अफगानिस्तान में पाकिस्तानी हवाई हमले: कुनार में नागरिकों की मौत, यूएनएएमए ने की पुष्टि
सारांश
मुख्य बातें
पाकिस्तान द्वारा अफगानिस्तान के कुनार प्रांत में सितंबर 2026 में किए गए हवाई हमलों में एक पुरुष, एक महिला और एक बच्ची की मौत की पुष्टि संयुक्त राष्ट्र अफगानिस्तान मिशन (यूएनएएमए) ने की है। इस्लामाबाद का दावा था कि उसने तहरीक ए तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया, लेकिन रिपोर्टों के अनुसार उन तथाकथित लड़ाकों की पहचान स्वतंत्र रूप से स्थापित नहीं हो सकी, जबकि मारे गए नागरिकों के नाम, परिवार और मृत्युस्थल सार्वजनिक रिकॉर्ड में दर्ज हैं। यह घटना पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच बढ़ते तनाव की नई कड़ी है।
मुख्य घटनाक्रम
'पारहेशिया न्यूज' में प्रकाशित एक विश्लेषण के अनुसार, यूएनएएमए ने एक बार फिर पाकिस्तानी हवाई हमलों के बाद अफगान नागरिकों की मौत की पुष्टि की है। रिपोर्ट में कहा गया, "इस्लामाबाद ने घोषणा की थी कि उसने आतंकवादी ठिकानों पर हमला किया और टीटीपी लड़ाकों को मारा, लेकिन उन लड़ाकों की पहचान स्वतंत्र रूप से स्थापित नहीं की गई है, जबकि नागरिकों की पहचान — हमेशा की तरह — नाम, परिवार और मरने की जगह के साथ हुई है।"
गौरतलब है कि यह कोई पहली बार नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तानी अभियानों में बार बार अफगान नागरिकों की मौत हुई है — चाहे वे सीमावर्ती प्रांत हों या काबुल में ओमेद नशा पुनर्वास केंद्र जैसी जगहें। यह एक ऐसा पैटर्न बनता जा रहा है जिसमें पाकिस्तानी सेना अपने लक्ष्यों की घोषणा करती है, जबकि दूसरे उसके द्वारा मारे गए लोगों का दस्तावेजीकरण करते हैं।
रणनीतिक गहराई का सिद्धांत और उसकी विफलता
रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि यह बदलाव दर्शाता है कि पाकिस्तान की दशकों पुरानी 'रणनीतिक गहराई' की नीति किस हद तक ध्वस्त हो चुकी है। काबुल में अपनी मनमर्जी चलाने में नाकाम रहने के बाद, इस्लामाबाद अब उसी तालिबान शासन को अस्थिर करने के रास्ते तलाश रहा है जिसकी जीत का उसने कभी उत्सव मनाया था।
रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तानी जनरल अफगानिस्तान में इसलिए युद्ध लड़ रहे हैं क्योंकि वे काबुल पर अपनी इच्छा थोपने में विफल रहे हैं। विश्लेषण के अनुसार, 'हवाई हमले उन्हें एक साथ दो मोर्चों पर लड़ने का अवसर देते हैं — एक ऐसी अफगान सरकार को दंडित करना जो उनकी बात मानने से इनकार करती है, और साथ ही पाकिस्तानी जनता को यह संदेश देना कि सेना सक्रिय है।'
टीटीपी दावों पर सवाल
रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से यह प्रश्न उठाया गया है: आखिर हमले में मारा कौन गया? विश्लेषकों के अनुसार, यह तो संभव है कि किसी हमले में नागरिक और आतंकी दोनों मारे जाएं, लेकिन जब बार बार केवल आम अफगानों की मौत की पुष्टि हो रही हो, तो केवल इरादे को पर्याप्त सबूत नहीं माना जा सकता।
रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तानी सेना के दावों के पक्ष में स्वतंत्र साक्ष्य मिलना कठिन है, जबकि आम नागरिकों की मौत के दस्तावेज — उनके नाम और परिवारों सहित — सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं।
सेना की राजनीतिक हैसियत पर असर
रिपोर्ट के अनुसार, खैबर पख्तूनख्वा में लगातार जारी हिंसा और उग्रवाद ने पाकिस्तानी सेना के उस दावे को कमज़ोर किया है जिसमें वह खुद को देश की सुरक्षा का एकमात्र गारंटर बताती है। लगातार हो रहे हमले यह साबित करते हैं कि सुरक्षा के नाम पर सत्ता पर काबिज रहने का सेना का तर्क अब कमज़ोर पड़ रहा है।
यह ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान आंतरिक आर्थिक संकट और राजनीतिक अस्थिरता से भी जूझ रहा है। आलोचकों का कहना है कि अफगानिस्तान में सैन्य कार्रवाई घरेलू विफलताओं से ध्यान भटकाने का एक साधन भी हो सकती है।
आगे क्या
अफगान तालिबान सरकार और पाकिस्तान के बीच तनाव इन हमलों के बाद और गहरा होने की संभावना है। रिपोर्टों के अनुसार, काबुल पाकिस्तानी कार्रवाइयों को अपनी संप्रभुता का उल्लंघन मानता है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय और मानवाधिकार संगठनों की ओर से जवाबदेही की माँग बढ़ती रहेगी, जबकि यूएनएएमए जैसी संस्थाएँ नागरिक हताहतों का दस्तावेजीकरण जारी रखेंगी।