शिवसेना (यूबीटी) का ECI पर बड़ा हमला: CEC ज्ञानेश कुमार पर '14 बार आपत्ति' और 13 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाने का आरोप
सारांश
मुख्य बातें
शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने 24 सितंबर 2026 को भारत निर्वाचन आयोग (ECI) और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर तीखा प्रहार करते हुए आरोप लगाया कि चुनाव आयोग 'घर के नौकर' की तरह काम कर रहा है और संवैधानिक संस्थाओं में जनता का विश्वास खत्म हो रहा है। पार्टी के मुखपत्र 'सामना' के एक विस्तृत संपादकीय में ये आरोप लगाए गए, जो मीडिया में आई जाँच रिपोर्टों पर आधारित बताए गए।
मुख्य आरोप: 14 बार दर्ज हुई आपत्तियाँ
संपादकीय में दावा किया गया कि साथी चुनाव आयुक्त सुखबीर संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के कामकाज के तरीके पर कम से कम 14 बार औपचारिक रूप से आपत्ति दर्ज कराई। कथित तौर पर इन आपत्तियों को बार-बार नजरअंदाज किया गया।
संपादकीय के अनुसार, जब कोई विकल्प नहीं बचा, तो दोनों असहमत आयुक्तों ने यह मामला सीधे कैबिनेट सचिवालय तक पहुँचाया, जिससे प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) को चुनाव आयोग के भीतर चल रहे कथित आंतरिक संकट की जानकारी मिली। ये आरोप अत्यंत गंभीर हैं, हालाँकि ECI या सरकार की ओर से इन पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
मतदाता सूची पर 'व्यवस्थागत घोटाले' का दावा
संपादकीय में 'विशेष सारांश संशोधन' (SSR) प्रक्रिया को एक 'सिस्टमैटिक स्कैम' यानी व्यवस्थागत घोटाला करार दिया गया। पार्टी ने आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया की आड़ में पूरे भारत में कथित तौर पर लगभग 13 करोड़ मतदाताओं को मताधिकार से वंचित किया गया, जिनमें प्रमुख नागरिक और जानी-मानी हस्तियाँ भी शामिल हैं।
विशेष रूप से महाराष्ट्र का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया गया कि राज्य की मतदाता सूची से कथित तौर पर दो करोड़ से अधिक नाम हटाए गए। इससे भी आगे, संपादकीय में दावा किया गया कि हाल के महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के दौरान मतों की संख्या में अचानक 42 लाख की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जिसने कथित तौर पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाले गठबंधन की जीत का मार्ग प्रशस्त किया।
अमित शाह और CEC पर सीधा निशाना
उद्धव ठाकरे की पार्टी ने गृह मंत्री अमित शाह को संवैधानिक गिरावट का मुख्य 'मास्टरमाइंड' बताया। संपादकीय में पूर्व CEC राजीव कुमार और वर्तमान CEC ज्ञानेश कुमार को 'संवैधानिक माफिया' और 'लोकतंत्र का हत्यारा' जैसे कड़े शब्दों से नवाजा गया। साथ ही यह आरोप भी लगाया गया कि ECI नेतृत्व ने पार्टियों में फूट को बढ़ावा देकर और असली नाम व चुनाव चिह्न अलग हुए गुटों को सौंपकर लोकतंत्र को कमज़ोर किया।
गौरतलब है कि यह आरोप ऐसे समय में आया है जब शिवसेना खुद नाम और चुनाव चिह्न को लेकर एकनाथ शिंदे गुट के साथ कानूनी लड़ाई में उलझी है और ECI के उस फैसले को चुनौती दे रही है, जिसमें 'शिवसेना' नाम व चुनाव चिह्न शिंदे गुट को दिया गया था।
विपक्ष की एकजुटता और PM से माँग
संपादकीय में राहुल गांधी, ममता बनर्जी, उद्धव ठाकरे और तेजस्वी यादव जैसे विपक्षी नेताओं की चुनावी गड़बड़ियों के खिलाफ लगातार आवाज़ उठाने के लिए सराहना की गई। साथ ही कमिश्नर संधू और जोशी की भी अंदरूनी विसंगतियाँ सामने लाने के लिए प्रशंसा की गई।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से तत्काल हस्तक्षेप की माँग करते हुए संपादकीय में कहा गया कि 'जब तक अमित शाह और ज्ञानेश कुमार जैसे लोग सत्ता में हैं, भारत के संविधान का कोई मतलब नहीं है। प्रधानमंत्री को उन्हें तुरंत हटा देना चाहिए — तभी देश को बचाया जा सकता है। चूँकि शाह और कुमार खुद इस्तीफ़ा नहीं देंगे, इसलिए उन्हें हटाना ही पीएम मोदी के पास एकमात्र विकल्प है।'
क्या होगा आगे
यह विवाद ऐसे समय में उठा है जब पश्चिम बंगाल और बिहार में आगामी विधानसभा चुनावों की तैयारियाँ चल रही हैं। संपादकीय में इन राज्यों में भी पिछले चुनावों के दौरान लाखों मतदाताओं के नाम जानबूझकर हटाए जाने का आरोप लगाया गया है। ECI, केंद्र सरकार और CEC कार्यालय की इन आरोपों पर प्रतिक्रिया का इंतज़ार है, जो इस विवाद की दिशा तय करेगी।