किम यो-जोंग ने परमाणु निरस्त्रीकरण की मांग सिरे से खारिज की, बोलीं — 'यह मुद्दा अपरिवर्तनीय रूप से समाप्त'
सारांश
मुख्य बातें
उत्तर कोरिया के सर्वोच्च नेता किम जोंग-उन की बहन और प्योंगयांग की शीर्ष नीति-निर्माता किम यो-जोंग ने 18 जून 2026 को अंतरराष्ट्रीय समुदाय की परमाणु निरस्त्रीकरण की मांगों को पूरी तरह अस्वीकार कर दिया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि डेमोक्रेटिक पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ कोरिया (DPRK) के परमाणु हथियार देश के 'मूल राष्ट्रीय हितों' का अभिन्न हिस्सा हैं और इस विषय पर कोई समझौता संभव नहीं है।
जी7 बयान के जवाब में आई तीखी प्रतिक्रिया
किम यो-जोंग का यह बयान फ्रांस के एवियन-ले-बैंस में आयोजित जी7 शिखर सम्मेलन के दौरान जारी संयुक्त घोषणापत्र के सीधे जवाब में आया। उस घोषणापत्र में जी7 देशों के नेताओं ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों के अनुरूप उत्तर कोरिया के 'पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण' के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई थी। उत्तर कोरिया की सरकारी समाचार एजेंसी केसीएनए (KCNA) के अनुसार, किम यो-जोंग ने अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की इस मांग को 'पुरानी सोच' करार देते हुए नकार दिया।
किम यो-जोंग का स्पष्ट रुख
किम यो-जोंग ने अपने बयान में कहा, 'परमाणु हथियार हमारी संप्रभुता की रक्षा का सबसे शक्तिशाली साधन हैं और देश में शांति सुनिश्चित करने की आधारशिला हैं। हमारे कानून के अनुसार यह आत्मरक्षा का माध्यम है।' उन्होंने यह भी जोड़ा कि परमाणु निरस्त्रीकरण का मुद्दा अब 'अपरिवर्तनीय रूप से समाप्त' हो चुका है और इसे कभी लागू नहीं किया जा सकता।
गंभीर परिणामों की चेतावनी
किम यो-जोंग ने चेतावनी दी कि यदि कोई देश किसी परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र के मूल हितों को नुकसान पहुँचाने की कोशिश करेगा, तो वह 'स्वयं अपने लिए विनाश को आमंत्रित करेगा' और उसे 'गंभीर परिणाम' भुगतने पड़ सकते हैं। यह ऐसे समय में आया है जब कोरियाई प्रायद्वीप पर तनाव पहले से ही उच्च स्तर पर बना हुआ है।
व्यापक संदर्भ और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
गौरतलब है कि उत्तर कोरिया ने 2017 में खुद को परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र घोषित किया था और तब से परमाणु निरस्त्रीकरण पर किसी भी बातचीत से इनकार करता रहा है। 2019 में हनोई में अमेरिकी राष्ट्रपति और किम जोंग-उन के बीच शिखर वार्ता के विफल होने के बाद से कूटनीतिक प्रयास लगभग ठप पड़े हैं। किम यो-जोंग को उत्तर कोरिया की सत्ता संरचना में किम जोंग-उन के बाद सबसे प्रभावशाली व्यक्तित्व माना जाता है और उनके बयान प्रायः देश की आधिकारिक नीति की दिशा तय करते हैं।
आगे की राह
विशेषज्ञों का मानना है कि किम यो-जोंग के इस बयान के बाद निकट भविष्य में किसी कूटनीतिक सफलता की संभावना और कम हो गई है। जी7 और संयुक्त राष्ट्र के समक्ष अब यह चुनौती है कि वे उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम पर दबाव बनाए रखने के लिए नई रणनीति तैयार करें। कोरियाई प्रायद्वीप पर स्थिरता के लिए अगले कूटनीतिक कदम अहम होंगे।