जयशंकर का न्यूयॉर्क में बड़ा बयान: 'कूटनीति अब एक्सट्रीम स्पोर्ट बन गई है'
सारांश
मुख्य बातें
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने 29 सितंबर को न्यूयॉर्क में एक अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि युद्धों, आर्थिक दबाव और व्यापारिक निर्भरता को हथियार की तरह इस्तेमाल किए जाने से वैश्विक परिदृश्य बुनियादी रूप से बदल चुका है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, 'कूटनीति अब एक एक्सट्रीम स्पोर्ट बन गई है' — यानी राजनयिकों को अब पहले से कहीं अधिक जोखिम भरे और जटिल हालात में काम करना पड़ रहा है।
वैश्विक संघर्षों और दबाव का संदर्भ
जयशंकर ने दुनिया में जारी दो बड़े सशस्त्र संघर्षों, पश्चिम एशिया में अस्थिरता और अफ्रीका के कुछ हिस्सों में चल रही लड़ाई का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि खाना, ईंधन, खाद और वित्तीय व्यवस्था — सभी पर एक साथ दबाव है, और वैश्विक सप्लाई चेन पहले से कहीं अधिक असुरक्षित होती जा रही हैं। यह ऐसे समय में आया है जब अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर सवाल उठाना एक वैश्विक प्रवृत्ति बन चुकी है।
निर्भरता और प्रतिस्पर्धा का विरोधाभास
जयशंकर ने देशों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा और परस्पर निर्भरता के टकराव को 'हमारे समय का विरोधाभास' करार दिया। उन्होंने कहा, 'एक-दूसरे पर निर्भरता हकीकत है, जबकि प्रतिस्पर्धा आज की सोच है।' उनके अनुसार, देश आज भी गहराई से एक-दूसरे से जुड़े हैं, लेकिन अब वे इसी जुड़ाव को दबाव बनाने के औज़ार के रूप में इस्तेमाल करने के लिए कहीं अधिक तैयार दिखते हैं।
गौरतलब है कि जब कोई देश किसी अनिवार्य ज़रूरत के लिए दूसरे पर निर्भर होता है, तो प्रतिस्पर्धा की स्थिति में उस निर्भरता को दबाव के हथियार में बदलने की संभावना बढ़ जाती है। इससे सरकारों के लिए अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए द्विपक्षीय संबंध बनाए रखना और भी कठिन हो गया है।
चोक पॉइंट्स, ऊर्जा और तकनीक का असर
जयशंकर ने कई तरह के 'चोक पॉइंट्स' का उल्लेख किया — यानी वे रणनीतिक स्थान और तरीके जिनके ज़रिए किसी देश पर दबाव बनाया जा सकता है। इनमें महत्वपूर्ण भौगोलिक मार्ग, आर्थिक प्रतिबंध, यात्रा प्रतिबंध और बाज़ारों तक पहुँच शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि ऊर्जा उत्पादन में किसी बड़े व्यवधान से कीमतें बढ़ती हैं और अन्य देशों को अपनी रणनीति तत्काल बदलनी पड़ती है। इसी प्रकार, सैन्य तकनीक में प्रगति कुछ सरकारों के भीतर अधिक जोखिम उठाने का आत्मविश्वास पैदा कर सकती है। जयशंकर ने इसे 'यूज़ इट ऑर लूज़ इट' वाली मानसिकता बताया — अर्थात नई क्षमताएँ हासिल होते ही उन्हें इस्तेमाल करने का प्रलोभन बढ़ जाता है।
संयुक्त राष्ट्र सुधार और बदलता शक्ति-संतुलन
जयशंकर ने सवाल उठाया कि पुराने वैश्विक शक्ति-संतुलन के दौर में बनाई गई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ आज की बदलती दुनिया के अनुरूप खुद को ढाल पाएंगी या नहीं। उन्होंने याद दिलाया कि संयुक्त राष्ट्र की स्थापना 1945 में केवल 51 सदस्य देशों के साथ हुई थी और उस समय की दुनिया आज से बिल्कुल भिन्न थी।
भारत लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार और विकासशील देशों को अधिक प्रतिनिधित्व दिए जाने की माँग करता रहा है। जयशंकर ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र की प्रासंगिकता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह आज की वास्तविकताओं के अनुसार खुद को कितनी तेज़ी से बदल पाता है। भारत G20, BRICS और Quad जैसे बहुपक्षीय मंचों के ज़रिए भी अपनी कूटनीतिक सक्रियता बनाए हुए है।
आगे की राह: निराशावाद नहीं, सतर्क आशावाद
चर्चा के अंत में जयशंकर ने स्पष्ट किया, 'मैं दुनिया को लेकर निराशावादी नहीं हूँ।' उन्होंने कहा कि देश अब नए साझेदार तलाश रहे हैं, अपने संबंधों में विविधता ला रहे हैं और जोखिम कम करने के रास्ते खोज रहे हैं। उनके अनुसार, प्रतिस्पर्धा बढ़ने के बावजूद देशों के दीर्घकालिक हित में यही है कि वे आपस में स्थिर और भरोसेमंद व्यवस्थाएँ तैयार करें — भले ही इसके लिए बातचीत आसान न हो।