दक्षिण कोरिया में गर्भपात गोलियों के नियमों पर ह्यूमन राइट्स वॉच की आपत्ति, WHO मानकों का दिया हवाला
सारांश
मुख्य बातें
ह्यूमन राइट्स वॉच (HRW) ने दक्षिण कोरिया सरकार के प्रस्तावित गर्भपात गोलियों (अबॉर्शन पिल्स) के नियमों पर गंभीर आपत्ति जताई है, यह कहते हुए कि अत्यधिक कड़े प्रतिबंध महिलाओं और लड़कियों की सुरक्षित एवं किफायती प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच को बाधित कर सकते हैं। संगठन ने रविवार, 26 अक्टूबर 2026 को जारी बयान में दक्षिण कोरियाई सरकार से इन नियमों को विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के दिशानिर्देशों के अनुरूप बनाने की अपील की।
प्रस्तावित व्यवस्था का ढाँचा
दक्षिण कोरियाई सरकार ने सितंबर 2026 में घोषणा की थी कि वह गर्भावस्था के नौ सप्ताह तक गर्भपात की दवाओं के उपयोग को औपचारिक मंजूरी देने की योजना बना रही है। प्रस्ताव के अनुसार, शुरुआती दो वर्षों तक केवल बड़े चिकित्सा संस्थानों के डॉक्टर ही ये दवाएँ लिख सकेंगे और सीधे उपलब्ध करा सकेंगे। इसके बाद व्यवस्था में संशोधन पर विचार किया जाएगा।
सरकार का कहना है कि इस व्यवस्था का उद्देश्य महिलाओं के स्वास्थ्य एवं सुरक्षा की रक्षा करना है, ताकि वे अप्रमाणित तरीकों का सहारा लेने के बजाय सुरक्षित चिकित्सा व्यवस्था के भीतर उपचार प्राप्त कर सकें।
HRW की मुख्य आपत्तियाँ
HRW ने प्रस्तावित व्यवस्था के दो बिंदुओं पर विशेष रूप से आपत्ति जताई है। पहला, गर्भपात की दवाओं के उपयोग को गर्भावस्था के नौ सप्ताह तक सीमित रखना — जबकि प्रचलित चिकित्सा मानक 12 सप्ताह तक दवाओं द्वारा गर्भपात की अनुमति देते हैं। दूसरा, शुरुआती दो वर्षों में दवाएँ लिखने और उपलब्ध कराने का अधिकार केवल बड़े चिकित्सा संस्थानों तक सीमित रखना।
HRW की कार्यवाहक महिला अधिकार शोध सहायक सुजैन बर्गस्टेन ने कहा कि पिल्स की अनुमति देना महत्वपूर्ण है, लेकिन नियम इतने कड़े नहीं होने चाहिए कि महिलाएँ इस अधिकार से वंचित हो जाएँ या उनके लिए खर्च वहन करना कठिन हो जाए।
WHO के मानकों से तुलना
संगठन के अनुसार, WHO की सिफारिशें स्पष्ट करती हैं कि उचित प्रशिक्षण प्राप्त स्वास्थ्यकर्मियों का एक व्यापक समूह — न केवल बड़े अस्पतालों के विशेषज्ञ — ऐसी चिकित्सा सेवाएँ उपलब्ध करा सकता है। HRW का तर्क है कि दवाएँ लिखने वाले स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या सीमित रखने से उन महिलाओं को समय पर सहायता मिलने में बाधा आएगी, जिन्हें बड़े अस्पतालों तक पहुँचने में कठिनाई होती है — विशेष रूप से ग्रामीण या दूरदराज़ के क्षेत्रों में रहने वाली महिलाएँ।
क़ानूनी पृष्ठभूमि
दक्षिण कोरिया में गर्भपात से जुड़े कानून लंबे समय से अनिश्चितता में रहे हैं। देश की संवैधानिक अदालत ने 2019 में गर्भपात पर लागू प्रतिबंध को असंवैधानिक करार दिया था और कानून में बदलाव की आवश्यकता बताई थी। गौरतलब है कि उस फैसले के सात वर्ष बाद भी आवश्यक विधायी संशोधन नहीं हो सके, जिसके चलते गर्भपात की दवाओं की उपलब्धता एवं उपयोग को लेकर नियामकीय खालीपन बना रहा।
यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर प्रजनन अधिकारों को लेकर बहस तेज़ हो रही है और कई देश अपनी नीतियों में बदलाव कर रहे हैं।
आगे की राह और माँगें
HRW ने दक्षिण कोरिया की नेशनल असेंबली से गर्भपात से जुड़े कानूनों को अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के अनुरूप बनाने की अपील की है। इसके साथ ही संगठन ने माँग की है कि गर्भपात संबंधी सेवाओं को राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत कवर किया जाए और मरीजों तथा चिकित्सा सेवाएँ प्रदान करने वाले पेशेवरों के अधिकारों की रक्षा के लिए स्पष्ट कानूनी प्रावधान बनाए जाएँ। अब सभी की निगाहें दक्षिण कोरियाई सरकार की प्रतिक्रिया और नेशनल असेंबली में होने वाली विधायी बहस पर टिकी हैं।