10 अक्टूबर 2026
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सामना में शिवसेना (यूबीटी) का केंद्र पर हमला: 'लोकतंत्र को खत्म करने की साजिश', CEC विवाद पर निशाना

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सामना में शिवसेना (यूबीटी) का केंद्र पर हमला: 'लोकतंत्र को खत्म करने की साजिश', CEC विवाद पर निशाना

सारांश

शिवसेना (यूबीटी) का सामना संपादकीय सिर्फ राजनीतिक आलोचना नहीं — यह एक सीधा ललकार है। CEC विवाद, जंतर-मंतर पर कथित पुलिसिया दमन और बजरंग दल तैनाती के आरोपों के साथ, ठाकरे खेमे ने केंद्र पर 'राष्ट्रद्रोह' का आरोप मढ़ते हुए विपक्षी एकजुटता की नई आग भड़काई है।

मुख्य बातें

शिवसेना (यूबीटी) ने 10 अक्टूबर 2026 को सामना संपादकीय में केंद्र सरकार पर लोकतंत्र को नष्ट करने की साजिश का आरोप लगाया।
CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की माँग को लेकर जारी विपक्षी आंदोलन में राहुल गांधी व प्रियंका गांधी को कथित तौर पर जंतर-मंतर पर घसीटा और गिरफ्तार किया गया।
संपादकीय में आरोप लगाया गया कि सरकार ने बजरंग दल के लगभग दो लाख कथित सशस्त्र सदस्यों को जंतर-मंतर पर तैनात करने की योजना बनाई थी।
दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन की अनुमति देने से इनकार किया; दिल्ली आने वाली ट्रेनें रद्द की गईं और युवा प्रदर्शनकारियों को रोककर गिरफ्तार किया गया।
BJP नेता मुरली मनोहर जोशी के अब्राहम लिंकन संबंधी बयानों का हवाला देते हुए संपादकीय ने कहा कि वर्तमान व्यवस्था में लोकतांत्रिक सिद्धांत जीवित नहीं हैं।

शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने शनिवार, 10 अक्टूबर 2026 को पार्टी के मुखपत्र सामना के संपादकीय के ज़रिए केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला और आरोप लगाया कि भारतीय लोकतंत्र को व्यवस्थित तरीके से समाप्त करने की साजिश रची जा रही है। यह संपादकीय मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की माँग को लेकर जारी व्यापक विपक्षी आंदोलन की पृष्ठभूमि में आया है।

CEC विवाद और विपक्षी आंदोलन

ठाकरे खेमे के संपादकीय में कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा CEC ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध चलाए गए अभियान का ज़िक्र करते हुए कहा गया कि चुनावी धांधली के आरोपों पर आधारित इस आंदोलन ने सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) के भीतर हलचल मचा दी है। संपादकीय के अनुसार, व्यवस्थित चुनावी अनियमितताओं के आरोपों का समाधान करने के बजाय सत्ताधारी प्रतिष्ठान चुनाव प्रमुख को हर कीमत पर बचाने में जुटा है — जिसे संपादकीय में 'राष्ट्र के साथ विश्वासघात' बताया गया है।

जंतर-मंतर प्रदर्शन और प्रशासन के दोहरे मापदंड का आरोप

संपादकीय में जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शनों के दौरान कथित पुलिसिया कार्रवाई की कड़ी निंदा की गई। इसमें आरोप लगाया गया कि राहुल गांधी और प्रियंका गांधी जैसे विपक्षी नेताओं को शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के दौरान घसीटा गया, उनके साथ मारपीट की गई और पुलिस वाहनों में जबरदस्ती डाला गया। इसके विपरीत, संपादकीय के अनुसार, BJP महिला मोर्चा की कार्यकर्ताओं को गृह मंत्रालय द्वारा कांग्रेस मुख्यालय के बाहर उग्र प्रदर्शन के दौरान पूर्ण सुरक्षा प्रदान की गई।

बजरंग दल तैनाती का आरोप

ठाकरे खेमे ने संपादकीय में यह भी दावा किया कि सरकार ने विपक्ष के युवा नेतृत्व वाले आंदोलन को कुचलने के लिए जंतर-मंतर पर बजरंग दल के कथित तौर पर लगभग दो लाख सशस्त्र सदस्यों को तैनात करने की योजना बनाई थी। संपादकीय ने तर्क दिया कि वैध सार्वजनिक असहमति को दबाने के लिए राजनीतिक संगठनों और 'निजी सेनाओं' पर निर्भरता अराजकता और नागरिक अशांति को आमंत्रण देती है।

प्रशासनिक अवरोधों का विवरण

संपादकीय के अनुसार, दिल्ली पुलिस ने विरोध प्रदर्शनों के लिए औपचारिक अनुमति देने से इनकार कर दिया। इसके अलावा, दिल्ली की ओर आने वाली लंबी दूरी की ट्रेनें रास्ते में रद्द की गईं और प्रदर्शन में भाग लेने के लिए यात्रा कर रहे युवा प्रदर्शनकारियों को रोका गया तथा गिरफ्तार किया गया। इन कदमों को संपादकीय ने लोकतांत्रिक अधिकारों पर प्रत्यक्ष हमला बताया।

मुरली मनोहर जोशी के हवाले से आलोचना

संपादकीय में वरिष्ठ BJP नेता मुरली मनोहर जोशी के उन बयानों का हवाला दिया गया जिनमें उन्होंने अब्राहम लिंकन के लोकतांत्रिक सिद्धांतों — स्वतंत्र चुनाव, पारदर्शी नौकरशाही और जिम्मेदार शासन — का ज़िक्र किया था। ठाकरे खेमे ने अफसोस जताया कि वर्तमान व्यवस्था में ये सिद्धांत जीवित नहीं हैं, क्योंकि संवैधानिक निकाय संस्थागत नियंत्रण का सामना कर रहे हैं।

आगे क्या

उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने चेतावनी दी है कि मौजूदा राजनीतिक माहौल तानाशाही की सीमाएँ भी पार कर चुका है। जैसे-जैसे विपक्षी दल एकजुट हो रहे हैं और राज्य तंत्र व प्रदर्शनकारियों के बीच तनाव बढ़ रहा है, पार्टी ने आगाह किया है कि लोकतांत्रिक ढाँचों के क्षरण के विरुद्ध जनाक्रोश एक निर्णायक मोड़ पर पहुँच गया है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो मुख्यधारा की कवरेज में प्रायः अनदेखा रह जाता है। असली सवाल यह है कि क्या यह आंदोलन चुनावी जवाबदेही की माँग को ठोस संस्थागत सुधार में बदल पाएगा, या केवल विपक्षी ऊर्जा का एकमुश्त विस्फोट बनकर रह जाएगा।
RashtraPress
10 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शिवसेना (यूबीटी) ने सामना में केंद्र पर क्या आरोप लगाए हैं?
शिवसेना (यूबीटी) ने 10 अक्टूबर 2026 को सामना संपादकीय में केंद्र सरकार पर भारतीय लोकतंत्र को व्यवस्थित तरीके से नष्ट करने की साजिश का आरोप लगाया। संपादकीय में CEC ज्ञानेश कुमार की रक्षा को 'राष्ट्रद्रोह' करार दिया और जंतर-मंतर पर विपक्षी नेताओं के कथित दमन की निंदा की।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार विवाद क्या है?
विपक्षी दल, विशेष रूप से कांग्रेस, CEC ज्ञानेश कुमार पर चुनावी अनियमितताओं के आरोप लगाते हुए उनके इस्तीफे की माँग कर रहे हैं। राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर आक्रामक अभियान चलाया है, जिसकी चर्चा सामना के संपादकीय में भी की गई है।
जंतर-मंतर प्रदर्शन में क्या हुआ और शिवसेना (यूबीटी) ने क्या कहा?
सामना संपादकीय के अनुसार, जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को कथित तौर पर घसीटा गया और पुलिस वाहनों में डाला गया। साथ ही दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन की अनुमति देने से इनकार किया और दिल्ली आने वाली ट्रेनें रद्द की गईं।
क्या सरकार ने शिवसेना (यूबीटी) के आरोपों का जवाब दिया है?
अभी तक सरकार या BJP की ओर से सामना संपादकीय में लगाए गए विशिष्ट आरोपों का कोई आधिकारिक खंडन सामने नहीं आया है। बजरंग दल तैनाती और दोहरे मापदंड के दावों की स्वतंत्र पुष्टि भी अभी बाकी है।
शिवसेना (यूबीटी) की यह आलोचना व्यापक राजनीतिक संदर्भ में कहाँ फिट बैठती है?
यह संपादकीय उस व्यापक विपक्षी एकजुटता का हिस्सा है जो CEC विवाद को केंद्र में रखकर सरकार पर संस्थागत पक्षपात के आरोप लगा रही है। उद्धव ठाकरे की पार्टी ने चेतावनी दी है कि लोकतांत्रिक ढाँचों के क्षरण के विरुद्ध जनाक्रोश एक निर्णायक मोड़ पर पहुँच गया है।
राष्ट्र प्रेस
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