पीईआरएम निलंबन पर भारत की कड़ी प्रतिक्रिया: एमईए बोला — अमेरिकी कदम साझा हितों के विरुद्ध
सारांश
मुख्य बातें
भारत के विदेश मंत्रालय (एमईए) ने 9 अक्टूबर 2026 को स्पष्ट किया कि ट्रंप प्रशासन द्वारा इन्फोसिस, टाटा, विप्रो, एचसीएल, कॉग्निजेंट, कैपजेमिनी, माइक्रोसॉफ्ट और एडोब सहित आठ बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों के लिए परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन (पीईआरएम) कार्यक्रम को निलंबित करने का निर्णय 'दोनों देशों की साझा महत्वाकांक्षाओं को आगे नहीं बढ़ाता'। मंत्रालय ने यह भी रेखांकित किया कि इस निलंबन का एच-1बी वीज़ा धारकों और उनके परिजनों की मौजूदा कानूनी स्थिति पर प्रत्यक्ष असर नहीं होगा, हालाँकि ग्रीन कार्ड प्रक्रिया में बाधा ज़रूर आ सकती है।
पीईआरएम निलंबन: क्या हुआ और किस पर असर
अमेरिकी श्रम मंत्री कीथ सोंडरलिंग ने 8 अक्टूबर को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में घोषणा की कि श्रम विभाग के इंस्पेक्टर जनरल एंथनी डीएस्पोसिटो की अगुवाई में चल रही आपराधिक और संघीय जाँचों के आधार पर इन कंपनियों को पीईआरएम कार्यक्रम से निलंबित किया जा रहा है। इसके तहत न तो नए पीईआरएम आवेदन स्वीकार किए जाएँगे और न ही पहले से लंबित आवेदनों पर कोई कार्यवाही होगी।
सोंडरलिंग के अनुसार, इन कंपनियों ने 2009 से अब तक सामूहिक रूप से लगभग 30 लाख विदेशी कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए आवेदन किए थे और इन्हें 2.3 लाख से अधिक एच-1बी वीज़ा मंजूरियाँ और 1 लाख से ज़्यादा स्थायी श्रम प्रमाणन प्राप्त हुए थे।
एमईए की आधिकारिक स्थिति
विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा, 'पीईआरएम आवेदनों के निलंबन से अपने आप मौजूदा एच-1बी वीज़ा या एच-1बी धारकों और उनके परिवारों की कानूनी स्थिति प्रभावित नहीं होती। हालाँकि, इससे प्रभावित कंपनियों के पात्र कर्मचारियों की ग्रीन कार्ड प्रक्रिया पर कुछ असर पड़ सकता है।'
मंत्रालय ने प्रतिभाओं की आवाजाही को दोनों अर्थव्यवस्थाओं के लिए पारस्परिक रूप से लाभकारी बताते हुए कहा कि भारतीय पेशेवर अमेरिकी कंपनियों को नवाचार, शोध, उत्पादकता और रोज़गार सृजन में मदद करते हैं — और इससे अमेरिकी शेयरधारकों को भी लाभ होता है।
उपराष्ट्रपति वेंस की टिप्पणियों पर भारत की आपत्ति
भारत ने अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की उन टिप्पणियों को भी 'अनुचित' और 'अनावश्यक' करार दिया, जिनमें उन्होंने कंपनियों पर अमेरिकी कर्मचारियों की जगह कम वेतन पर विदेशी कर्मियों को रखने का आरोप लगाया था। एमईए ने कहा, 'इस तरह के बयान इस तथ्य को नज़रअंदाज़ करते हैं कि अमेरिका में काम कर रहे भारतीय पेशेवर उच्च शिक्षित और कुशल लोग हैं।'
मंत्रालय ने यह भी जोड़ा कि 'ऐसे शब्दों का इस्तेमाल, जिनसे ऐतिहासिक और औपनिवेशिक दौर की पीड़ादायक यादें जुड़ी हों, बेहद आपत्तिजनक है।' मंत्रालय ने अमेरिका के अपने इतिहास की याद दिलाते हुए कहा कि प्रवासियों की कई पीढ़ियों के श्रम, उद्यम और नवाचार ने वहाँ की समृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
वेंस और सोंडरलिंग का पक्ष
वेंस ने माइक्रोसॉफ्ट का उदाहरण देते हुए आरोप लगाया कि कंपनी ने 6,000 अमेरिकी कर्मचारियों की छँटनी की, जबकि उसे 6,300 एच-1बी वीज़ा और लगभग 3,000 ग्रीन कार्ड मिले। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रशासन का उद्देश्य कंपनियों को अमेरिकी बाज़ार से बाहर करना नहीं, बल्कि उनकी भर्ती नीतियों में बदलाव लाना है।
पीईआरएम निलंबन की अवधि के बारे में पूछे जाने पर वेंस ने कहा, 'यह निलंबन उतने समय तक जारी रहेगा, जितने समय तक इसकी जरूरत होगी।' उन्होंने यह भी कहा कि प्रशासन के पास इसे दीर्घकालिक बनाए रखने के पर्याप्त अधिकार हैं।
आगे क्या होगा
यह विवाद ऐसे समय में आया है जब भारत-अमेरिका संबंध व्यापार, रक्षा और प्रौद्योगिकी क्षेत्र में गहरी साझेदारी की ओर बढ़ रहे हैं। गौरतलब है कि लाखों भारतीय आईटी पेशेवरों का अमेरिका में करियर इन्हीं ग्रीन कार्ड प्रक्रियाओं पर निर्भर है। एमईए ने कहा है कि वह इस मामले से जुड़े घटनाक्रमों पर नज़र बनाए हुए है — जो यह संकेत देता है कि भारत इस मुद्दे पर राजनयिक स्तर पर सक्रिय रहेगा।