17 सितंबर 2026
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शिवसेना 'धनुष-बाण' विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के 'विधायी बहुमत' मापदंड पर उठाए तीखे सवाल

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शिवसेना 'धनुष-बाण' विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के 'विधायी बहुमत' मापदंड पर उठाए तीखे सवाल

सारांश

शिवसेना के 'धनुष-बाण' चिन्ह पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई महज़ एक पार्टी-विवाद नहीं — यह उस बड़े सवाल की परीक्षा है कि क्या चुनाव आयोग दल-बदल कार्यवाही के बीच 'विधायी बहुमत' को एकमात्र कसौटी बना सकता है। जस्टिस बागची के तीखे सवाल संकेत देते हैं कि फैसला राजनीतिक दलों की पहचान पर नई संवैधानिक नज़ीर गढ़ सकता है।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 17 सितंबर 2026 को शिवसेना 'धनुष-बाण' चिन्ह विवाद पर सुनवाई की और चुनाव आयोग के फैसले की गहन समीक्षा का संकेत दिया।
जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सवाल किया कि आयोग ने अयोग्यता कार्यवाही लंबित रहते हुए 'विधायी बहुमत' को प्रमुख आधार क्यों माना।
शिंदे गुट के वकील नीरज किशन कौल ने बताया कि शिवसेना के 18 में से 13 सांसद और विधायकों का बहुमत शिंदे के साथ था।
अदालत ने कहा कि पार्टी को मिले वोट 'अविभाजित शिवसेना' को थे — विभाजन के बाद मतदाता की निष्ठा का आकलन आसान नहीं।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने पूछा कि सुभाष देसाई फैसले की टिप्पणियाँ चुनाव आयोग की कार्यवाही पर कितनी बाध्यकारी हैं।
अदालत ने स्पष्ट किया कि 10वीं अनुसूची के तहत पार्टी की पहचान का संरक्षण एक महत्त्वपूर्ण संवैधानिक उद्देश्य है; सुनवाई जारी रहेगी।

सर्वोच्च न्यायालय ने 17 सितंबर 2026 को शिवसेना के नाम और 'धनुष-बाण' चुनाव चिन्ह विवाद में उद्धव ठाकरे गुट की याचिका पर सुनवाई करते हुए चुनाव आयोग (ECI) द्वारा अपनाए गए 'विधायी बहुमत' के मापदंड पर गहरे सवाल खड़े किए। जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने स्पष्ट संकेत दिया कि अदालत यह जाँचेगी कि आयोग ने अपने विवेक का संविधानसम्मत उपयोग किया या नहीं। सुनवाई आगे भी जारी रहेगी।

शिंदे गुट का पक्ष: बहुमत ही है आधार

एकनाथ शिंदे गुट की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने चुनाव आयोग के फैसले का बचाव करते हुए कहा कि शिवसेना के 18 सांसदों में से 13 और विधायकों का बहुमत शिंदे गुट के साथ था। उन्होंने बताया कि संगठनात्मक इकाइयों और कार्यकर्ताओं के समर्थन से संबंधित शपथपत्र आयोग के समक्ष प्रस्तुत किए गए थे, जिनके आधार पर 'धनुष-बाण' चिन्ह और पार्टी का नाम शिंदे गुट को सौंपा गया।

कौल ने यह भी तर्क दिया कि चुनाव आयोग ने केवल सीटों की संख्या नहीं, बल्कि पार्टी को मिले कुल वोटों को भी निर्णय का आधार बनाया था। उनके अनुसार, अयोग्यता याचिकाएँ पहले ही खारिज हो चुकी हैं और पिछली विधानसभा का कार्यकाल भी समाप्त हो चुका है — इसलिए यह विवाद अब केवल ऐतिहासिक संदर्भ में प्रासंगिक है।

जस्टिस बागची के तीखे सवाल

जस्टिस बागची ने कहा कि न्यायिक समीक्षा में यह जाँचना आवश्यक है कि आयोग ने सभी संभावित विकल्पों — जैसे अस्थायी चुनाव चिन्ह देना — पर भी विचार किया था या नहीं। उन्होंने सवाल किया कि अयोग्यता कार्यवाही लंबित रहने के बावजूद आयोग ने 'विधायी बहुमत' को प्रमुख आधार क्यों माना, और इसके कारणों का स्पष्ट उल्लेख क्यों नहीं किया।

जस्टिस बागची ने सुभाष देसाई मामले का हवाला देते हुए कहा कि संविधान पीठ ने माना था कि पार्टी का व्हिप पार्टी नेतृत्व द्वारा नियुक्त होता है, न कि विधायकों द्वारा। उन्होंने रेखांकित किया कि संविधान की 10वीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) लागू होने के बाद व्यक्तिगत जनप्रतिनिधि की तुलना में राजनीतिक दल की पहचान और संरक्षण अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है।

वोटों के बँटवारे पर न्यायालय की आपत्ति

जब कौल ने मतों के आधार पर शिंदे गुट की वैधता का तर्क दिया, तो जस्टिस बागची ने स्पष्ट किया कि ये वोट 'अविभाजित शिवसेना' को मिले थे। उन्होंने कहा कि पार्टी में विभाजन के बाद यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि मतदाता ने वोट उम्मीदवार को दिया था या पार्टी की विचारधारा को। अदालत के अनुसार, चुनाव आयोग का निष्कर्ष काफी हद तक इस अनुमान पर आधारित था कि मतदाता की निष्ठा उम्मीदवार के साथ थी, जबकि विभाजन के बाद यह आकलन करना सरल नहीं है।

मुख्य न्यायाधीश का हस्तक्षेप

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान पूछा कि क्या सुभाष देसाई फैसले की टिप्पणियाँ केवल 10वीं अनुसूची तक सीमित थीं, या उनका विस्तार चुनाव आयोग की कार्यवाही पर भी होता है। उन्होंने यह भी जानना चाहा कि क्या उस फैसले ने यह तर्क खारिज किया था कि अयोग्यता कार्यवाही लंबित होने के बावजूद आयोग अपनी प्रक्रिया जारी रख सकता है।

आगे क्या होगा

अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया कि वह चुनाव आयोग द्वारा अपनाए गए मापदंडों की गहन संवैधानिक समीक्षा करेगी — विशेषकर यह कि क्या आयोग ने दल-बदल विरोधी कानून की भावना और संवैधानिक मूल्यों को ध्यान में रखकर फैसला सुनाया था। यह मामला भारत में राजनीतिक दलों की पहचान और चुनाव चिन्ह आवंटन की प्रक्रिया पर दूरगामी नज़ीर स्थापित कर सकता है; सुनवाई की अगली तारीख अभी घोषित नहीं हुई है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसके केंद्र में एक कहीं बड़ा सवाल है — क्या संख्याबल ही 'असली पार्टी' की कसौटी हो सकती है जब दल-बदल विरोधी कानून अभी भी लागू हो? जस्टिस बागची की टिप्पणियाँ इस तरफ इशारा करती हैं कि चुनाव आयोग ने एक ऐसे शॉर्टकट का इस्तेमाल किया जो संवैधानिक ढाँचे के साथ पूरी तरह संगत नहीं है। अगर अदालत यह नज़ीर स्थापित करती है कि आयोग को अयोग्यता-निर्णय की प्रतीक्षा करनी थी, तो भविष्य में किसी भी पार्टी-विभाजन में चुनाव चिन्ह आवंटन की प्रक्रिया मौलिक रूप से बदल जाएगी — जो देश के उन हर राज्य के लिए अहम है जहाँ गठबंधन की राजनीति में टूट-फूट आम है।
RashtraPress
17 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शिवसेना 'धनुष-बाण' चुनाव चिन्ह विवाद क्या है?
शिवसेना में 2022 के विभाजन के बाद एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे दोनों गुटों ने पार्टी के नाम और 'धनुष-बाण' चुनाव चिन्ह पर दावा किया। चुनाव आयोग ने विधायी बहुमत के आधार पर शिंदे गुट को चिन्ह और नाम दे दिया, जिसे ठाकरे गुट ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी है।
सुप्रीम कोर्ट ने 17 सितंबर की सुनवाई में क्या अहम सवाल उठाए?
जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने पूछा कि चुनाव आयोग ने अयोग्यता कार्यवाही लंबित रहते हुए 'विधायी बहुमत' को निर्णय का प्रमुख आधार क्यों बनाया और क्या आयोग ने अस्थायी चुनाव चिन्ह जैसे विकल्पों पर विचार किया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने पूछा कि सुभाष देसाई फैसले की टिप्पणियाँ आयोग पर कितनी बाध्यकारी हैं।
10वीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) का इस मामले से क्या संबंध है?
जस्टिस बागची ने कहा कि 10वीं अनुसूची लागू होने के बाद पार्टी की पहचान और संरक्षण व्यक्तिगत जनप्रतिनिधि से अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है। उनका तर्क था कि जब कोई जनप्रतिनिधि पार्टी छोड़ता है, तो वह मूल पार्टी की विचारधारा और पहचान अपने साथ नहीं ले जा सकता।
शिंदे गुट ने अपने दावे को कैसे मज़बूत किया?
वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने बताया कि शिवसेना के 18 में से 13 सांसद और विधायकों का बहुमत शिंदे गुट के साथ था। इसके अलावा संगठनात्मक इकाइयों और कार्यकर्ताओं के शपथपत्र भी आयोग के समक्ष प्रस्तुत किए गए थे, और अयोग्यता याचिकाएँ पहले ही खारिज हो चुकी हैं।
इस मामले का भविष्य में राजनीतिक दलों पर क्या असर पड़ सकता है?
सर्वोच्च न्यायालय का फैसला यह तय करेगा कि चुनाव आयोग भविष्य में पार्टी विभाजन के मामलों में 'विधायी बहुमत' को एकमात्र कसौटी मान सकता है या नहीं। अगर अदालत ने यह माना कि आयोग को अयोग्यता-निर्णय की प्रतीक्षा करनी चाहिए थी, तो पार्टी चिन्ह आवंटन की प्रक्रिया पर दूरगामी संवैधानिक नज़ीर स्थापित होगी।
राष्ट्र प्रेस
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