पाकिस्तान में नागरिक आजादी और न्यायिक स्वतंत्रता में गिरावट, एचआरसीपी की रिपोर्ट में गंभीर चेतावनी
सारांश
मुख्य बातें
पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग (एचआरसीपी) ने सोमवार, 4 मई 2026 को जारी अपनी वार्षिक रिपोर्ट 'स्टेट ऑफ ह्यूमन राइट्स 2025' में गंभीर चिंता जताई कि इस्लामाबाद समेत पूरे पाकिस्तान में बीते एक वर्ष में नागरिक आजादी का दायरा लगातार संकुचित हुआ है, न्यायपालिका की स्वतंत्रता कमजोर पड़ी है और आम नागरिकों में असुरक्षा की भावना बढ़ी है। रिपोर्ट के अनुसार, अभिव्यक्ति की आजादी को व्यापक स्तर पर दबाया गया, जिसका कानून के राज और बुनियादी मानवाधिकारों पर गहरा असर पड़ा है।
असहमति दबाने के लिए कानूनी हथियारों का इस्तेमाल
एचआरसीपी ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि 2025 में असहमति को कुचलने के लिए कानूनी और संस्थागत तंत्र का पहले से कहीं अधिक उपयोग किया गया। इलेक्ट्रॉनिक अपराध रोकथाम कानून (पीईसीए) में किए गए संशोधनों और देशद्रोह तथा आतंकवाद-रोधी कानूनों के सहारे पत्रकारों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं, एक्टिविस्ट्स और वकीलों को निशाना बनाया गया।
रिपोर्ट के अनुसार, डराने-धमकाने, जबरन गायब किए जाने और आवाजाही पर प्रतिबंध जैसी घटनाओं ने एक ऐसा भयावह माहौल बना दिया है, जिसमें लोग खुलकर अपनी बात नहीं कह पा रहे और मानवाधिकार उल्लंघन की घटनाएँ दबकर रह जाती हैं।
आतंकवाद-रोधी कानून में बदलाव और मनमानी हिरासत का खतरा
एचआरसीपी ने बताया कि आतंकवाद-रोधी कानून 1997 में किए गए संशोधनों ने, विशेषकर बलूचिस्तान में, कानून लागू करने वाली एजेंसियों और सेना को यह अधिकार दे दिया है कि वे किसी भी व्यक्ति को बिना आरोप तय किए और बिना किसी अदालती निगरानी के तीन महीने तक हिरासत में रख सकते हैं। आयोग के अनुसार, इससे मनमानी गिरफ्तारी का जोखिम बढ़ा है और नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा कानूनी प्रक्रिया के अधिकार कमजोर हुए हैं।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर गहरा संकट
रिपोर्ट में 27वें संवैधानिक संशोधन के बाद न्यायपालिका की स्वतंत्रता में आई गिरावट को विशेष रूप से रेखांकित किया गया है। इस संशोधन ने जजों की नियुक्ति प्रक्रिया को बदलकर सरकार का प्रभाव बढ़ा दिया। रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में अदालतों के कुछ महत्वपूर्ण फैसलों ने लोकतांत्रिक दायरे को और सीमित किया — इनमें आम नागरिकों पर सैन्य अदालतों में मुकदमा चलाने की अनुमति देने वाले फैसले और पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) को 2024 में मिली आरक्षित सीटों से वंचित करने वाले फैसले शामिल हैं।
खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में सुरक्षा संकट
रिपोर्ट के मुताबिक, उग्रवाद और आतंकवाद-रोधी अभियानों का सबसे अधिक असर खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में देखने को मिला, जहाँ आम नागरिकों और सुरक्षाबलों दोनों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। जबरन गायब किए जाने, फर्जी मुठभेड़ों और सामूहिक सजा जैसे मामले जारी रहे। गौरतलब है कि महिलाएँ, बच्चे, धार्मिक अल्पसंख्यक और ट्रांसजेंडर समुदाय जैसे कमजोर वर्ग अब भी हिंसा और भेदभाव का सामना कर रहे हैं और उन्हें पर्याप्त न्याय नहीं मिल रहा।
जलवायु आपदाएँ और श्रमिकों की दुर्दशा
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि जलवायु से जुड़ी आपदाओं — विशेषकर पाकिस्तान के कब्जे वाले गिलगित-बाल्टिस्तान में — ने कई लोगों की जान ली और बुनियादी ढाँचे को बर्बाद किया। सरकार की प्रतिक्रिया अधिकांशतः तत्काल राहत तक सीमित रही; दीर्घकालिक समाधान की दिशा में कम प्रगति हुई। खदानों में काम करने वाले मजदूर और सफाई कर्मचारी भी हादसों के खतरे में रहते हैं और उनकी सुरक्षा में सुधार की रफ्तार धीमी बनी हुई है।
एचआरसीपी की यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब पाकिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों का दबाव पहले से बढ़ा हुआ है — और आने वाले महीनों में इन मुद्दों पर वैश्विक जाँच और तेज होने की संभावना है।