शिवसेना विवाद: सुप्रीम कोर्ट में सिब्बल की दलील — 'चुनाव आयोग ने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया'
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय में 6 अगस्त 2026 को शिवसेना नाम और चुनाव चिह्न विवाद पर अहम सुनवाई हुई, जिसमें उद्धव ठाकरे गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने चुनाव आयोग (ECI) के फैसले को उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर करार दिया। सिब्बल ने तर्क दिया कि आयोग के पास पार्टी के संविधान की वैधता तय करने का कोई संवैधानिक अधिकार नहीं है।
सिब्बल की मुख्य दलीलें
सिब्बल ने अदालत को बताया कि 2022 की कार्यकारिणी समिति की बैठक में एकनाथ शिंदे को नेता चुना गया था, लेकिन बाद में वही सदस्य अपने निर्णय से पलट गए। उनके अनुसार, शिंदे गुट ने पार्टी संविधान में एकतरफा बदलाव किए और संगठन के नियमों की अनदेखी की।
सिब्बल ने यह भी कहा कि दोनों गुट 2018 के पार्टी संविधान के आधार पर सत्ता का दावा कर रहे थे, लेकिन चुनाव आयोग ने उस संविधान को दरकिनार करते हुए केवल विधानसभा में विधायकों की संख्या को आधार बनाकर नाम और चुनाव चिह्न का फैसला सुना दिया।
एफिडेविट और संगठन का प्रश्न
सिब्बल ने अदालत को अवगत कराया कि चुनाव आयोग को लाखों शपथपत्र (एफिडेविट) सौंपे गए थे, जिनमें पार्टी के भारी बहुमत ने उद्धव ठाकरे के समर्थन में हस्ताक्षर किए थे। इसके बावजूद आयोग ने पार्टी संगठन की आवाज़ को अनदेखा कर दिया।
उन्होंने स्पष्ट किया कि 21 जून 2022 को शिवसेना में कोई औपचारिक विभाजन नहीं हुआ था — कुछ विधायक अलग हुए थे, लेकिन पूरी पार्टी नहीं टूटी थी। ऐसे में आयोग का शिंदे गुट को चुनाव चिह्न आवंटित करना, उनके मुताबिक, कानूनी रूप से अनुचित था।
अयोग्यता और नाम-चिह्न का क्रम
सिब्बल ने प्रक्रियागत खामी की ओर भी ध्यान दिलाया। उनका कहना था कि पहले विधायकों की अयोग्यता का निर्णय होना चाहिए था और उसके बाद ही नाम व चुनाव चिह्न पर फैसला होना चाहिए था। लेकिन आयोग ने इस क्रम को उलट दिया, जिसके परिणामस्वरूप शिंदे गुट को नाम और निशान मिला और उन्होंने चुनाव भी जीत लिया।
गौरतलब है कि सिब्बल ने पहले पाँच जजों की संविधान पीठ के समक्ष भी यही दलीलें रखी थीं, लेकिन उस पीठ ने उन्हें स्वीकार नहीं किया था।
जस्टिस बागची की टिप्पणियाँ
जस्टिस बागची ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि अयोग्यता और चुनाव चिह्न — दोनों मामले आपस में जुड़े हैं, लेकिन उनके कानूनी सवाल अलग-अलग हैं। उन्होंने कहा कि स्पीकर यह तय करते हैं कि किसी विधायक ने स्वेच्छा से पार्टी छोड़ी है या नहीं, जबकि चुनाव आयोग का काम असली राजनीतिक पार्टी की पहचान करना है।
जस्टिस बागची ने सुभाष देसाई मामले का हवाला देते हुए कहा कि केवल विधायक दल छोड़ देने से यह नहीं माना जा सकता कि विधायक ने राजनीतिक पार्टी भी छोड़ दी। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या गुवाहाटी जाना, पार्टी प्रमुख की बैठक में न आना और दूसरी पार्टी के नेताओं के साथ रहना — ये सब मिलकर स्वैच्छिक पार्टी त्याग के पर्याप्त आधार हो सकते हैं।
सुनवाई में आगे क्या
जस्टिस बागची ने यह भी रेखांकित किया कि सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों के अनुसार अयोग्यता का फैसला मुख्यतः याचिका दाखिल होने की तारीख पर उपलब्ध तथ्यों के आधार पर होता है — बाद की घटनाओं को प्राथमिक आधार नहीं बनाया जा सकता। इस विवाद पर आगे की सुनवाई जारी रहने की उम्मीद है, और न्यायालय का अंतिम निर्णय भारतीय राजनीति में दल-विभाजन और चुनाव चिह्न आवंटन की प्रक्रिया पर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है।