ब्राजील में 'लूला आर्मी' का डिजिटल कमाल: व्हाट्सऐप से 1.1 करोड़ समर्थक, ओबामा-मोदी मॉडल से आगे
सारांश
मुख्य बातें
ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा की चुनावी वापसी के पीछे 'लूला आर्मी' नाम के एक संगठित डिजिटल नेटवर्क की भूमिका सबसे अधिक चर्चा में रही है — एक ऐसा व्हाट्सऐप-केंद्रित अभियान जिसने पहले दौर की हार को दूसरे दौर की बंपर जीत में बदल दिया। 81 वर्षीय लूला ने दक्षिणपंथी उम्मीदवार फ्लावियो बोल्सोनारो से पहले दौर में पिछड़ने के बाद अपनी डिजिटल रणनीति को पूरी तरह नया रूप दिया। यह अभियान उस डिजिटल राजनीति की नवीनतम और सबसे संगठित कड़ी है जिसकी शुरुआत 2008 में अमेरिका में बराक ओबामा के चुनाव प्रचार और 2014 में भारत में नरेंद्र मोदी के अभियान से मानी जाती है।
लूला आर्मी: संख्या और संगठन
पहले दौर के चुनाव के बाद 'लूला आर्मी' व्हाट्सऐप समूह के सदस्यों की संख्या करीब 60 हज़ार से बढ़कर लगभग 1.1 करोड़ तक पहुँच गई। इस समूह की कमान सांसद आंद्रे जानोनेस के हाथ में थी। सदस्यों को रोज़ाना छोटे-छोटे अभियान संबंधी काम सौंपे जाते थे — जैसे लूला के समर्थन में वीडियो साझा करना, सोशल मीडिया पर उनकी पहुँच बढ़ाना और दूसरे मतदाताओं से संवाद करना।
अभियान का एक दिलचस्प पहलू यह रहा कि समर्थकों से ब्राजील की राष्ट्रीय फुटबॉल जर्सी पहनकर लूला के समर्थन में तस्वीरें साझा करने को कहा गया। इसका उद्देश्य उस राष्ट्रीय प्रतीक को फिर से व्यापक स्तर पर अपनाना था, जिसे पिछले कुछ वर्षों में बोल्सोनारो समर्थकों से जोड़कर देखा जाने लगा था। गौरतलब है कि लूला को चुनाव से महज चार दिन पहले अपना पहला स्मार्टफोन मिला था, और इसके बावजूद उन्होंने सेल्फी वीडियो के ज़रिए मतदाताओं तक सीधे पहुँचने का रास्ता अपनाया।
ओबामा मॉडल: डिजिटल राजनीति की नींव
आज से करीब 18 साल पहले, 2008 में, बराक ओबामा ने अपने राष्ट्रपति चुनाव अभियान में इंटरनेट और सोशल मीडिया को केवल प्रचार का माध्यम नहीं बनाया, बल्कि समर्थकों को अभियान की असली ताकत में तब्दील कर दिया। ओबामा की टीम ने 'माय बराकओबामाडॉटकॉम' नाम का ऑनलाइन प्लेटफॉर्म बनाया, जहाँ समर्थक आपस में जुड़ सकते थे और स्थानीय स्तर पर प्रचार की योजना बना सकते थे।
स्टैनफोर्ड ग्रेजुएट स्कूल ऑफ बिजनेस के एक अध्ययन के अनुसार, ओबामा की टीम ने सोशल मीडिया और तकनीक का इस्तेमाल चुनावी चंदा जुटाने के साथ-साथ ऐसे स्वयंसेवक तैयार करने के लिए भी किया जो खुद को चुनावी प्रक्रिया में बदलाव का हिस्सा मानते थे। प्यू रिसर्च सेंटर की 2009 की रिपोर्ट के अनुसार, 2008 के चुनाव में 55 प्रतिशत अमेरिकी वयस्कों ने चुनाव से जुड़ी जानकारी के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल किया था, और ओबामा के समर्थक प्रतिद्वंद्वी जॉन मैक्केन के समर्थकों की तुलना में ऑनलाइन राजनीतिक गतिविधियों में अधिक सक्रिय थे।
भारत में 2014: मोदी का डिजिटल प्रयोग
2014 के भारतीय लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने सोशल मीडिया को अपने चुनाव प्रचार की केंद्रीय रणनीति का हिस्सा बनाया। ट्विटर, फेसबुक और यूट्यूब के माध्यम से मतदाताओं तक पहुँचने के साथ-साथ पार्टी ने डिजिटल स्वयंसेवकों, ऑनलाइन प्रचार समूहों और तकनीकी संसाधनों का बड़े पैमाने पर उपयोग किया।
2014 के भारतीय चुनावों पर प्रकाशित एक शोध अध्ययन में 11 राजनीतिक दलों के 98,363 ट्वीट का विश्लेषण किया गया था। इसमें पाया गया कि BJP ने ट्विटर पर युवाओं से जुड़े मुद्दों पर अधिक ध्यान दिया और मतदाताओं के साथ संवाद की कोशिश की। शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया कि सोशल मीडिया के प्रभाव को चुनावी जीत का अकेला कारण नहीं माना जा सकता।
तीन मॉडल, एक समानांतर धारा
ओबामा, मोदी और लूला — तीनों अभियानों में एक समान सूत्र दिखाई देता है: डिजिटल माध्यमों ने उम्मीदवार और मतदाता के बीच की दूरी कम करने का अवसर दिया। लेकिन तीनों के तरीके अलग रहे — ओबामा के समय इंटरनेट-आधारित स्वयंसेवक नेटवर्क और ऑनलाइन फंडिंग पर ज़ोर था; मोदी के अभियान में सोशल मीडिया के ज़रिए बड़े पैमाने पर राजनीतिक संवाद का विस्तार हुआ; जबकि लूला के मामले में व्हाट्सऐप समूह और कंटेंट-क्रिएटर समर्थकों की संगठित दैनिक भागीदारी इसका केंद्र बनी।
यह ऐसे समय में आया है जब दुनियाभर में राजनीतिक दलों के सामने यह सवाल तेज़ हो रहा है कि केवल फॉलोअर्स की संख्या नहीं, बल्कि उन फॉलोअर्स की सक्रिय चुनावी भागीदारी ही असली डिजिटल शक्ति है। हालाँकि लूला की जीत को केवल डिजिटल अभियान का परिणाम नहीं माना जा सकता — ब्राजील में युवाओं के विरोध प्रदर्शन, राजनीतिक ध्रुवीकरण और सामाजिक कल्याण योजनाओं ने भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।