शिवसेना नाम-निशान विवाद: सुप्रीम कोर्ट में कपिल सिब्बल ने ECI के अधिकार क्षेत्र को चुनौती दी
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय में 12 अगस्त 2026 को उद्धव ठाकरे गुट और एकनाथ शिंदे गुट के बीच शिवसेना के नाम और चुनाव निशान 'तीर-कमान' पर अधिकार को लेकर चल रहे विवाद में अहम सुनवाई हुई। ठाकरे पक्ष की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) के अधिकार क्षेत्र पर गंभीर सवाल उठाए। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह सुनवाई गुरुवार को भी जारी रहेगी।
सिब्बल की मुख्य दलीलें
सिब्बल ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29ए की उप-धारा 9 का हवाला देते हुए कहा कि पार्टी के नाम, पते या पदाधिकारियों में बदलाव होने पर निर्वाचन आयोग को सूचित करना अनिवार्य है, और ठाकरे गुट ने यह कर्तव्य निभाया था। उन्होंने कहा कि संचार में 'शिवसेना पक्ष प्रमुख' का स्पष्ट उल्लेख था, फिर भी आयोग ने 2018 के पार्टी संविधान को नजरअंदाज किया।
सिब्बल ने यह भी तर्क दिया कि 2018 की सामान्य सभा में 12 उप-नेता मनोनीत और 21 उप-नेता निर्वाचित किए गए थे, और 4 अप्रैल की तारीख वाले उस दस्तावेज पर निर्वाचन आयोग की मुहर भी लगी हुई है। उन्होंने कहा, 'अगर यह बाद में तैयार किया गया था, तो उन्हें कार्रवाई करनी चाहिए थी।'
न्यायाधीशों की टिप्पणियाँ
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि जब तक कोई बदलाव न हो, तब तक सूचित करने की आवश्यकता नहीं बनती। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह कहना उचित नहीं होगा कि निर्वाचन आयोग के पास अधिकार क्षेत्र था ही नहीं — अधिकार क्षेत्र और उसके दुरुपयोग के प्रश्न को अलग-अलग देखना होगा।
जस्टिस बागची ने पूछा कि फरवरी में नेताओं की संख्या बदल गई थी, तो क्या निर्वाचित सदस्यों के नामों की जानकारी दी गई थी? उन्होंने यह भी कहा कि 10वीं अनुसूची के तहत पार्टी विभाजन का फैसला होना है, और संविधान पीठ ने यह नहीं कहा था कि विधायक दल का विभाजन संगठन पर लागू नहीं हो सकता।
ECI की भूमिका पर विवाद
सिब्बल ने आरोप लगाया कि निर्वाचन आयोग 13 वर्षों तक यह नहीं जान पाया कि पार्टी का दूसरा संविधान भी अस्तित्व में है। उन्होंने कहा कि आयोग ने पहले ही नतीजा तय कर लिया था और इसीलिए 2018 के संविधान को दरकिनार किया गया। उन्होंने यह भी कहा कि ईसीआई के अनुसार सभी उप-नेता मनोनीत हैं, जबकि वे वास्तव में निर्वाचित थे।
सिब्बल ने तर्क दिया कि 19 जुलाई को आयोग के पास केवल दो दस्तावेज थे — एक विधायी शक्ति से संबंधित और दूसरा एक बैठक से — और इन्हीं के आधार पर निर्णय लिया गया, जो अपर्याप्त था।
पक्ष प्रमुख पद और लोकतांत्रिक प्रक्रिया
सिब्बल ने अनुसूची 'ए' का हवाला देते हुए कहा कि पक्ष प्रमुख का चुनाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया से होता है और पार्टी की सर्वोच्च इकाई राष्ट्रीय कार्यकारिणी है। उन्होंने कहा कि जिला प्रमुख और उप-जिला प्रमुख मनोनीत होते हैं, जबकि निर्णय लेने का अधिकार निर्वाचित व्यक्तियों का है।
उन्होंने यह भी कहा कि एकनाथ शिंदे को पहले मुख्यमंत्री बना दिया गया और उसके बाद यह नहीं कहा जा सकता कि बाद में इतने लोग उनके साथ जुड़ गए — इस जमीनी हकीकत को कानूनी वैधता का आधार नहीं बनाया जा सकता।
आगे की सुनवाई
सर्वोच्च न्यायालय ने मामले की सुनवाई गुरुवार को जारी रखने का निर्णय लिया है। यह मामला भारतीय राजनीति में पार्टी विभाजन, चुनाव आयोग की शक्तियों और दल-बदल विरोधी कानून की सीमाओं को लेकर एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न बन चुका है।