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पाकिस्तान-अफगानिस्तान तनाव: रणनीतिक सहयोगी तालिबान अब बना सबसे बड़ी सुरक्षा चुनौती

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पाकिस्तान-अफगानिस्तान तनाव: रणनीतिक सहयोगी तालिबान अब बना सबसे बड़ी सुरक्षा चुनौती

सारांश

पाकिस्तान की वह रणनीतिक गणना जिस पर दशकों की मेहनत लगी, अब उलटी पड़ चुकी है। जिस तालिबान को इस्लामाबाद ने पाला-पोसा, वही आज उसके लिए सबसे बड़ा सुरक्षा खतरा है — और टीटीपी, पश्तून पहचान व हवाई हमलों के बीच यह गाँठ आसानी से सुलझने वाली नहीं।

मुख्य बातें

कोलंबिया पॉलिटिकल रिव्यू की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान अब उस अफगान तालिबान से सक्रिय संघर्ष में है जिसे उसने कभी रणनीतिक सहयोगी माना था।
जून 2024 में पाकिस्तान के हवाई हमलों पर दोनों देशों के दावे परस्पर विरोधाभासी रहे — तालिबान ने 13 नागरिकों की मौत बताई, पाकिस्तान ने 26 आतंकवादी मारने का दावा किया।
तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) का अफगान धरती से ऑपरेट करना दोनों देशों के बीच तनाव की मुख्य वजह है।
पश्तून जातीय एकता और वैचारिक समानता के कारण अफगान तालिबान के लिए टीटीपी के विरुद्ध कार्रवाई करना कठिन है।
तालिबान का राजनीतिक आख्यान — विदेशी प्रभाव से आज़ादी — पाकिस्तानी दबाव स्वीकार करने की संभावना को सीमित करता है।
अफगान नागरिकों पर दोहरी मार पड़ रही है — पाकिस्तानी हवाई हमले और तालिबान की लड़कियों की शिक्षा पर पाबंदी ।

पाकिस्तान ने जिस अफगान तालिबान को कभी अपनी क्षेत्रीय रणनीति की धुरी माना था, वही अब उसके लिए सबसे गंभीर सुरक्षा संकट बन चुका है। कोलंबिया पॉलिटिकल रिव्यू में प्रकाशित एक विश्लेषण के अनुसार, तालिबान सरकार अपनी राजनीतिक सत्ता और सुरक्षा प्राथमिकताओं को इस्लामाबाद के अधीन करने से साफ इनकार कर चुकी है, जिसके परिणामस्वरूप दोनों देशों के बीच संबंध सैन्य टकराव तक जा पहुँचे हैं। यह तनाव एक वर्ष से अधिक समय से जारी है और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए नई चुनौतियाँ खड़ी कर रहा है।

रणनीतिक गणना कहाँ गलत पड़ी

रिपोर्ट में विश्लेषक अनाया कय्यूम ने रेखांकित किया है कि अमेरिकी कब्जे के दौरान पाकिस्तान ने तालिबान को सुरक्षित ठिकाने और खुफिया सहायता उपलब्ध कराई थी। इसी आधार पर इस्लामाबाद में यह धारणा बनी थी कि अगस्त 2021 में काबुल पर तालिबान के कब्जे के बाद पाकिस्तान को क्षेत्रीय प्रभाव में बढ़त मिलेगी। हालांकि, यह आकलन बुनियादी तौर पर गलत साबित हुआ — तालिबान ने सत्ता में आते ही पाकिस्तान के निर्देशों पर चलने से इनकार कर दिया।

गौरतलब है कि तालिबान खुद को एक स्वतंत्र इस्लामी राष्ट्रवादी संगठन के रूप में परिभाषित करता है, जिसने अफगानिस्तान को विदेशी आक्रमण से मुक्त कराया। ऐसे में पाकिस्तानी प्रभाव को स्वीकार करना उसके अपने राजनीतिक आख्यान को कमज़ोर करता।

सैन्य टकराव और विरोधाभासी दावे

जून 2024 में पाकिस्तान ने अफगानिस्तान की सीमा के भीतर हवाई हमले किए। तालिबान प्रशासन ने दावा किया कि इन हमलों में 13 नागरिक मारे गए और 14 लोग घायल हुए, जबकि पाकिस्तान ने कहा कि उसने 26 आतंकवादियों को मार गिराया। रिपोर्ट के अनुसार, ऐसे परस्पर विरोधाभासी दावे अब दोनों देशों के बीच एक सामान्य पैटर्न बन चुके हैं — पाकिस्तान इन कार्रवाइयों को आतंकवाद-रोधी अभियान बताता है, जबकि काबुल इन्हें नागरिकों पर आक्रमण करार देता है।

टीटीपी की भूमिका और पश्तून पहचान का उलझाव

दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव की केंद्रीय वजह तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) है। पाकिस्तान का आरोप है कि टीटीपी के लड़ाके अफगान धरती से ऑपरेट करते हुए पाकिस्तान में हमले कर रहे हैं। इस्लामाबाद ने अफगान तालिबान से टीटीपी के विरुद्ध कार्रवाई की माँग की है, लेकिन रिपोर्ट के अनुसार यह माँग दो कारणों से जटिल है — पहला, दोनों संगठनों के बीच वैचारिक समानता और सदस्यों के व्यक्तिगत संबंध; दूसरा, पश्तून जातीय एकता जो सीमा के दोनों ओर फैली है। ऐसे में तालिबान के लिए टीटीपी के खिलाफ सक्रिय होना अपने ही समुदाय के विरुद्ध जाने जैसा होगा।

इसके जवाब में पाकिस्तान ने न केवल हवाई हमले किए, बल्कि बिना दस्तावेजों के रह रहे अफगान शरणार्थियों को भी जबरन देश से बाहर निकालना शुरू किया — एक कदम जिसने कूटनीतिक खाई को और गहरा किया।

अफगान नागरिकों पर असर

रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि इस संघर्ष का सर्वाधिक नुकसान अफगान आम नागरिकों को उठाना पड़ रहा है। एक ओर पाकिस्तान के हवाई हमले, तो दूसरी ओर तालिबान शासन की कठोर नीतियाँ — जिनमें लड़कियों की माध्यमिक और उच्च शिक्षा पर पूर्ण प्रतिबंध शामिल है — ने आम अफगानों के जीवन को बेहद कठिन बना दिया है।

आगे क्या होगा

विश्लेषकों के अनुसार, पाकिस्तान अब उसी शासन के साथ सक्रिय टकराव में है जिसे उसने दशकों तक पोषित किया। रिपोर्ट के निष्कर्ष यह इंगित करते हैं कि जब तक टीटीपी का मुद्दा हल नहीं होता और पश्तून पहचान की राजनीति को संबोधित नहीं किया जाता, तब तक पाकिस्तान-अफगानिस्तान संबंधों में स्थायी सुधार की संभावना कम है। यह संघर्ष न केवल दक्षिण एशियाई सुरक्षा समीकरणों को, बल्कि भारत सहित पूरे क्षेत्र की भू-राजनीतिक स्थिति को भी प्रभावित करता रहेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

और अब उसी से सीधे युद्ध। असल सवाल यह है कि इस्लामाबाद ने यह क्यों मान लिया कि जिस तालिबान ने अमेरिका को झुकाया, वह पाकिस्तान के इशारे पर नाचेगा। टीटीपी समस्या का हल सैन्य हमलों से नहीं, बल्कि पश्तून राजनीतिक वास्तविकताओं को स्वीकार करने से निकलेगा — एक सच जिसे इस्लामाबाद अभी भी टालता नज़र आता है। इस पूरे संकट में सबसे बड़े पीड़ित अफगान नागरिक हैं, जो दो सत्ताओं की शतरंज में मोहरा बने हुए हैं।
RashtraPress
21 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच मौजूदा तनाव की असली वजह क्या है?
मुख्य वजह तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) है, जिस पर पाकिस्तान का आरोप है कि वह अफगान धरती से ऑपरेट करते हुए पाकिस्तान में हमले कर रहा है। अफगान तालिबान ने टीटीपी के खिलाफ कार्रवाई करने से इनकार किया है, जिससे दोनों देशों के बीच तनाव सैन्य टकराव तक पहुँच गया है।
पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में हवाई हमले कब किए और उनका क्या असर हुआ?
जून 2024 में पाकिस्तान ने अफगानिस्तान की सीमा के भीतर हवाई हमले किए। तालिबान प्रशासन ने इनमें 13 नागरिकों की मौत और 14 के घायल होने का दावा किया, जबकि पाकिस्तान ने कहा कि उसने 26 आतंकवादी मार गिराए। इन हमलों ने कूटनीतिक संबंधों को और तनावपूर्ण बना दिया।
तालिबान पाकिस्तान के दबाव में क्यों नहीं आता?
तालिबान अपनी राजनीतिक पहचान एक स्वतंत्र इस्लामी राष्ट्रवादी संगठन के रूप में परिभाषित करता है जिसने अफगानिस्तान को विदेशी कब्जे से आज़ाद कराया। पाकिस्तानी दिशानिर्देश मानना उसके इस आख्यान को कमज़ोर करेगा और उसकी घरेलू वैधता पर सवाल उठाएगा।
पश्तून पहचान इस संघर्ष को कैसे प्रभावित करती है?
सीमा के दोनों ओर रहने वाले पश्तूनों के बीच गहरे जातीय और सामाजिक संबंध हैं जो आधिकारिक सरहद से परे हैं। अफगान तालिबान और टीटीपी दोनों इसी समुदाय से आते हैं, इसलिए तालिबान के लिए टीटीपी के विरुद्ध कार्रवाई करना अपने ही समुदाय के साथ विश्वासघात जैसा होगा।
इस तनाव का अफगान नागरिकों पर क्या असर पड़ रहा है?
अफगान नागरिक दोहरे संकट में हैं — एक तरफ पाकिस्तान के हवाई हमले, दूसरी तरफ तालिबान की कठोर नीतियाँ जिनमें लड़कियों की माध्यमिक और उच्च शिक्षा पर प्रतिबंध शामिल है। इसके अलावा, पाकिस्तान ने बिना दस्तावेजों के रह रहे अफगान शरणार्थियों को भी निष्कासित करना शुरू कर दिया है।
राष्ट्र प्रेस
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