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क्या पाकिस्तान और आईएमएफ का रिश्ता 'लव एंड हेट' है, या सिर्फ टेंशन में 'आतंकिस्तान'?

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क्या पाकिस्तान और आईएमएफ का रिश्ता 'लव एंड हेट' है, या सिर्फ टेंशन में 'आतंकिस्तान'?

सारांश

पाकिस्तान और आईएमएफ के बीच का रिश्ता एक जटिल परिदृश्य को दर्शाता है। एक ओर जहां कर्ज से देश की आर्थिक स्थिति संभालने की उम्मीद है, वहीं दूसरी ओर गंभीर आलोचना और आर्थिक संकट ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। क्या यह संबंध वास्तव में 'लव एंड हेट' है?

मुख्य बातें

पाकिस्तान और आईएमएफ का रिश्ता जटिल है।
आईएमएफ का कर्ज पाकिस्तान के लिए जीवनरेखा है।
आर्थिक नीतियों ने अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है।
उद्योगों का बंद होना चिंता का विषय है।
विदेशी कंपनियों का पलायन बढ़ रहा है।

नई दिल्ली, 16 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। पाकिस्तान एक अजीब ‘लव एंड हेट’ संबंध में फंसा हुआ प्रतीत होता है, जब बात अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की आती है। एक तरफ, यह देश गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है और आईएमएफ से मिल रहे कर्ज पर निर्भर है, दूसरी ओर, इसके मीडिया और राजनीतिक हलकों में इस बहुपरक संस्था की तिघी आलोचना की जा रही है।

जहां सरकार लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए आईएमएफ से कर्ज को जीवनरेखा मानती है, वहीं पूर्व मंत्री और विश्लेषक आईएमएफ को पाकिस्तान की आर्थिक बदहाली का जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।

पाकिस्तान के अखबार द न्यूज इंटरनेशनल में प्रकाशित एक लेख में उल्लेख किया गया है, “आईएमएफ के साथ पाकिस्तान का लंबा जुड़ाव एक तरह के व्यवस्थित विनाश का पैटर्न बन गया है। स्थिरीकरण, राजकोषीय सख्ती और ‘सुधारों’ के नाम पर नीति थोपी गई, जिससे ऊर्जा लागत में वृद्धि, अत्यधिक कर, औद्योगिक उत्पादन में गिरावट, और गरीबी में इजाफा हुआ।”

लेख में कहा गया है कि पाकिस्तान की सामाजिक-आर्थिक विकास रणनीति का केंद्र शिक्षा, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार को मजबूती प्रदान करना होना चाहिए था, ताकि देश कम मूल्य वाली प्राकृतिक संसाधन आधारित अर्थव्यवस्था से निकलकर उच्च मूल्यवर्धित और प्रौद्योगिकी आधारित ज्ञान अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ सके।

हालांकि, इसके विपरीत, अब एक गंभीर अस्तित्वगत संकट खड़ा हो गया है। स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय बदहाल स्थिति में हैं, निर्यात 35 अरब डॉलर से गिरकर लगभग 30 अरब डॉलर पर आ गया है, और प्रतिभाशाली युवाओं का बड़े पैमाने पर विदेश पलायन हुआ है।

पिछले पांच वर्षों में पाकिस्तान के औद्योगिक परिदृश्य में तेज गिरावट आई है। ऊर्जा की बढ़ती लागत, भारी कर बोझ और नीतिगत अनिश्चितता के चलते सैकड़ों स्थानीय विनिर्माण इकाइयां बंद हो गई हैं। उद्योग के नेताओं का दावा है कि प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में 50 प्रतिशत से अधिक फैक्ट्रियां बंद हो चुकी हैं।

क्षेत्रीय आंकड़े भी इसी तरह के रुझान दर्शाते हैं। खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में पिछले छह वर्षों में करीब 795 औद्योगिक इकाइयां बंद हो चुकी हैं।

पाकिस्तान के पारंपरिक निर्यात इंजन माने जाने वाले वस्त्र उद्योग को भी भारी नुकसान हुआ है। उद्योग सूत्रों का अनुमान है कि देशभर में कम से कम 144 टेक्सटाइल मिलें बंद हो चुकी हैं।

लेख में यह भी कहा गया है कि पाकिस्तान से कॉरपोरेट पलायन की लहर में माइक्रोसॉफ्ट जैसे वैश्विक नाम शामिल हैं, जिसने 25 साल बाद देश में अपना परिचालन पूरी तरह बंद करने का निर्णय लिया है। इसके अलावा, करीम, शेल, टेलीनॉर, और प्रॉक्टर एंड गैम्बल जैसी कंपनियां भी पाकिस्तान से बाहर निकल रही हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

मेरा मानना है कि पाकिस्तान को अपनी नीति में सुधार करने की आवश्यकता है। आईएमएफ के साथ संबंधों को बेहतर बनाना चाहिए ताकि आर्थिक स्थिरता प्राप्त की जा सके। यह राष्ट्र और उसके नागरिकों के हित में है।
RashtraPress
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