पोप लियो XIV ने अमेरिका-ईरान शांति समझौते का स्वागत किया, मध्य पूर्व में स्थिरता की अपील
सारांश
मुख्य बातें
पोप लियो XIV ने बुधवार, 17 जून को वेटिकन सिटी में साप्ताहिक जनरल ऑडियंस के दौरान अमेरिका और ईरान के बीच हुए शांति समझौते का हार्दिक स्वागत किया और इसे संवाद एवं कूटनीति के 'प्रोत्साहित करने वाले प्रयासों' का परिणाम बताया। 14 जून को अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा घोषित इस पीस डील पर आगामी शुक्रवार को दोनों देश औपचारिक रूप से हस्ताक्षर करेंगे।
पोप का संदेश: संवाद से ही स्थायी शांति
पोप ने अपने संबोधन में कहा, 'यह समझौता आपसी विश्वास, सुरक्षा और मध्य पूर्व में स्थिरता को मजबूत करने में मदद कर सकता है, बशर्ते देशों के बीच संवाद और सहयोग के रास्ते आगे बढ़ाए जाएं।' उन्होंने वार्ता में शामिल सभी पक्षों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए उम्मीद जताई कि यह पहल क्षेत्र में दीर्घकालिक शांति की नींव रखेगी।
संघर्ष की पृष्ठभूमि
28 फरवरी को अमेरिका और इज़राइल के संयुक्त हवाई हमलों के साथ इस संघर्ष का आगाज़ हुआ था। पहले ही दिन सुप्रीम ईरानी लीडर अयातुल्लाह खामेनेई समेत कई वरिष्ठ अधिकारियों को निशाना बनाया गया। इसके जवाब में तेहरान ने खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य प्रतिष्ठानों पर हमले किए, जिसमें कई निर्दोष नागरिकों की भी जान गई। करीब 40 दिनों के हवाई हमलों और अस्थायी संघर्ष विराम के बाद 14 जून को अमेरिकी राष्ट्रपति ने पीस डील की घोषणा की, जिसकी अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने सराहना की।
पोप और ट्रंप के बीच पहले का तनाव
गौरतलब है कि संघर्ष के दौरान भी पोप लियो XIV ने अमेरिका और इज़राइल से हमले रोकने की अपील की थी। इस पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कड़ी आपत्ति जताई थी और आरोप लगाया था कि पोप के बयान से ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने की छूट मिल रही है। यह पृष्ठभूमि पोप के इस स्वागत संदेश को और अधिक कूटनीतिक महत्व देती है।
यूक्रेन पर भी चिंता
पोप ने अपने संबोधन में यूक्रेन युद्ध की 'दुखद' स्थिति का भी उल्लेख किया और वहाँ भी संवाद के माध्यम से शांति स्थापित करने की अपील की। उन्होंने कहा कि वे उन सभी लोगों के साथ खड़े हैं जिन्होंने अपने प्रियजनों को खोया है, जो घायल हुए हैं, और जो विषम परिस्थितियों में भी मानव जीवन की सेवा में लगे हैं।
आगे क्या होगा
आगामी शुक्रवार को अमेरिका और ईरान औपचारिक शांति समझौते पर हस्ताक्षर करेंगे। अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों के अनुसार यह समझौता मध्य पूर्व की भू-राजनीतिक संरचना को नए सिरे से परिभाषित कर सकता है। वेटिकन का यह स्वागत संदेश दर्शाता है कि कैथोलिक चर्च इस प्रक्रिया में एक नैतिक आवाज़ की भूमिका निभाता रहेगा।