पाकिस्तान में पाँच साल में 333 ईशनिंदा केस, संसदीय समिति को बताया — अधिकतर आरोप फर्जी निकले
सारांश
मुख्य बातें
पाकिस्तान के चार प्रांतों में पिछले पाँच वर्षों के दौरान दर्ज किए गए 333 ईशनिंदा मामलों में से अधिकतर झूठे पाए गए हैं — यह खुलासा स्वयं सरकारी अधिकारियों ने सीनेट की मानवाधिकार संबंधी कार्यात्मक समिति के समक्ष किया। प्रांतीय गृह सचिवों और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने स्वीकार किया कि इन मामलों में ईसाइयों और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों को भी निशाना बनाया गया।
प्रांत-वार आँकड़े
समिति के सामने प्रस्तुत आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, पंजाब प्रांत में ईशनिंदा कानून की धारा 295-सी के तहत सर्वाधिक 116 मामले दर्ज हुए। सिंध में धारा 295-बी के अंतर्गत 96 मामले और धारा 295-सी के तहत 29 मामले दर्ज किए गए। खैबर पख्तूनख्वा में इसी अवधि में 90 से अधिक ईशनिंदा मामले सामने आए, जबकि बलूचिस्तान में 28 मामले दर्ज हुए।
आरोपों की प्रकृति और जाँच के निष्कर्ष
प्रांतीय अधिकारियों ने समिति को बताया कि ईशनिंदा के आरोप प्रायः व्यक्तिगत दुश्मनी, पारिवारिक विवाद और निजी झगड़ों से प्रेरित होते हैं। अनेक मामलों में जाँच के दौरान आरोपों को प्रमाणित करने वाला कोई साक्ष्य नहीं मिला, जिसके बाद उन्हें खारिज कर दिया गया। यह ऐसे समय में सामने आया है जब मानवाधिकार संगठन वर्षों से इन कानूनों के दुरुपयोग पर सवाल उठाते रहे हैं।
अल्पसंख्यकों पर असर और रिम्शा मसीह का मामला
वॉयस ऑफ पाकिस्तान माइनॉरिटी (वीओपीएम) के अनुसार, ईशनिंदा कानून पाकिस्तान के सबसे विवादास्पद मुद्दों में से एक बने हुए हैं और इनका सर्वाधिक प्रभाव धार्मिक अल्पसंख्यकों पर पड़ता है। संगठन ने ईसाई लड़की रिम्शा मसीह के मामले का उल्लेख किया, जिन पर कुरान के अपमान का आरोप लगाया गया था। बाद में सामने आए साक्ष्यों से संकेत मिला कि आरोप 'गढ़े हुए' थे। हालाँकि उन्हें रिहा कर दिया गया, लेकिन तब तक उनके परिवार को भारी दबाव झेलना पड़ा था।
वीओपीएम ने कहा, 'न्यायपालिका और कानून लागू करने वाली एजेंसियों की बार-बार आलोचना हुई है कि वे ईशनिंदा के आरोपों का दुरुपयोग करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने में विफल रही हैं। जब झूठे आरोप लगाने वालों को जवाबदेह नहीं ठहराया जाता, तो यह खतरनाक संदेश जाता है कि ऐसे काम बिना परिणाम के जारी रह सकते हैं।'
विशेषज्ञों और संगठनों की राय
मानवाधिकार संगठनों और कानूनी विशेषज्ञों ने लंबे समय से पाकिस्तान के ईशनिंदा कानूनों की आलोचना की है। उनका कहना है कि इन कानूनों का इस्तेमाल व्यक्तिगत बदला लेने, संपत्ति पर कब्जा करने और अल्पसंख्यकों को दबाने के लिए किया जाता है। 22 जुलाई को एक प्रमुख अल्पसंख्यक अधिकार संगठन ने आरोप लगाया था कि पाकिस्तान इन कानूनों के दुरुपयोग को रोकने में विफल रहा है, और झूठे आरोपों तथा भीड़ की हिंसा की घटनाओं का हवाला दिया था।
आगे क्या
सीनेट की मानवाधिकार समिति के समक्ष इस स्वीकारोक्ति के बाद अब यह देखना होगा कि पाकिस्तान सरकार ईशनिंदा कानूनों के दुरुपयोग को रोकने के लिए कोई ठोस विधायी या प्रशासनिक कदम उठाती है या नहीं। मानवाधिकार संगठनों ने झूठे आरोप लगाने वालों के लिए सख्त दंड और स्वतंत्र जाँच तंत्र की माँग की है।