2 सितंबर 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

शिवसेना विवाद: सुप्रीम कोर्ट में शिंदे गुट ने उद्धव के दावों को नकारा, 15 सितंबर को अगली सुनवाई

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
शिवसेना विवाद: सुप्रीम कोर्ट में शिंदे गुट ने उद्धव के दावों को नकारा, 15 सितंबर को अगली सुनवाई

सारांश

शिवसेना के नाम और चुनाव चिह्न पर अधिकार का यह कानूनी संग्राम महाराष्ट्र की राजनीति का सबसे बड़ा दाँव बन चुका है। 2 सितंबर की सुनवाई में शिंदे गुट ने उद्धव के दावों को तथ्यात्मक रूप से गलत बताया और पार्टी संविधान व आंतरिक लोकतंत्र पर ठोस दलीलें रखीं। अगला फैसला 15 सितंबर को आएगा।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने 2 सितंबर को शिवसेना विवाद पर सुनवाई की।
शिंदे गुट के वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने उद्धव ठाकरे गुट की दलीलों को तथ्यात्मक रूप से गलत बताया।
भारत निर्वाचन आयोग ने शिंदे गुट को असली शिवसेना मानते हुए तीर-कमान चिह्न दिया था, जिसे ठाकरे ने न्यायालय में चुनौती दी है।
'पक्ष प्रमुख' पद 2013 में बालासाहेब ठाकरे के निधन के बाद 'शिवसेना प्रमुख' पद फ्रीज होने पर बनाया गया था — शिंदे गुट का तर्क।
शिंदे पक्ष ने दलीलें रखने के लिए चार घंटे माँगे; अगली सुनवाई 15 सितंबर को दोपहर 2 बजे निर्धारित।

सर्वोच्च न्यायालय में 2 सितंबर को शिवसेना पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर अधिकार को लेकर चल रहे विवाद में अहम सुनवाई हुई, जिसमें एकनाथ शिंदे गुट ने उद्धव ठाकरे की पार्टी के दावों को तथ्यात्मक रूप से गलत करार दिया। शिंदे गुट के वरिष्ठ वकील ने अपनी पूरी दलीलें रखने के लिए कम से कम चार घंटे का समय माँगा। अब इस मामले की अगली सुनवाई 15 सितंबर को दोपहर 2 बजे निर्धारित की गई है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला महाराष्ट्र की राजनीति के सबसे बड़े कानूनी संघर्षों में से एक है। भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट को असली शिवसेना के रूप में मान्यता देते हुए तीर-कमान का चुनाव चिह्न भी आवंटित किया था। इसी फैसले को उद्धव ठाकरे ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी है। इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ कर रही है।

शिंदे गुट की मुख्य दलीलें

शिंदे गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने कई अहम तर्क प्रस्तुत किए। आंतरिक लोकतंत्र के सवाल पर उन्होंने कहा, 'क्या एक जिम्मेदार राजनीतिक दल को केवल इसलिए आंतरिक चुनावों से बचना चाहिए क्योंकि इसमें धन का लेन-देन हो सकता है? धांधली या गड़बड़ी का समाधान उसे सुधारना चाहिए, न कि चुनावों को खत्म करना। इस बात की भी कोई गारंटी नहीं है कि जो व्यक्ति चुनाव जीतने के लिए पैसे देने को तैयार है, वह पद पाने के लिए पैसे नहीं देगा।'

कौल ने यह भी तर्क दिया कि जमीनी स्तर के कार्यकर्ता — जो मतदाताओं से सीधे संवाद करते हैं और पार्टी की नीतियों को आकार देते हैं — उन्हें केवल 'फैसले लागू करने वाले' कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। उनके अनुसार, ऐसे कार्यकर्ताओं को भी चुनावी जनादेश की उतनी ही आवश्यकता है जितनी वरिष्ठ पदाधिकारियों को।

निर्वाचन आयोग और पार्टी संविधान पर दलीलें

अधिवक्ता कौल ने कहा कि भारत निर्वाचन आयोग हर समय हर पार्टी के रोज़मर्रा के क्रियाकलापों पर नज़र नहीं रख सकता, लेकिन जब वह देखे तो चुप भी नहीं रह सकता। उन्होंने बताया कि जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 39 के तहत मान्यता प्राप्त दलों को अपने संविधान के अनुसार आंतरिक लोकतंत्र बनाए रखना होता है। शिवसेना का संविधान 1999 में आयोग को सौंपा गया था। गौरतलब है कि शिवसेना के संस्थापक बालासाहेब ठाकरे के 2012 में निधन के बाद पार्टी का संवैधानिक ढाँचा मूलभूत रूप से बदल दिया गया।

'पक्ष प्रमुख' पद पर विवाद

शिंदे गुट ने ठाकरे गुट के उस तर्क को 'भ्रामक' बताया जिसमें कहा गया था कि 'पक्ष प्रमुख' का पद केवल 2018 के संविधान के तहत अस्तित्व में आया। शिंदे पक्ष के अनुसार, बालासाहेब ठाकरे के प्रति सम्मान स्वरूप 2013 में 'शिवसेना प्रमुख' का पद फ्रीज किया गया था और इसके बाद 'पक्ष प्रमुख' का नया पद बनाया गया था। कौल ने स्पष्ट किया कि उस पद से जुड़ी शक्तियों से सभी अवगत थे और ठाकरे गुट की कई दलीलें तथ्यात्मक रूप से गलत हैं।

आगे क्या होगा

वरिष्ठ अधिवक्ता कौल ने पीठ को बताया कि सुनवाई को दस दिन हो चुके हैं और उन्हें अपनी पूरी दलीलें रखने के लिए कम से कम चार घंटे चाहिए, जिनमें से दो घंटे अकेले अयोग्यता के मामले पर दलीलें रखने के लिए आवश्यक हैं। अब इस पूरे विवाद की अगली सुनवाई 15 सितंबर को दोपहर 2 बजे होगी, जिसमें शिंदे गुट की शेष दलीलें सुनी जाएंगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि भारतीय लोकतंत्र में दल-बदल कानून और चुनाव आयोग की भूमिका की सीमाओं का परीक्षण है। शिंदे गुट की दलीलें संगठनात्मक लोकतंत्र के उस पहलू को उजागर करती हैं जिसे अक्सर नज़रअंदाज़ किया जाता है — कि पार्टी का असली आधार जमीनी कार्यकर्ता हैं, न सिर्फ शीर्ष नेतृत्व। हालाँकि यह तर्क तब कमज़ोर पड़ता है जब यही गुट विधायकों की बहुमत-संख्या को वैधता का एकमात्र आधार बताता है। सर्वोच्च न्यायालय का फैसला भविष्य में पार्टी-विभाजन के मामलों के लिए एक निर्णायक मिसाल बनेगा, और यही इस सुनवाई को महाराष्ट्र की सीमाओं से परे राष्ट्रीय महत्व देता है।
RashtraPress
2 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना विवाद का मामला क्या है?
यह मामला शिवसेना पार्टी के नाम और तीर-कमान चुनाव चिह्न पर अधिकार को लेकर है। भारत निर्वाचन आयोग ने एकनाथ शिंदे के गुट को असली शिवसेना मान्यता दी थी, जिसे उद्धव ठाकरे ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी है।
2 सितंबर की सुनवाई में शिंदे गुट ने क्या दलीलें दीं?
शिंदे गुट के वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने उद्धव ठाकरे गुट की दलीलों को तथ्यात्मक रूप से गलत बताया। उन्होंने पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र, 'पक्ष प्रमुख' पद की उत्पत्ति और निर्वाचन आयोग की निगरानी भूमिका पर विस्तृत तर्क रखे।
'पक्ष प्रमुख' पद को लेकर दोनों गुटों में क्या विवाद है?
ठाकरे गुट का दावा है कि 'पक्ष प्रमुख' पद केवल 2018 के पार्टी संविधान के तहत अस्तित्व में आया। शिंदे गुट ने इसे भ्रामक बताते हुए कहा कि 2013 में बालासाहेब ठाकरे के निधन के बाद 'शिवसेना प्रमुख' पद फ्रीज कर 'पक्ष प्रमुख' बनाया गया था और इससे जुड़ी शक्तियों से सभी परिचित थे।
इस मामले की अगली सुनवाई कब होगी?
सर्वोच्च न्यायालय ने अगली सुनवाई 15 सितंबर को दोपहर 2 बजे निर्धारित की है। उस सुनवाई में शिंदे गुट की शेष दलीलें सुनी जाएंगी, जिसके लिए कम से कम चार घंटे का समय माँगा गया है।
इस मामले की सुनवाई कौन सी पीठ कर रही है?
इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ कर रही है।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 2 सप्ताह पहले
  2. 3 सप्ताह पहले
  3. 3 सप्ताह पहले
  4. 2 महीने पहले
  5. 2 महीने पहले
  6. 8 महीने पहले
  7. 10 महीने पहले
  8. 1 साल पहले