27 अक्टूबर 2026
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शिवसेना-यूबीटी का सरकार पर हमला: 'पीस बॉन्ड' से चाहिए श्मशान जैसी शांति — सामना संपादकीय

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शिवसेना-यूबीटी का सरकार पर हमला: 'पीस बॉन्ड' से चाहिए श्मशान जैसी शांति — सामना संपादकीय

सारांश

शिवसेना-यूबीटी ने 'सामना' संपादकीय में तीखा सवाल उठाया — क्या 'पीस बॉन्ड' लोकतांत्रिक आंदोलन को खत्म करने का हथियार है? पार्टी ने पूर्व जज काटजू की युवाओं को दी 'मुफ्त सलाह' को भी खारिज किया और कहा कि पीस बॉन्ड पर हस्ताक्षर माफी नहीं, संघर्ष जारी रहे।

मुख्य बातें

शिवसेना-यूबीटी ने 27 अक्टूबर 2026 को पार्टी मुखपत्र 'सामना' के संपादकीय में 'पीस बॉन्ड' को लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला बताया।
पार्टी ने कहा — सरकार को आंदोलनों की आवाज़ नहीं, देश में श्मशान जैसी शांति चाहिए।
दिल्ली में जंतर-मंतर सहित कई स्थानों पर विरोध प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगाया गया है।
पार्टी ने युवा नेताओं अभिजीत दिपके, सौरव दास, आशुतोष रांका, अजिंक्य शिंदे और नेहा बोरा की सराहना की।
पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू की 'मुफ्त सलाह' को खारिज करते हुए उन्हें युवाओं की कानूनी मदद करने की अपील की।
सीजेपी और आइसा के नेताओं से प्रशासनिक कार्यवाहियों से न डरने की अपील।

शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने 27 अक्टूबर 2026 को दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों के दौरान प्रदर्शनकारियों से 'पीस बॉन्ड' पर हस्ताक्षर कराने की प्रक्रिया को लोकतांत्रिक स्वतंत्रता पर सीधा हमला करार दिया। पार्टी के मुखपत्र 'सामना' में प्रकाशित संपादकीय में कहा गया कि सरकार को आंदोलनों की आवाज़ नहीं, बल्कि देश में श्मशान जैसी शांति चाहिए।

मुख्य घटनाक्रम

शिवसेना-यूबीटी ने अपने संपादकीय में कहा कि भारत में लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन करना एक गंभीर अपराध की तरह माना जाने लगा है। पार्टी ने कहा कि दिल्ली में कई स्थानों पर विरोध प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है, जिसमें ऐतिहासिक जंतर-मंतर भी शामिल है।

संपादकीय में पार्टी ने अभिजीत दिपके, सौरव दास, आशुतोष रांका, अजिंक्य शिंदे और नेहा बोरा की सराहना की — ये वे युवा नेता हैं जिन्हें कथित तौर पर पीस बॉन्ड पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य किया गया।

काटजू पर निशाना

पार्टी ने सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू की आलोचना करते हुए कहा कि उन्होंने इन युवा नेताओं के पीस बॉन्ड पर हस्ताक्षर करने को 'बड़ी गलती' बताया। संपादकीय में लिखा गया: 'काटजू जैसे लोग खुद कोई भी भूमिका निभाने को तैयार नहीं हैं और दूसरों को मुफ्त की सलाह दे रहे हैं।'

पार्टी ने यह भी कहा कि अगर काटजू वास्तव में नागरिक स्वतंत्रता की परवाह करते हैं तो उन्हें अपना वकीलों वाला कोट दोबारा पहनकर इन युवाओं की कानूनी मदद करनी चाहिए।

पीस बॉन्ड पर पार्टी का रुख

शिवसेना-यूबीटी ने स्पष्ट किया कि पीस बॉन्ड पर हस्ताक्षर करने का मतलब सरकार से माफी माँगना या समर्पण नहीं है। पार्टी ने कहा कि इसमें किसी भी अपराध की स्वीकृति नहीं होती। संपादकीय में युवाओं को याद दिलाया गया कि उनके आदर्श भगत सिंह और अशफाकउल्ला खान जैसे स्वतंत्रता सेनानी रहे हैं जिन्होंने कारावास का भी सामना किया था।

यह ऐसे समय में आया है जब दिल्ली में जंतर-मंतर सहित कई सार्वजनिक स्थानों पर विरोध प्रदर्शनों पर पाबंदियाँ और प्रशासनिक कार्रवाइयाँ बढ़ी हैं। विपक्षी दलों और नागरिक अधिकार संगठनों ने इसे लोकतांत्रिक असहमति दबाने की कोशिश बताया है।

सीजेपी और आइसा से अपील

अंत में शिवसेना-यूबीटी ने सीजेपी (Citizens for Justice and Peace) और आइसा (All India Students Association) के नेताओं से अपील की कि वे कानून लागू करने वाली एजेंसियों की प्रक्रियात्मक कार्यवाहियों से डरें नहीं और संघर्ष जारी रखें।

गौरतलब है कि पीस बॉन्ड को लेकर यह विवाद ऐसे समय में उठा है जब देशभर में विपक्ष और नागरिक समाज के बीच यह बहस तेज़ हो रही है कि प्रशासनिक उपकरणों का उपयोग असहमति को दबाने के लिए किया जा रहा है या नहीं। आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद और न्यायपालिका दोनों में उठने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

वे खुद सड़क पर उतरने से बचते हैं। मुख्यधारा की कवरेज जो अक्सर चूक जाती है, वह यह है कि जंतर-मंतर पर पाबंदी जैसी प्रशासनिक कार्रवाइयाँ धीरे-धीरे सार्वजनिक विमर्श की जगह को संकुचित कर रही हैं। सवाल यह है कि क्या न्यायपालिका इस मुद्दे पर कोई स्पष्ट रेखा खींचेगी।
RashtraPress
27 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'पीस बॉन्ड' क्या होता है और इसे लेकर विवाद क्यों है?
'पीस बॉन्ड' एक प्रशासनिक प्रक्रिया है जिसमें किसी व्यक्ति से यह लिखित आश्वासन लिया जाता है कि वह सार्वजनिक शांति नहीं भंग करेगा। दिल्ली में विरोध प्रदर्शनकारियों से इस पर हस्ताक्षर कराने पर विपक्ष और नागरिक अधिकार संगठनों ने आपत्ति जताई है, यह कहते हुए कि इसका उपयोग लोकतांत्रिक आंदोलन को दबाने के लिए किया जा रहा है।
शिवसेना-यूबीटी ने 'सामना' संपादकीय में क्या कहा?
पार्टी ने कहा कि सरकार को आंदोलनों की आवाज़ नहीं, श्मशान जैसी शांति चाहिए। पार्टी ने यह भी स्पष्ट किया कि पीस बॉन्ड पर हस्ताक्षर करना माफी माँगना या अपराध स्वीकार करना नहीं है।
मार्कंडेय काटजू पर शिवसेना-यूबीटी ने क्यों निशाना साधा?
सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने कथित तौर पर कहा था कि पीस बॉन्ड पर हस्ताक्षर करना युवा नेताओं की 'बड़ी गलती' थी। शिवसेना-यूबीटी ने इसे 'मुफ्त की सलाह' बताते हुए कहा कि काटजू को खुद आगे आकर इन युवाओं की कानूनी मदद करनी चाहिए।
जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन पर प्रतिबंध का मुद्दा क्या है?
दिल्ली में जंतर-मंतर सहित कई सार्वजनिक स्थानों पर विरोध प्रदर्शनों पर प्रशासनिक पाबंदियाँ लगाई गई हैं। विपक्ष का कहना है कि इससे नागरिकों का संवैधानिक अधिकार — शांतिपूर्ण विरोध का — प्रभावित हो रहा है।
सीजेपी और आइसा से शिवसेना-यूबीटी की क्या अपील है?
पार्टी ने सीजेपी (Citizens for Justice and Peace) और आइसा (All India Students Association) के नेताओं से अपील की है कि वे कानून लागू करने वाली एजेंसियों की प्रक्रियात्मक कार्यवाहियों से न डरें और लोकतांत्रिक स्वतंत्रता की लड़ाई जारी रखें।
राष्ट्र प्रेस
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