदेश नीति की दिशा को रेखांकित करता है, बल्कि उन देशों को भी एक वैचारिक ढाँचा देता है जो किसी एक महाशक्ति के छत्र तले आने से बचना चाहते हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्त्वपूर्ण होगा कि भारत इस 'साझा हित-आधारित' कूटनीति को व्यावहारिक धरातल पर किस प्रकार आगे बढ़ाता है।