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पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट ने ईसाई दंपती शहजाद-शमा हत्याकांड के सभी दोषियों को बरी किया, 2014 की बर्बरता को मिला नहीं न्याय

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पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट ने ईसाई दंपती शहजाद-शमा हत्याकांड के सभी दोषियों को बरी किया, 2014 की बर्बरता को मिला नहीं न्याय

सारांश

2014 में पाकिस्तान के कसूर में ईसाई दंपती को जिंदा जलाने का मामला 11 साल बाद पूरी तरह बंद हो गया — एक भी दोषी नहीं बचा। सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम तीन दोषियों को भी बरी कर दिया। यह फैसला पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के लिए न्याय की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

मुख्य बातें

पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय ने 10 जुलाई 2025 को ईसाई दंपती हत्याकांड के अंतिम तीन दोषियों को बरी किया।
घटना 4 नवंबर 2014 को कसूर जिले, पंजाब (पाकिस्तान) में हुई थी; 1,000 से अधिक की भीड़ ने दंपती को जिंदा जलाया था।
अब इस मामले में कोई भी व्यक्ति दोषी नहीं; 102 आरोपियों की बरी को चुनौती देने वाली पंजाब सरकार की अपील भी खारिज।
बिशप सैमसन शुकार्डिन और बिशप इंद्रियास रहमत ने इसे पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों को न्याय न मिलने के पैटर्न का हिस्सा बताया।
अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष का मामला कमज़ोर था और पुलिस द्वारा साक्ष्य प्रस्तुति में गंभीर खामियाँ थीं।

पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय ने 10 जुलाई 2025 को उन अंतिम तीन दोषियों को भी बरी कर दिया, जिन्हें 2014 में ईसाई दंपती शहजाद मसीह (26) और उनकी गर्भवती पत्नी शमा बीबी (24) को जिंदा ईंट-भट्ठे में फेंककर जलाने के मामले में मौत की सजा सुनाई गई थी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष का मामला साक्ष्य के मोर्चे पर अत्यंत कमज़ोर था और पुलिस द्वारा सबूत पेश करने की प्रक्रिया में गंभीर खामियाँ थीं। इस फैसले के साथ ही इस जघन्य हत्याकांड में अब एक भी व्यक्ति दोषी करार नहीं है।

मुख्य घटनाक्रम: 2014 की वह काली रात

यह दर्दनाक घटना 4 नवंबर 2014 को पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के कसूर जिले में घटी थी। शहजाद मसीह और शमा बीबी एक स्थानीय ईंट-भट्ठे में मज़दूरी करते थे। उन पर कुरान के पन्नों की बेअदबी करने का आरोप लगाया गया, जिसे मानवाधिकार संगठनों ने झूठा और बेबुनियाद बताया। ईंट-भट्ठे के मालिक ने कथित तौर पर पैसों के विवाद के चलते दंपती को भागने से रोके रखा था।

एक स्थानीय मस्जिद के इमाम ने लाउडस्पीकर से भीड़ को भड़काया, जिसके बाद 1,000 से अधिक लोग वहाँ जमा हो गए। भीड़ ने दंपती को बुरी तरह पीटा और प्रताड़ित किया, और अंततः उन्हें औद्योगिक ईंट-भट्ठे की धधकती आग में जिंदा फेंक दिया।

न्यायिक प्रक्रिया: सजा से बरी तक का सफर

घटना के बाद आतंकवाद निरोधी अदालत (ATC) ने कई आरोपियों को दोषी ठहराया था। पाँच लोगों को मृत्युदंड और आठ अन्य को दो-दो वर्ष के कारावास की सजा सुनाई गई थी। हालाँकि, समय के साथ उच्च अदालतों ने साक्ष्य की कमी का हवाला देते हुए अधिकांश दोषसिद्धियाँ पलट दीं। 2018 में एक अदालत ने 20 अन्य आरोपियों को बरी कर दिया।

पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में पंजाब प्रांतीय सरकार की उस अपील को भी खारिज कर दिया, जिसमें 102 आरोपियों को बरी किए जाने को चुनौती दी गई थी। अब इस पूरे मामले में कोई भी व्यक्ति दोषी नहीं बचा है।

चर्च और मानवाधिकार संगठनों की प्रतिक्रिया

कैथोलिक चैरिटी संस्था एड टू द चर्च इन नीड (ACN) को दिए साक्षात्कार में, पाकिस्तान के कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष बिशप सैमसन शुकार्डिन और फैसलाबाद के बिशप इंद्रियास रहमत ने कहा कि यह बरी किया जाना उसी व्यापक पैटर्न का हिस्सा है, जिसमें पाकिस्तान में ईसाइयों और अन्य अल्पसंख्यकों को लक्षित हिंसा के बाद न्याय नहीं मिलता। उन्होंने इसे संस्थागत विफलता का प्रतीक बताया।

आम जनता और अल्पसंख्यकों पर असर

यह मामला पाकिस्तान में ईशनिंदा कानूनों के दुरुपयोग की एक बानगी माना जाता है। मानवाधिकार विशेषज्ञों के अनुसार, इन कानूनों का इस्तेमाल अक्सर अल्पसंख्यकों — विशेषकर ईसाइयों, अहमदियों और हिंदुओं — के खिलाफ व्यक्तिगत रंजिश या आर्थिक विवादों में किया जाता है। शमा बीबी की गर्भावस्था के बावजूद भीड़ की निर्ममता ने उस समय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक निंदा बटोरी थी।

क्या होगा आगे

इस फैसले के बाद अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने पाकिस्तान सरकार से ईशनिंदा कानूनों में सुधार और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की माँग की है। आलोचकों का कहना है कि जब तक साक्ष्य संग्रह और न्यायिक प्रक्रिया में आमूल सुधार नहीं होता, ऐसे मामलों में न्याय मिलना लगभग असंभव रहेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

तो सवाल कानून की तकनीकी खामियों से आगे जाता है। ईशनिंदा कानूनों का दुरुपयोग और साक्ष्य संग्रह में पुलिस की 'खामियाँ' — दोनों अक्सर एक ही दिशा में इशारा करते हैं। अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद पाकिस्तान में अल्पसंख्यक उत्पीड़न के मामलों में जवाबदेही का यह पैटर्न बार-बार दोहराया जाता है, और यह फैसला उसी की एक और कड़ी है।
RashtraPress
20 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शहजाद मसीह और शमा बीबी के साथ क्या हुआ था?
4 नवंबर 2014 को पाकिस्तान के कसूर जिले में ईंट-भट्ठे पर काम करने वाले ईसाई दंपती शहजाद मसीह और उनकी गर्भवती पत्नी शमा बीबी पर कुरान की बेअदबी का झूठा आरोप लगाया गया। मस्जिद के लाउडस्पीकर से भड़काई गई 1,000 से अधिक की भीड़ ने उन्हें बुरी तरह पीटा और जिंदा ईंट-भट्ठे में फेंक दिया।
पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट ने दोषियों को क्यों बरी किया?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष का मामला साक्ष्य के मोर्चे पर कमज़ोर था और स्थानीय पुलिस द्वारा सबूत पेश करने की प्रक्रिया में गंभीर खामियाँ थीं। इन्हीं आधारों पर अंतिम तीन दोषियों की मौत की सजा रद्द कर उन्हें बरी कर दिया गया।
इस मामले में कुल कितने लोगों को बरी किया गया?
शुरुआत में आतंकवाद निरोधी अदालत ने पाँच लोगों को मृत्युदंड और आठ को कारावास की सजा दी थी। 2018 में 20 अन्य आरोपी बरी हुए। सुप्रीम कोर्ट ने 102 आरोपियों की बरी को चुनौती देने वाली पंजाब सरकार की अपील खारिज की और अंतिम तीन दोषियों को भी बरी कर दिया — अब कोई भी दोषी नहीं बचा।
पाकिस्तान में ईसाई अल्पसंख्यकों के लिए यह फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?
बिशप सैमसन शुकार्डिन और बिशप इंद्रियास रहमत के अनुसार, यह बरी किया जाना उस व्यापक पैटर्न की पुष्टि करता है जिसमें पाकिस्तान में ईसाइयों और अन्य अल्पसंख्यकों को लक्षित हिंसा के बाद न्याय नहीं मिलता। मानवाधिकार संगठन इसे ईशनिंदा कानूनों के दुरुपयोग का प्रतीक मानते हैं।
क्या पाकिस्तान में ईशनिंदा कानूनों में सुधार की माँग हो रही है?
इस फैसले के बाद अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने पाकिस्तान सरकार से ईशनिंदा कानूनों में सुधार और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की माँग की है। आलोचकों का कहना है कि इन कानूनों का इस्तेमाल अक्सर व्यक्तिगत रंजिश और आर्थिक विवादों में अल्पसंख्यकों के खिलाफ किया जाता है।
राष्ट्र प्रेस
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