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बलूचिस्तान में पाकिस्तान का नियंत्रण: सहमति से नहीं, जबरदस्ती से

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बलूचिस्तान में पाकिस्तान का नियंत्रण: सहमति से नहीं, जबरदस्ती से

सारांश

बलूचिस्तान में जबरन गुमशुदगी की घटनाएं अब केवल मानवाधिकार का मुद्दा नहीं हैं, बल्कि यह पाकिस्तान के नियंत्रण तंत्र की विफलता को दर्शाती हैं। रिपोर्ट के अनुसार, यह स्थिति एक गंभीर संकट बन गई है, जो राज्य की छवि और राजनीति को प्रभावित कर रही है।

मुख्य बातें

बलूचिस्तान में जबरन गुमशुदगी की घटनाएं बढ़ रही हैं।
राज्य का नियंत्रण तंत्र सहमति पर नहीं, बल्कि जबरदस्ती पर आधारित है।
मानवाधिकारों का उल्लंघन गंभीर संकट का रूप ले चुका है।
पाकिस्तान में बलूचिस्तान को एक संसाधन क्षेत्र के रूप में देखा जाता है।
विरोध प्रदर्शन और न्याय की मांग जारी है।

कोलंबो, 18 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। बलूचिस्तान में जबरन गुमशुदगी की घटनाएं अब केवल मानवाधिकार का मुद्दा नहीं रहीं, बल्कि यह पाकिस्तान के नियंत्रण तंत्र की विफलता को भी उजागर करती हैं। एक अध्ययन में कहा गया है कि राज्य द्वारा अपनाए गए कठोर उपाय अब उसकी कमजोरी और भय को दर्शाने लगे हैं।

श्रीलंका गार्जियन की रिपोर्ट के अनुसार, बलूचिस्तान में “गायब कर देना” अब सिर्फ आरोप नहीं, बल्कि शासन का एक तरीका बन गया है। यह डर की भाषा बन चुकी है और कई परिवारों के लिए राज्य का सबसे कठोर चेहरा है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि कई मामलों में युवक कॉलेज के लिए घर से निकलते हैं और वापस नहीं लौटते, या सुरक्षा चौकियों से उठाए जाने के बाद लापता हो जाते हैं। कई बार कुछ दिनों बाद शव मिलते हैं, जिन पर हिरासत में रहने के संकेत होते हैं, लेकिन आधिकारिक तौर पर कोई जिम्मेदारी स्वीकार नहीं की जाती।

रिपोर्ट के अनुसार, अब यह संकट एक सीमित मानवाधिकार मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि बलूचिस्तान की राजनीति के केंद्र में आ गया है, जिससे राज्य की छवि, विरोध के तरीके और पूरे संघर्ष की प्रकृति प्रभावित हो रही है।

रिपोर्ट में बताया गया है कि 1948 में पाकिस्तान में शामिल किए जाने के बाद से ही बलूचिस्तान को एक “संसाधन क्षेत्र” की तरह देखा गया है, जहां बार-बार सैन्य अभियान, राजनीतिक दमन और प्राकृतिक संसाधनों के बावजूद व्यापक गरीबी देखने को मिलती है।

रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तानी सेना, इंटर-सर्विसेज़ इंटेलिजेंस (आईएसआई) और नागरिक प्रशासन मिलकर ऐसा नियंत्रण तंत्र चला रहे हैं, जो सहमति के बजाय जबरदस्ती पर आधारित है।

इस तंत्र का सबसे कड़ा हथियार “जबरन गुमशुदगी” है। वर्षों से बलूच परिवार आरोप लगाते रहे हैं कि लोगों को घरों, हॉस्टलों या सुरक्षा चौकियों से उठाया जाता है और वे एक ऐसे तंत्र में गायब हो जाते हैं, जहां से उनकी कोई जानकारी नहीं मिलती।

इसके बाद विरोध-प्रदर्शन, प्रेस क्लब के बाहर धरने, राष्ट्रीय राजमार्गों पर बैठकर प्रदर्शन और अदालतों में याचिकाएं दायर करने का सिलसिला शुरू होता है, लेकिन अक्सर इन पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती। कई माताएं अपने लापता परिजनों की तस्वीरें लेकर न्याय की मांग करती रहती हैं।

रिपोर्ट में पांक के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया कि 2025 में 1,355 जबरन गुमशुदगी और 225 न्यायेतर हत्याओं के मामले सामने आए। 2026 में भी यह सिलसिला जारी है, जहां जनवरी में 82 और फरवरी में 109 लोगों के लापता होने की बात कही गई है।

रिपोर्ट के अनुसार, ये आंकड़े भले ही कार्यकर्ताओं के हों, लेकिन ये एक व्यापक और लगातार चल रही व्यवस्था की ओर इशारा करते हैं, जहां गुप्त हिरासत से लेकर कथित “किल एंड डंप” जैसी घटनाएं सामने आ रही हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि वैश्विक समुदाय के लिए भी चिंता का विषय हैं।
RashtraPress
10 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बलूचिस्तान में जबरन गुमशुदगी क्या है?
बलूचिस्तान में जबरन गुमशुदगी का मतलब है कि लोग बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के उठाए जाते हैं और उनकी कोई जानकारी नहीं मिलती।
क्या बलूचिस्तान में मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहा है?
हां, बलूचिस्तान में मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहा है, खासतौर पर जबरन गुमशुदगी और न्यायेतर हत्याओं के मामलों में।
इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया क्या है?
अंतरराष्ट्रीय समुदाय बलूचिस्तान में मानवाधिकारों के उल्लंघन पर चिंता व्यक्त कर रहा है और पाकिस्तान से उत्तरदायित्व की मांग कर रहा है।
बलूचिस्तान में स्थिति की गंभीरता क्या है?
बलूचिस्तान में स्थिति अत्यंत गंभीर है, जहां सरकारी दमन और गुमशुदगी की घटनाएं बढ़ रही हैं।
क्या बलूचिस्तान में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं?
हां, कई परिवार अपने लापता परिजनों की तलाश में विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन इन पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती।
राष्ट्र प्रेस
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