29 सितंबर 2026
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जयशंकर का न्यूयॉर्क में बड़ा बयान: दुनिया बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर, भारत 'पोर्टफोलियो' रणनीति अपनाएगा

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जयशंकर का न्यूयॉर्क में बड़ा बयान: दुनिया बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर, भारत 'पोर्टफोलियो' रणनीति अपनाएगा

सारांश

न्यूयॉर्क में जयशंकर का संदेश साफ था — एकध्रुवीय दुनिया का दौर बीत रहा है। अमेरिका चीन प्रतिस्पर्धा के बीच बाकी देश अपने समाधान खुद खोज रहे हैं, और भारत 'पोर्टफोलियो मैनेजमेंट' की रणनीति से हर बड़ी शक्ति के साथ संतुलन साधने की तैयारी में है।

मुख्य बातें

जयशंकर ने 29 सितंबर 2026 को न्यूयॉर्क में कहा कि दुनिया तेज़ी से बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है।
उन्होंने कहा कि पुराने गठबंधन कमज़ोर हो रहे हैं और सबसे शक्तिशाली देश एकतरफ़ा निर्णयों की ओर झुक रहा है।
जयशंकर ने कूटनीति को 'बहुत जोखिम भरा खेल' करार दिया — प्रतिस्पर्धा और आर्थिक निर्भरता का विरोधाभास इसकी मुख्य वजह।
भारत की रणनीति को उन्होंने 'पोर्टफोलियो मैनेजमेंट' कहा — अमेरिका, यूरोप, जापान, चीन, रूस, खाड़ी देशों, आसियान और ग्लोबल साउथ के साथ संतुलित संबंध।
उन्होंने यह भी कहा कि व्यापार व्यवस्था की बुनियादी मान्यताएँ पहले ही कमज़ोर हो चुकी थीं — इसके लिए अकेले अमेरिका ज़िम्मेदार नहीं।
जयशंकर ने वैश्विक परिदृश्य को लेकर आशावाद जताया और कहा, "मैं दुनिया को लेकर निराशावादी नहीं हूँ।"

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने 29 सितंबर 2026 को न्यूयॉर्क में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि दुनिया तेज़ी से एक बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि अमेरिका की बदलती नीतियों, अमेरिका चीन प्रतिस्पर्धा और व्यापार से जुड़ी पुरानी मान्यताओं के कमज़ोर होने के चलते हर देश अपनी कूटनीतिक रणनीति को नए सिरे से परिभाषित करने पर मजबूर है। जयशंकर ने स्पष्ट किया कि भारत इस बदलाव में अमेरिका, यूरोप, रूस, चीन और ग्लोबल साउथ के साथ संतुलित संबंध बनाए रखते हुए आगे बढ़ेगा।

मुख्य घटनाक्रम

विदेश मंत्री ने कहा कि आज सभी सरकारें अपने जोखिम को कम करने, साझेदारियों में विविधता लाने और मौजूदा संबंधों से अधिकतम लाभ उठाने के रास्ते तलाश रही हैं। उन्होंने इसे एक अधिक प्रतिस्पर्धी अंतरराष्ट्रीय माहौल के अनुकूल खुद को ढालने की प्रक्रिया बताया। अमेरिका चीन संबंधों पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा, "बाकी की दुनिया अपने इंतज़ाम करने में व्यस्त है।"

जयशंकर ने यह भी रेखांकित किया कि पुराने गठबंधन कमज़ोर पड़ रहे हैं और सबसे शक्तिशाली देश एकतरफ़ा निर्णयों की ओर अधिक झुक रहा है। उनके अनुसार, दुनिया की दो सबसे बड़ी शक्तियों — अमेरिका और चीन — के बीच भले ही नज़दीकी बढ़े, उनकी आपसी प्रतिस्पर्धा उन्हें शेष विश्व के लिए नियम निर्धारक की भूमिका से दूर रखेगी।

कूटनीति का बदलता स्वरूप

विदेश मंत्री ने आधुनिक कूटनीति के केंद्र में मौजूद एक गहरे विरोधाभास की ओर ध्यान दिलाया — एक ओर देशों के बीच तीखी प्रतिस्पर्धा है, दूसरी ओर गहरी आर्थिक परस्परनिर्भरता भी बनी हुई है। उन्होंने कहा कि जब कोई देश इस निर्भरता के ज़रिए बढ़त हासिल कर लेता है, तो उसे दूसरे के विरुद्ध हथियार की तरह इस्तेमाल करने का प्रलोभन भी उतना ही बढ़ जाता है।

जयशंकर ने भौगोलिक, वित्तीय, यात्रा और बाज़ार तक पहुँच से जुड़े 'चोक पॉइंट्स' का उल्लेख किया, जिनके ज़रिए देश एक दूसरे पर दबाव बनाते हैं। उन्होंने कहा, "कूटनीति अब एक बहुत जोखिम भरा खेल बन गई है।" सरकारों को एक साथ उच्च जोखिम वाले फ़ैसलों पर त्वरित प्रतिक्रिया देनी होती है और दीर्घकालिक वार्ता के लिए धैर्य भी बनाए रखना पड़ता है।

व्यापार व्यवस्था पर विश्लेषण

जयशंकर ने इस धारणा को खारिज किया कि अंतरराष्ट्रीय आर्थिक नियमों के कमज़ोर होने के पीछे केवल अमेरिका ज़िम्मेदार है। उनके अनुसार, बाज़ार से जुड़ी मान्यताएँ पहले ही कमज़ोर हो चुकी थीं, क्योंकि कई व्यावसायिक प्रथाएँ बाज़ार के मूल सिद्धांतों से भटकती रही हैं। मौजूदा अमेरिकी नीतियाँ उस प्रक्रिया को गति दे रही हैं जिसमें देश आपस में बातचीत करने के तरीके बदल रहे हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका अब व्यापार में बहुपक्षीय ढाँचे की बजाय अलग अलग साझेदारों के साथ व्यक्तिगत समझौतों का रास्ता अपना रहा है। यह बदलाव नए संबंधों और समझौतों की ज़मीन तैयार कर सकता है, हालाँकि एक स्थिर नए पैटर्न के उभरने में समय लगेगा।

भारत की रणनीति: 'पोर्टफोलियो मैनेजमेंट'

भारत की विदेश नीति के बारे में जयशंकर ने कहा कि देश अमेरिका, यूरोप, जापान, चीन, रूस, खाड़ी देशों, आसियान और ग्लोबल साउथ के देशों के साथ अपने संबंधों में संतुलन बनाए रखेगा। उन्होंने इस रणनीति की तुलना 'पोर्टफोलियो मैनेजमेंट' से की — यानी विविध संबंधों के ज़रिए जोखिम को बाँटना और अवसरों को अधिकतम करना।

यह ऐसे समय में आया है जब भारत एक ओर अमेरिका के साथ व्यापार वार्ता में जुटा है और दूसरी ओर रूस से तेल आयात जारी रखे हुए है — एक ऐसी स्थिति जिसे पश्चिमी देश 'रणनीतिक अस्पष्टता' कहते हैं, जबकि नई दिल्ली इसे 'रणनीतिक स्वायत्तता' मानती है।

आगे की राह

जयशंकर ने वैश्विक परिदृश्य को लेकर निराशावादी नज़रिया अपनाने से इनकार किया। उन्होंने कहा, "मैं दुनिया को लेकर निराशावादी नहीं हूँ" और उम्मीद जताई कि प्रतिस्पर्धा और अनिश्चितता के इस दौर से गुज़रते हुए देश नए और टिकाऊ समझौते करेंगे। बड़े व्यापारिक देशों के पास भरोसेमंद साझेदार और स्थिर माहौल खोजने के पर्याप्त कारण हैं — भले ही किसी खास समझौते में तात्कालिक लाभ सीमित हो। इस दौर में भारत की बहुआयामी कूटनीति की असली परीक्षा आने वाले महीनों में होगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

पर इतनी सीधी भाषा में शायद ही कभी कहा। असली सवाल यह है कि क्या यह संतुलन दीर्घकाल में टिकाऊ है — जब अमेरिका और चीन दोनों 'या तो हमारे साथ या हमारे खिलाफ' की माँग तेज़ करें। भारत की बहुआयामी कूटनीति अभी तक काम कर रही है, लेकिन 'चोक पॉइंट्स' का जो ज़िक्र जयशंकर ने किया, वह याद दिलाता है कि यह खेल जितना दिखता है उससे कहीं अधिक जोखिम भरा है।
RashtraPress
29 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एस. जयशंकर ने बहुध्रुवीय व्यवस्था के बारे में क्या कहा?
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने 29 सितंबर 2026 को न्यूयॉर्क में कहा कि दुनिया एक बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है, जहाँ अमेरिका की बदलती नीतियों और अमेरिका चीन प्रतिस्पर्धा के कारण हर देश अपनी रणनीति नए सिरे से तय कर रहा है। उन्होंने कहा कि पुराने गठबंधन कमज़ोर पड़ रहे हैं।
भारत की 'पोर्टफोलियो मैनेजमेंट' विदेश नीति रणनीति क्या है?
जयशंकर ने भारत की विदेश नीति को 'पोर्टफोलियो मैनेजमेंट' की तरह बताया — यानी अमेरिका, यूरोप, जापान, चीन, रूस, खाड़ी देशों, आसियान और ग्लोबल साउथ के साथ एक साथ संतुलित संबंध बनाए रखना। इसका उद्देश्य जोखिम को बाँटना और अवसरों को अधिकतम करना है।
जयशंकर ने कूटनीति को 'जोखिम भरा खेल' क्यों कहा?
जयशंकर के अनुसार, आज की कूटनीति में एक गहरा विरोधाभास है — देशों के बीच तीखी प्रतिस्पर्धा और साथ ही गहरी आर्थिक परस्परनिर्भरता। जब कोई देश इस निर्भरता के ज़रिए बढ़त पाता है, तो उसे दूसरे के खिलाफ हथियार की तरह इस्तेमाल करने का प्रलोभन बढ़ता है, जिससे सरकारों को एक साथ त्वरित प्रतिक्रिया और दीर्घकालिक धैर्य दोनों की ज़रूरत होती है।
क्या जयशंकर ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था के कमज़ोर होने के लिए अमेरिका को ज़िम्मेदार ठहराया?
नहीं। जयशंकर ने स्पष्ट किया कि व्यापार व्यवस्था की बुनियादी मान्यताएँ पहले ही कमज़ोर हो चुकी थीं, क्योंकि कई व्यावसायिक प्रथाएँ बाज़ार के सिद्धांतों से भटकती रही हैं। उनके अनुसार, मौजूदा अमेरिकी नीतियाँ उस बदलाव को गति दे रही हैं, लेकिन वे इसकी एकमात्र वजह नहीं हैं।
'चोक पॉइंट्स' से जयशंकर का क्या आशय था?
जयशंकर ने भौगोलिक, वित्तीय, यात्रा और बाज़ार तक पहुँच से जुड़े 'चोक पॉइंट्स' का उल्लेख किया — ये वे संवेदनशील क्षेत्र हैं जिनके ज़रिए देश एक दूसरे पर दबाव बना सकते हैं। यह उदाहरण उन्होंने यह समझाने के लिए दिया कि आर्थिक निर्भरता किस तरह कूटनीतिक दबाव का हथियार बन सकती है।
राष्ट्र प्रेस
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