12 अगस्त 2026
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शिवसेना नाम-निशान विवाद: सुप्रीम कोर्ट में कपिल सिब्बल ने ECI के अधिकार क्षेत्र को चुनौती दी

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शिवसेना नाम-निशान विवाद: सुप्रीम कोर्ट में कपिल सिब्बल ने ECI के अधिकार क्षेत्र को चुनौती दी

सारांश

शिवसेना के नाम और 'तीर-कमान' निशान पर अधिकार की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट में निर्णायक मोड़ पर है। कपिल सिब्बल ने ECI पर 2018 के पार्टी संविधान को 13 साल तक नजरअंदाज करने और पूर्व-निर्धारित नतीजे पर पहुँचने का आरोप लगाया — यह सवाल अब चुनाव आयोग की सीमाओं और दल-बदल कानून की व्याख्या तक जा पहुँचा है।

मुख्य बातें

12 अगस्त 2026 को सर्वोच्च न्यायालय में शिवसेना के नाम और 'तीर-कमान' निशान विवाद पर सुनवाई हुई।
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने ECI पर 2018 के पार्टी संविधान को 13 वर्षों तक नजरअंदाज करने का आरोप लगाया।
19 जुलाई को आयोग के पास केवल दो दस्तावेजों के आधार पर निर्णय लिया गया — सिब्बल ने इसे अपर्याप्त बताया।
2018 की सामान्य सभा में 12 उप-नेता मनोनीत और 21 निर्वाचित किए गए थे; दस्तावेज पर ECI की मुहर मौजूद है।
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि ECI के अधिकार क्षेत्र और उसके दुरुपयोग के प्रश्न को अलग-अलग देखना होगा।
सुनवाई गुरुवार को भी जारी रहेगी।

सर्वोच्च न्यायालय में 12 अगस्त 2026 को उद्धव ठाकरे गुट और एकनाथ शिंदे गुट के बीच शिवसेना के नाम और चुनाव निशान 'तीर-कमान' पर अधिकार को लेकर चल रहे विवाद में अहम सुनवाई हुई। ठाकरे पक्ष की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) के अधिकार क्षेत्र पर गंभीर सवाल उठाए। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह सुनवाई गुरुवार को भी जारी रहेगी।

सिब्बल की मुख्य दलीलें

सिब्बल ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29ए की उप-धारा 9 का हवाला देते हुए कहा कि पार्टी के नाम, पते या पदाधिकारियों में बदलाव होने पर निर्वाचन आयोग को सूचित करना अनिवार्य है, और ठाकरे गुट ने यह कर्तव्य निभाया था। उन्होंने कहा कि संचार में 'शिवसेना पक्ष प्रमुख' का स्पष्ट उल्लेख था, फिर भी आयोग ने 2018 के पार्टी संविधान को नजरअंदाज किया।

सिब्बल ने यह भी तर्क दिया कि 2018 की सामान्य सभा में 12 उप-नेता मनोनीत और 21 उप-नेता निर्वाचित किए गए थे, और 4 अप्रैल की तारीख वाले उस दस्तावेज पर निर्वाचन आयोग की मुहर भी लगी हुई है। उन्होंने कहा, 'अगर यह बाद में तैयार किया गया था, तो उन्हें कार्रवाई करनी चाहिए थी।'

न्यायाधीशों की टिप्पणियाँ

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि जब तक कोई बदलाव न हो, तब तक सूचित करने की आवश्यकता नहीं बनती। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह कहना उचित नहीं होगा कि निर्वाचन आयोग के पास अधिकार क्षेत्र था ही नहीं — अधिकार क्षेत्र और उसके दुरुपयोग के प्रश्न को अलग-अलग देखना होगा।

जस्टिस बागची ने पूछा कि फरवरी में नेताओं की संख्या बदल गई थी, तो क्या निर्वाचित सदस्यों के नामों की जानकारी दी गई थी? उन्होंने यह भी कहा कि 10वीं अनुसूची के तहत पार्टी विभाजन का फैसला होना है, और संविधान पीठ ने यह नहीं कहा था कि विधायक दल का विभाजन संगठन पर लागू नहीं हो सकता।

ECI की भूमिका पर विवाद

सिब्बल ने आरोप लगाया कि निर्वाचन आयोग 13 वर्षों तक यह नहीं जान पाया कि पार्टी का दूसरा संविधान भी अस्तित्व में है। उन्होंने कहा कि आयोग ने पहले ही नतीजा तय कर लिया था और इसीलिए 2018 के संविधान को दरकिनार किया गया। उन्होंने यह भी कहा कि ईसीआई के अनुसार सभी उप-नेता मनोनीत हैं, जबकि वे वास्तव में निर्वाचित थे।

सिब्बल ने तर्क दिया कि 19 जुलाई को आयोग के पास केवल दो दस्तावेज थे — एक विधायी शक्ति से संबंधित और दूसरा एक बैठक से — और इन्हीं के आधार पर निर्णय लिया गया, जो अपर्याप्त था।

पक्ष प्रमुख पद और लोकतांत्रिक प्रक्रिया

सिब्बल ने अनुसूची 'ए' का हवाला देते हुए कहा कि पक्ष प्रमुख का चुनाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया से होता है और पार्टी की सर्वोच्च इकाई राष्ट्रीय कार्यकारिणी है। उन्होंने कहा कि जिला प्रमुख और उप-जिला प्रमुख मनोनीत होते हैं, जबकि निर्णय लेने का अधिकार निर्वाचित व्यक्तियों का है।

उन्होंने यह भी कहा कि एकनाथ शिंदे को पहले मुख्यमंत्री बना दिया गया और उसके बाद यह नहीं कहा जा सकता कि बाद में इतने लोग उनके साथ जुड़ गए — इस जमीनी हकीकत को कानूनी वैधता का आधार नहीं बनाया जा सकता।

आगे की सुनवाई

सर्वोच्च न्यायालय ने मामले की सुनवाई गुरुवार को जारी रखने का निर्णय लिया है। यह मामला भारतीय राजनीति में पार्टी विभाजन, चुनाव आयोग की शक्तियों और दल-बदल विरोधी कानून की सीमाओं को लेकर एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न बन चुका है।

संपादकीय दृष्टिकोण

संस्थागत जवाबदेही का गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। मुख्य न्यायाधीश की यह टिप्पणी कि 'अधिकार क्षेत्र था या नहीं' और 'उसका दुरुपयोग हुआ या नहीं' — दो अलग प्रश्न हैं — इस पूरे विवाद की दिशा तय कर सकती है। यदि न्यायालय ECI के अधिकार क्षेत्र को सीमित करता है, तो यह भविष्य के पार्टी विभाजन के मामलों में एक नई मिसाल बनेगी।
RashtraPress
12 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शिवसेना नाम-निशान विवाद क्या है?
यह विवाद उद्धव ठाकरे गुट और एकनाथ शिंदे गुट के बीच शिवसेना के नाम और चुनाव निशान 'तीर-कमान' पर अधिकार को लेकर है। निर्वाचन आयोग ने शिंदे गुट को असली शिवसेना मान लिया था, जिसे ठाकरे गुट ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी है।
कपिल सिब्बल ने ECI के अधिकार क्षेत्र पर क्या सवाल उठाए?
सिब्बल ने तर्क दिया कि ECI ने 2018 के पार्टी संविधान को 13 वर्षों तक नजरअंदाज किया और 19 जुलाई को केवल दो दस्तावेजों के आधार पर फैसला सुनाया। उन्होंने कहा कि आयोग ने पहले ही नतीजा तय कर लिया था और इसीलिए उपलब्ध दस्तावेजों की अनदेखी की गई।
सुप्रीम कोर्ट ने ECI के अधिकार क्षेत्र पर क्या कहा?
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि यह कहना उचित नहीं होगा कि ECI के पास अधिकार क्षेत्र था ही नहीं। उन्होंने कहा कि अधिकार क्षेत्र के अस्तित्व और उसके संभावित दुरुपयोग को अलग-अलग देखना होगा।
2018 का पार्टी संविधान इस मामले में क्यों अहम है?
सिब्बल के अनुसार, 2018 के संविधान में स्पष्ट है कि पक्ष प्रमुख का चुनाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया से होता है और उस दस्तावेज पर ECI की मुहर भी लगी है। शिंदे गुट का दावा है कि यह दस्तावेज बाद में तैयार किया गया, लेकिन ठाकरे गुट इसे नकारता है।
इस मामले में आगे क्या होगा?
सर्वोच्च न्यायालय ने सुनवाई गुरुवार को भी जारी रखने का निर्णय लिया है। यह मामला पार्टी विभाजन, ECI की शक्तियों और 10वीं अनुसूची की व्याख्या पर एक महत्वपूर्ण संवैधानिक फैसले की दिशा में बढ़ रहा है।
राष्ट्र प्रेस
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