नाउरू ने बदला अपना नाम, अब 'रिपब्लिक ऑफ नाओरो' कहलाएगा यह द्वीपीय देश
सारांश
मुख्य बातें
प्रशांत महासागर में स्थित द्वीपीय देश नाउरू ने आधिकारिक तौर पर अपना नाम बदलकर रिपब्लिक ऑफ नाओरो रख लिया है। राष्ट्रपति डेविड एडियांग ने इस निर्णय को राष्ट्रीय भाषा की वर्तनी और उच्चारण के साथ तालमेल बिठाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम बताया। विश्व के सबसे छोटे स्वतंत्र गणराज्यों में से एक यह देश अब औपनिवेशिक काल में थोपे गए नाम को पीछे छोड़ अपनी मूल पहचान की ओर लौट रहा है।
नाम बदलने की वजह क्या है
सरकार के आधिकारिक बयान (29 जुलाई) के अनुसार, 'नाउरू' नाम कभी देशवासियों की पसंद नहीं था — यह विदेशियों की सुविधा के लिए अपनाया गया था क्योंकि वे मूल उच्चारण नहीं कर पाते थे। आमतौर पर विदेशों में इसे 'नाउ-एरो' बोला जाता था, जो मूल नाम से काफी भिन्न है। नाओरो नाम पहले से ही राष्ट्रीय कोट ऑफ आर्म्स पर अंकित है और संविधान में मान्यता प्राप्त है।
संसदीय प्रक्रिया और संवैधानिक बदलाव
जनवरी में यह प्रस्ताव संसद में रखा गया था। राष्ट्रपति एडियांग ने उस समय कहा था, 'यह प्रस्तावित बदलाव हमारे देश की विरासत, हमारी भाषा और हमारी पहचान का ज्यादा ईमानदारी से सम्मान करने की कोशिश करता है।' संवैधानिक संशोधन को दो राउंड की अनिवार्य संसदीय वोटिंग में मंजूरी मिल गई। मई में आखिरी वोट के बाद राष्ट्रपति ने जनमत संग्रह की घोषणा की थी, लेकिन जुलाई के अंत में सरकार ने स्पष्ट किया कि 'काफी चर्चा' के बाद सांसदों ने तय किया कि सार्वजनिक वोट की आवश्यकता नहीं है।
सरकारी बयान में कहा गया, 'नाओरो नाम कभी खत्म नहीं हुआ — यह पूरी तरह अपनाए जाने का इंतजार कर रहा था। यह नाम पहले से ही लोगों की पहचान है, राष्ट्रीय कोट ऑफ आर्म्स पर है, समुदाय में बोला जाता है और संविधान इसकी इजाजत देता है।'
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदलाव
नाम बदलने के साथ देश का अंतरराष्ट्रीय कोड भी NRU से बदलकर NRO हो गया है। देशवासी अब नाउरुआन के बजाय देई-नाओरो कहलाएंगे। संयुक्त राष्ट्र (UN) की वेबसाइट पर नया नाम दर्ज हो चुका है — सरकार ने जून में यह अनुरोध किया था। ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड के विदेश मंत्रालयों और इस क्षेत्र में अमेरिकी तथा चीनी दूतावासों ने भी अपनी वेबसाइटों पर नया नाम अपडेट कर दिया है। इसके अलावा राष्ट्रीय एयरलाइन का नाम भी बदलना होगा।
नाओरो का इतिहास और वर्तमान चुनौतियाँ
आधिकारिक जानकारी के अनुसार, 12,000 की आबादी वाला यह देश तुवालु और वेटिकन सिटी के बाद दुनिया का तीसरा सबसे छोटा देश है। 1968 में स्वतंत्र गणराज्य बनने से पहले इस प्रवाल द्वीप पर पहले जर्मनी का कब्जा था, फिर ऑस्ट्रेलिया ने इसे प्रशासित किया। उल्लेखनीय है कि इस देश की अपनी कोई राजधानी नहीं है।
1970 के दशक में फॉस्फेट खनन से यह द्वीप समृद्ध हो गया था, लेकिन उद्योग बंद होने के बाद 1990 के दशक में यह आर्थिक संकट में आ गया। अब यह जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते समुद्र स्तर से सर्वाधिक खतरे में पड़े देशों में शुमार है, जिसकी वजह से सरकार को एक सशुल्क नागरिकता कार्यक्रम के जरिए विदेशी निवेश की तलाश करनी पड़ रही है।
औपनिवेशिक नामों से मुक्ति की वैश्विक प्रवृत्ति
नाओरो इस कदम से औपनिवेशिक अतीत से दूरी बनाने वाला नवीनतम देश बन गया है। इससे पहले अफ्रीकी देश एस्वातिनी ने 2018 में अपना पुराना नाम स्वाजीलैंड बदला था। तुर्की ने 2022 में संयुक्त राष्ट्र से अनुरोध किया था कि उसे तुर्किए के नाम से संबोधित किया जाए। राष्ट्रपति एडियांग ने कहा कि यह बदलाव 'नए राष्ट्रीय गौरव की शुरुआत' का संकेत देता है।