पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट ने ईसाई दंपती शहजाद-शमा हत्याकांड के सभी दोषियों को बरी किया, 2014 की बर्बरता को मिला नहीं न्याय
सारांश
मुख्य बातें
पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय ने 10 जुलाई 2025 को उन अंतिम तीन दोषियों को भी बरी कर दिया, जिन्हें 2014 में ईसाई दंपती शहजाद मसीह (26) और उनकी गर्भवती पत्नी शमा बीबी (24) को जिंदा ईंट-भट्ठे में फेंककर जलाने के मामले में मौत की सजा सुनाई गई थी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष का मामला साक्ष्य के मोर्चे पर अत्यंत कमज़ोर था और पुलिस द्वारा सबूत पेश करने की प्रक्रिया में गंभीर खामियाँ थीं। इस फैसले के साथ ही इस जघन्य हत्याकांड में अब एक भी व्यक्ति दोषी करार नहीं है।
मुख्य घटनाक्रम: 2014 की वह काली रात
यह दर्दनाक घटना 4 नवंबर 2014 को पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के कसूर जिले में घटी थी। शहजाद मसीह और शमा बीबी एक स्थानीय ईंट-भट्ठे में मज़दूरी करते थे। उन पर कुरान के पन्नों की बेअदबी करने का आरोप लगाया गया, जिसे मानवाधिकार संगठनों ने झूठा और बेबुनियाद बताया। ईंट-भट्ठे के मालिक ने कथित तौर पर पैसों के विवाद के चलते दंपती को भागने से रोके रखा था।
एक स्थानीय मस्जिद के इमाम ने लाउडस्पीकर से भीड़ को भड़काया, जिसके बाद 1,000 से अधिक लोग वहाँ जमा हो गए। भीड़ ने दंपती को बुरी तरह पीटा और प्रताड़ित किया, और अंततः उन्हें औद्योगिक ईंट-भट्ठे की धधकती आग में जिंदा फेंक दिया।
न्यायिक प्रक्रिया: सजा से बरी तक का सफर
घटना के बाद आतंकवाद निरोधी अदालत (ATC) ने कई आरोपियों को दोषी ठहराया था। पाँच लोगों को मृत्युदंड और आठ अन्य को दो-दो वर्ष के कारावास की सजा सुनाई गई थी। हालाँकि, समय के साथ उच्च अदालतों ने साक्ष्य की कमी का हवाला देते हुए अधिकांश दोषसिद्धियाँ पलट दीं। 2018 में एक अदालत ने 20 अन्य आरोपियों को बरी कर दिया।
पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में पंजाब प्रांतीय सरकार की उस अपील को भी खारिज कर दिया, जिसमें 102 आरोपियों को बरी किए जाने को चुनौती दी गई थी। अब इस पूरे मामले में कोई भी व्यक्ति दोषी नहीं बचा है।
चर्च और मानवाधिकार संगठनों की प्रतिक्रिया
कैथोलिक चैरिटी संस्था एड टू द चर्च इन नीड (ACN) को दिए साक्षात्कार में, पाकिस्तान के कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष बिशप सैमसन शुकार्डिन और फैसलाबाद के बिशप इंद्रियास रहमत ने कहा कि यह बरी किया जाना उसी व्यापक पैटर्न का हिस्सा है, जिसमें पाकिस्तान में ईसाइयों और अन्य अल्पसंख्यकों को लक्षित हिंसा के बाद न्याय नहीं मिलता। उन्होंने इसे संस्थागत विफलता का प्रतीक बताया।
आम जनता और अल्पसंख्यकों पर असर
यह मामला पाकिस्तान में ईशनिंदा कानूनों के दुरुपयोग की एक बानगी माना जाता है। मानवाधिकार विशेषज्ञों के अनुसार, इन कानूनों का इस्तेमाल अक्सर अल्पसंख्यकों — विशेषकर ईसाइयों, अहमदियों और हिंदुओं — के खिलाफ व्यक्तिगत रंजिश या आर्थिक विवादों में किया जाता है। शमा बीबी की गर्भावस्था के बावजूद भीड़ की निर्ममता ने उस समय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक निंदा बटोरी थी।
क्या होगा आगे
इस फैसले के बाद अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने पाकिस्तान सरकार से ईशनिंदा कानूनों में सुधार और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की माँग की है। आलोचकों का कहना है कि जब तक साक्ष्य संग्रह और न्यायिक प्रक्रिया में आमूल सुधार नहीं होता, ऐसे मामलों में न्याय मिलना लगभग असंभव रहेगा।