11 अक्टूबर 2026
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पाकिस्तानी मानवाधिकार वकीलों की गिरफ्तारी पर अमेरिका-ब्रिटेन के शिक्षाविदों ने उठाई आवाज़, तत्काल रिहाई की माँग

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पाकिस्तानी मानवाधिकार वकीलों की गिरफ्तारी पर अमेरिका-ब्रिटेन के शिक्षाविदों ने उठाई आवाज़, तत्काल रिहाई की माँग

सारांश

पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय से जमानत मिलने के कुछ ही घंटों बाद दोनों मानवाधिकार वकीलों को फिर से हिरासत में लेना — और फिर अमेरिका-ब्रिटेन के विश्वविद्यालयों से अंतरराष्ट्रीय विरोध — यह पाकिस्तान में असहमति को दबाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर अब वैश्विक रोशनी डाल रहा है।

मुख्य बातें

पाकिस्तानी मानवाधिकार वकील इमान जैनब मजारी-हाजिर और हादी अली चट्ठा फिलहाल हिरासत में हैं।
जनवरी 2026 में PECA कानून के तहत दोनों को 17 साल की सजा सुनाई गई थी।
पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय ने 17 सितंबर 2026 को जमानत दी, लेकिन कुछ ही घंटों में पुलिस ने नए मामले में हिरासत में लिया।
अमेरिका और ब्रिटेन के विश्वविद्यालयों के शिक्षाविदों ने संयुक्त बयान जारी कर तत्काल रिहाई की माँग की।
हस्ताक्षरकर्ताओं ने ICCPR के तहत पाकिस्तान की जिम्मेदारी और इंटरनेशनल कमीशन ऑफ ज्यूरिस्ट्स के रुख का हवाला दिया।

पाकिस्तानी मानवाधिकार वकीलों इमान जैनब मजारी-हाजिर और हादी अली चट्ठा की हिरासत के विरोध में अमेरिका और ब्रिटेन के प्रमुख विश्वविद्यालयों में कार्यरत पाकिस्तानी मूल के शिक्षाविदों और विद्वानों ने एकजुट होकर आवाज़ उठाई है। इन शिक्षाविदों ने पाकिस्तानी सरकार से दोनों वकीलों पर लगे आरोप वापस लेने और उन्हें तत्काल रिहा करने की माँग की है। इस मामले को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून के शासन से जुड़ा गंभीर संकट बताया जा रहा है।

मुख्य घटनाक्रम

रिपोर्टों के अनुसार, जनवरी 2026 में दोनों वकीलों को सोशल मीडिया पोस्ट के मामले में इलेक्ट्रॉनिक अपराधों की रोकथाम संबंधी कानून (PECA) के तहत 17 साल की जेल की सजा सुनाई गई थी। उनकी पोस्ट में कथित मानवाधिकार उल्लंघनों की आलोचना की गई थी।

पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय ने 17 सितंबर 2026 को उनकी सजा निलंबित करते हुए जमानत दे दी। हालाँकि, कुछ ही घंटों के भीतर पुलिस ने उन्हें एक अलग मामले में हिरासत में ले लिया। दोनों वकील फिलहाल हिरासत में बताए जा रहे हैं।

वकीलों का कार्य और योगदान

पाकिस्तानी अखबार डॉन की रिपोर्ट के अनुसार, शिक्षाविदों ने बताया कि मजारी-हाजिर ने जबरन गुमशुदगी के मामलों के खिलाफ आवाज़ उठाई है, पीड़ितों और उनके परिजनों का प्रतिनिधित्व किया है तथा प्रतिष्ठान को सार्वजनिक रूप से चुनौती दी है। वहीं, चट्ठा ने ईशनिंदा के आरोपों का सामना कर रहे लोगों और मृत्युदंड की सजा पाए कैदियों का बचाव किया है।

शिक्षाविदों की प्रतिक्रिया और माँगें

संयुक्त बयान में शिक्षाविदों ने कहा, 'आपराधिक कानून का इस्तेमाल असहमति की आवाज़ दबाने या अपनी कानूनी पैरवी के कारण वकीलों को डराने के हथियार के रूप में नहीं किया जाना चाहिए।' उन्होंने पाकिस्तान की संघीय सरकार, न्यायपालिका और अन्य सरकारी संस्थानों से देश के संवैधानिक तथा अंतरराष्ट्रीय कानूनी दायित्वों का पालन करने की अपील की।

हस्ताक्षरकर्ताओं ने तर्क दिया कि अंतरराष्ट्रीय नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों की वाचा (ICCPR) का पक्षकार होने के नाते पाकिस्तान की जिम्मेदारी है कि वह राज्य संस्थानों की आलोचना करने के अधिकार की रक्षा करे। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया टिप्पणी पर 17 साल की सजा इस दायित्व के अनुरूप नहीं है।

बयान में इंटरनेशनल कमीशन ऑफ ज्यूरिस्ट्स सहित अन्य अंतरराष्ट्रीय कानूनी संस्थाओं के रुख का भी हवाला दिया गया।

बयान पर हस्ताक्षर करने वाले प्रमुख शिक्षाविद

इस बयान पर हस्ताक्षर करने वाले प्रमुख शिक्षाविदों में स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज की आयशा सिद्दीका, टफ्ट्स यूनिवर्सिटी के फहद हमायूं, यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिल्वेनिया के हाशिम बिन राशिद, यूनिवर्सिटी ऑफ वॉल्वरहैम्प्टन की मारिया राशिद, सिटी यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूयॉर्क के रजा रूमी, यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन की रीम खुर्शीद, यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रैडफोर्ड के यूनुस समद और यूनिवर्सिटी ऑफ वारविक की जोहा वसीम शामिल हैं।

आगे क्या होगा

यह ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान में PECA कानून के तहत मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और वकीलों पर मुकदमेबाज़ी की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना बढ़ रही है। अंतरराष्ट्रीय दबाव में पाकिस्तानी प्रतिष्ठान कैसी प्रतिक्रिया देता है, यह आने वाले हफ्तों में स्पष्ट होगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि कथित तौर पर एक सुनियोजित रणनीति की ओर इशारा करती है जिसका उद्देश्य असहमति की आवाज़ों को न्यायिक राहत से बाहर रखना है। PECA जैसे कानूनों का बार-बार ऐसे मामलों में उपयोग यह सवाल खड़ा करता है कि क्या पाकिस्तान में डिजिटल अभिव्यक्ति के लिए कोई सुरक्षित स्थान बचा है। अंतरराष्ट्रीय शिक्षाविदों का यह हस्तक्षेप सकारात्मक है, लेकिन असली कसौटी यह होगी कि क्या पाकिस्तानी प्रतिष्ठान पर ICCPR दायित्वों का कोई व्यावहारिक दबाव पड़ता है — या यह केवल बयानबाज़ी तक सिमट कर रह जाता है।
RashtraPress
11 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इमान जैनब मजारी-हाजिर और हादी अली चट्ठा को क्यों गिरफ्तार किया गया?
दोनों वकीलों को जनवरी 2026 में सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर PECA कानून के तहत 17 साल की सजा सुनाई गई थी, जिसमें कथित मानवाधिकार उल्लंघनों की आलोचना की गई थी। सर्वोच्च न्यायालय से जमानत मिलने के बाद उन्हें एक अलग मामले में फिर से हिरासत में लिया गया।
पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय ने क्या फैसला दिया था?
पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय ने 17 सितंबर 2026 को दोनों वकीलों की सजा निलंबित कर उन्हें जमानत दे दी थी। हालाँकि, जमानत मिलने के कुछ ही घंटों बाद पुलिस ने उन्हें एक नए मामले में हिरासत में ले लिया।
किन शिक्षाविदों ने वकीलों की रिहाई की माँग की है?
अमेरिका और ब्रिटेन के विश्वविद्यालयों में कार्यरत पाकिस्तानी मूल के शिक्षाविदों ने यह माँग की है। इनमें आयशा सिद्दीका (SOAS), फहद हमायूं (टफ्ट्स), रजा रूमी (CUNY) और अन्य प्रमुख विद्वान शामिल हैं।
PECA कानून क्या है और इसका दुरुपयोग क्यों विवादास्पद है?
PECA यानी इलेक्ट्रॉनिक अपराधों की रोकथाम संबंधी कानून पाकिस्तान में साइबर अपराधों को नियंत्रित करने के लिए बना है। आलोचकों का कहना है कि इसका उपयोग अक्सर सरकार या प्रतिष्ठान की आलोचना करने वाले पत्रकारों, वकीलों और कार्यकर्ताओं को चुप कराने के लिए किया जाता है।
इस मामले में अंतरराष्ट्रीय कानूनी संस्थाओं की क्या स्थिति है?
शिक्षाविदों ने इंटरनेशनल कमीशन ऑफ ज्यूरिस्ट्स सहित अन्य अंतरराष्ट्रीय कानूनी संस्थाओं के रुख का हवाला दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि ICCPR के पक्षकार के रूप में पाकिस्तान को राज्य संस्थानों की आलोचना के अधिकार की रक्षा करना संवैधानिक और अंतरराष्ट्रीय दायित्व है।
राष्ट्र प्रेस
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