पाकिस्तान में नागरिक आजादी और न्यायिक स्वतंत्रता में गिरावट, एचआरसीपी की रिपोर्ट में गंभीर चेतावनी

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पाकिस्तान में नागरिक आजादी और न्यायिक स्वतंत्रता में गिरावट, एचआरसीपी की रिपोर्ट में गंभीर चेतावनी

सारांश

पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग की ताजा रिपोर्ट एक भयावह तस्वीर पेश करती है — जहाँ कानून ही दमन का हथियार बन गया है। पीईसीए संशोधन, आतंकवाद-रोधी कानूनों का दुरुपयोग और 27वें संवैधानिक संशोधन के बाद न्यायपालिका पर सरकारी शिकंजा — ये सब मिलकर पाकिस्तान में लोकतांत्रिक ढाँचे को खोखला कर रहे हैं।

मुख्य बातें

एचआरसीपी ने 4 मई 2026 को ' स्टेट ऑफ ह्यूमन राइट्स 2025 ' रिपोर्ट जारी कर पाकिस्तान में नागरिक आजादी में गंभीर गिरावट की चेतावनी दी।
पीईसीए संशोधनों और देशद्रोह कानूनों के जरिए पत्रकारों, एक्टिविस्ट्स और वकीलों को निशाना बनाया गया।
आतंकवाद-रोधी कानून 1997 में बदलाव से बिना आरोप तीन महीने तक हिरासत संभव, खासकर बलूचिस्तान में।
27वें संवैधानिक संशोधन के बाद न्यायपालिका की स्वतंत्रता कमजोर, जजों की नियुक्ति में सरकारी दखल बढ़ा।
पीटीआई को 2024 की आरक्षित सीटों से वंचित करने और आम नागरिकों पर सैन्य अदालतों में मुकदमे की अनुमति देने वाले फैसलों पर गंभीर सवाल।
खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में जबरन गायब किए जाने, फर्जी मुठभेड़ों और सामूहिक सजा के मामले जारी।

पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग (एचआरसीपी) ने सोमवार, 4 मई 2026 को जारी अपनी वार्षिक रिपोर्ट 'स्टेट ऑफ ह्यूमन राइट्स 2025' में गंभीर चिंता जताई कि इस्लामाबाद समेत पूरे पाकिस्तान में बीते एक वर्ष में नागरिक आजादी का दायरा लगातार संकुचित हुआ है, न्यायपालिका की स्वतंत्रता कमजोर पड़ी है और आम नागरिकों में असुरक्षा की भावना बढ़ी है। रिपोर्ट के अनुसार, अभिव्यक्ति की आजादी को व्यापक स्तर पर दबाया गया, जिसका कानून के राज और बुनियादी मानवाधिकारों पर गहरा असर पड़ा है।

असहमति दबाने के लिए कानूनी हथियारों का इस्तेमाल

एचआरसीपी ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि 2025 में असहमति को कुचलने के लिए कानूनी और संस्थागत तंत्र का पहले से कहीं अधिक उपयोग किया गया। इलेक्ट्रॉनिक अपराध रोकथाम कानून (पीईसीए) में किए गए संशोधनों और देशद्रोह तथा आतंकवाद-रोधी कानूनों के सहारे पत्रकारों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं, एक्टिविस्ट्स और वकीलों को निशाना बनाया गया।

रिपोर्ट के अनुसार, डराने-धमकाने, जबरन गायब किए जाने और आवाजाही पर प्रतिबंध जैसी घटनाओं ने एक ऐसा भयावह माहौल बना दिया है, जिसमें लोग खुलकर अपनी बात नहीं कह पा रहे और मानवाधिकार उल्लंघन की घटनाएँ दबकर रह जाती हैं।

आतंकवाद-रोधी कानून में बदलाव और मनमानी हिरासत का खतरा

एचआरसीपी ने बताया कि आतंकवाद-रोधी कानून 1997 में किए गए संशोधनों ने, विशेषकर बलूचिस्तान में, कानून लागू करने वाली एजेंसियों और सेना को यह अधिकार दे दिया है कि वे किसी भी व्यक्ति को बिना आरोप तय किए और बिना किसी अदालती निगरानी के तीन महीने तक हिरासत में रख सकते हैं। आयोग के अनुसार, इससे मनमानी गिरफ्तारी का जोखिम बढ़ा है और नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा कानूनी प्रक्रिया के अधिकार कमजोर हुए हैं।

न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर गहरा संकट

रिपोर्ट में 27वें संवैधानिक संशोधन के बाद न्यायपालिका की स्वतंत्रता में आई गिरावट को विशेष रूप से रेखांकित किया गया है। इस संशोधन ने जजों की नियुक्ति प्रक्रिया को बदलकर सरकार का प्रभाव बढ़ा दिया। रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में अदालतों के कुछ महत्वपूर्ण फैसलों ने लोकतांत्रिक दायरे को और सीमित किया — इनमें आम नागरिकों पर सैन्य अदालतों में मुकदमा चलाने की अनुमति देने वाले फैसले और पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) को 2024 में मिली आरक्षित सीटों से वंचित करने वाले फैसले शामिल हैं।

खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में सुरक्षा संकट

रिपोर्ट के मुताबिक, उग्रवाद और आतंकवाद-रोधी अभियानों का सबसे अधिक असर खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में देखने को मिला, जहाँ आम नागरिकों और सुरक्षाबलों दोनों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। जबरन गायब किए जाने, फर्जी मुठभेड़ों और सामूहिक सजा जैसे मामले जारी रहे। गौरतलब है कि महिलाएँ, बच्चे, धार्मिक अल्पसंख्यक और ट्रांसजेंडर समुदाय जैसे कमजोर वर्ग अब भी हिंसा और भेदभाव का सामना कर रहे हैं और उन्हें पर्याप्त न्याय नहीं मिल रहा।

जलवायु आपदाएँ और श्रमिकों की दुर्दशा

रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि जलवायु से जुड़ी आपदाओं — विशेषकर पाकिस्तान के कब्जे वाले गिलगित-बाल्टिस्तान में — ने कई लोगों की जान ली और बुनियादी ढाँचे को बर्बाद किया। सरकार की प्रतिक्रिया अधिकांशतः तत्काल राहत तक सीमित रही; दीर्घकालिक समाधान की दिशा में कम प्रगति हुई। खदानों में काम करने वाले मजदूर और सफाई कर्मचारी भी हादसों के खतरे में रहते हैं और उनकी सुरक्षा में सुधार की रफ्तार धीमी बनी हुई है।

एचआरसीपी की यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब पाकिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों का दबाव पहले से बढ़ा हुआ है — और आने वाले महीनों में इन मुद्दों पर वैश्विक जाँच और तेज होने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि पाकिस्तानी राज्य की उस बढ़ती प्रवृत्ति का आईना है जिसमें कानून को नागरिकों की रक्षा के लिए नहीं, बल्कि असहमति को कुचलने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। 27वें संवैधानिक संशोधन के जरिए न्यायपालिका पर सरकारी नियंत्रण और पीईसीए के दुरुपयोग का मेल — यह संयोग नहीं, एक सोची-समझी रणनीति लगती है। विशेष रूप से चिंताजनक यह है कि बलूचिस्तान में बिना अदालती निगरानी के तीन महीने की हिरासत का प्रावधान अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों का सीधा उल्लंघन है, फिर भी वैश्विक दबाव सीमित रहा है। जब तक स्वतंत्र न्यायपालिका और जवाबदेह संस्थाएँ बहाल नहीं होतीं, पाकिस्तान में मानवाधिकार की स्थिति में सुधार की उम्मीद बेमानी है।
RashtraPress
14 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एचआरसीपी की 'स्टेट ऑफ ह्यूमन राइट्स 2025' रिपोर्ट क्या है?
यह पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग (एचआरसीपी) की वार्षिक रिपोर्ट है, जो 4 मई 2026 को जारी की गई और जिसमें 2025 के दौरान पाकिस्तान में नागरिक आजादी, न्यायिक स्वतंत्रता और मानवाधिकार उल्लंघनों की स्थिति का विस्तृत विश्लेषण किया गया है।
पाकिस्तान में न्यायपालिका की स्वतंत्रता क्यों कमजोर हुई?
एचआरसीपी के अनुसार, 27वें संवैधानिक संशोधन ने जजों की नियुक्ति प्रक्रिया बदलकर सरकार का प्रभाव बढ़ा दिया। इसके अलावा, 2025 में कुछ अदालती फैसलों — जैसे आम नागरिकों पर सैन्य अदालतों में मुकदमे की अनुमति — ने लोकतांत्रिक दायरे को और सीमित किया।
पाकिस्तान में पीईसीए कानून का पत्रकारों पर क्या असर पड़ा?
इलेक्ट्रॉनिक अपराध रोकथाम कानून (पीईसीए) में किए गए संशोधनों का इस्तेमाल पत्रकारों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और एक्टिविस्ट्स को निशाना बनाने के लिए किया गया। एचआरसीपी के अनुसार, इससे अभिव्यक्ति की आजादी पर गंभीर रोक लगी और डर का माहौल बना।
बलूचिस्तान में मानवाधिकार की स्थिति कैसी है?
एचआरसीपी की रिपोर्ट के अनुसार, बलूचिस्तान में जबरन गायब किए जाने, फर्जी मुठभेड़ों और सामूहिक सजा के मामले 2025 में भी जारी रहे। आतंकवाद-रोधी कानून में बदलाव के बाद वहाँ बिना आरोप तीन महीने तक हिरासत का प्रावधान भी लागू है।
पाकिस्तान में कमजोर वर्गों की स्थिति पर रिपोर्ट में क्या कहा गया?
रिपोर्ट के अनुसार, महिलाएँ, बच्चे, धार्मिक अल्पसंख्यक और ट्रांसजेंडर समुदाय अब भी हिंसा और भेदभाव का सामना कर रहे हैं और उन्हें पर्याप्त न्याय नहीं मिल रहा। खदान मजदूर और सफाई कर्मचारी भी सुरक्षा जोखिम में हैं।
राष्ट्र प्रेस
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