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लोकसभा अध्यक्ष ने शिवसेना (यूबीटी) के 6 सांसदों का शिंदे गुट में विलय किया मान्य, संविधान सम्मत बताया

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लोकसभा अध्यक्ष ने शिवसेना (यूबीटी) के 6 सांसदों का शिंदे गुट में विलय किया मान्य, संविधान सम्मत बताया

सारांश

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने मानसून सत्र से पहले शिवसेना (यूबीटी) के छह बागी सांसदों का शिंदे गुट में विलय मान्य किया। शिंदे नेताओं ने इसे संविधान सम्मत और उद्धव ठाकरे की पार्टी के कमज़ोर पड़ने का प्रमाण बताया।

मुख्य बातें

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 19 जुलाई 2026 को शिवसेना (यूबीटी) के 6 बागी सांसदों का शिंदे गुट में विलय मान्य किया।
दलबदल विरोधी कानून की दसवीं अनुसूची के तहत दो-तिहाई बहुमत के आधार पर यह विलय वैध ठहराया गया।
शिवसेना नेता संजय निरुपम ने फैसले को संविधान सम्मत बताया और उद्धव ठाकरे पर हिंदुत्व विचारधारा छोड़ने का आरोप लगाया।
शाइना एनसी ने कहा कि यह एकनाथ शिंदे की प्रगतिशील राजनीति में बढ़ते विश्वास का प्रमाण है।
यह फैसला संसद के मानसून सत्र से ठीक पहले आया, जिससे लोकसभा में शिवसेना (यूबीटी) की संख्या और घट गई।

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 19 जुलाई 2026 को शिवसेना (यूबीटी) के छह बागी सांसदों के एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में विलय को औपचारिक मान्यता प्रदान कर दी। संसद के मानसून सत्र से ठीक पहले लिया गया यह फैसला दलबदल विरोधी कानून के तहत इन सांसदों के दल-परिवर्तन को वैध ठहराता है, जिससे वे अब शिंदे गुट के सांसद माने जाएंगे।

मुख्य घटनाक्रम

लोकसभा अध्यक्ष के इस आदेश के अनुसार, दलबदल विरोधी कानून की दसवीं अनुसूची के प्रावधानों के तहत किसी दल के दो-तिहाई सांसदों की सहमति से विलय को वैध माना जाता है। इन छह सांसदों ने इसी आधार पर शिंदे गुट में अपना विलय कराया था। अब इनकी सदस्यता उद्धव ठाकरे की पार्टी के बजाय शिंदे गुट के खाते में दर्ज होगी।

शिंदे गुट की प्रतिक्रिया

इस फैसले पर शिवसेना नेता संजय निरुपम ने कहा कि लोकसभा अध्यक्ष का आदेश यह स्पष्ट करता है कि यह निर्णय पूरी तरह संविधान के दायरे में लिया गया है। उन्होंने कहा, 'इन छह सांसदों ने कोई गैरकानूनी कदम नहीं उठाया है। कानून उन्हें यह अधिकार देता है कि अगर उनके पास दो-तिहाई बहुमत है तो वे किसी भी पार्टी में शामिल हो सकते हैं।'

निरुपम ने उद्धव ठाकरे पर निशाना साधते हुए कहा कि जनता का भरोसा उनकी पार्टी से उठ चुका है। उन्होंने कहा, 'पार्टी लगातार छोटी होती जा रही है, टूट रही है और बिखर रही है। अपनी पार्टी को बचाने की कोशिश में वे सिर्फ राम रक्षा स्तोत्र का पाठ कर रहे हैं।' उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि ठाकरे गुट ने अपनी मूल हिंदुत्व विचारधारा छोड़कर विरोधी विचारधारा वाले दलों से गठबंधन कर लिया है।

निरुपम ने तीखे शब्दों में कहा, 'राम के विरोधियों के साथ रहते हुए राम रक्षा स्तोत्र का पाठ करना वैसा ही है जैसे रावण भगवान राम की स्तुति करे।'

शाइना एनसी का समर्थन

शिवसेना नेत्री शाइना एनसी ने भी इस मान्यता का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि यह इस बात का प्रमाण है कि नेताओं का भरोसा एकनाथ शिंदे की प्रगतिशील राजनीति में बढ़ रहा है। उन्होंने शिवसेना (यूबीटी) से सवाल किया कि उसे गंभीरता से विचार करना चाहिए कि उसके नेता और कार्यकर्ता लगातार शिंदे गुट में क्यों शामिल हो रहे हैं।

राजनीतिक पृष्ठभूमि

गौरतलब है कि 2022 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में हुई बगावत के बाद से शिवसेना दो धड़ों में बंट गई थी। तब से दोनों गुटों के बीच पार्टी के नाम, चुनाव चिह्न और विधायी सदस्यता को लेकर कानूनी और राजनीतिक संघर्ष जारी है। यह ऐसे समय में आया है जब महाराष्ट्र में महायुति सरकार स्थिर है और उद्धव ठाकरे गुट विपक्षी गठबंधन में अपनी भूमिका तलाश रहा है।

आगे क्या होगा

इस फैसले के बाद शिवसेना (यूबीटी) के पास लोकसभा में अपनी संख्या और कम हो जाएगी, जिससे उसकी सौदेबाज़ी की शक्ति प्रभावित हो सकती है। माना जा रहा है कि ठाकरे गुट इस आदेश को कानूनी रूप से चुनौती दे सकता है। मानसून सत्र में इस मुद्दे पर सदन के भीतर भी गरमागरम बहस संभव है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह उस व्यापक प्रवृत्ति को रेखांकित करता है जिसमें विधायी मान्यता और न्यायिक समीक्षा के बीच की खाई बढ़ती जा रही है — सर्वोच्च न्यायालय में शिवसेना विभाजन से जुड़े मामले अभी भी लंबित हैं। शिंदे गुट के नेताओं की भाषा में जीत का उत्साह है, लेकिन असली राजनीतिक परीक्षा महाराष्ट्र की सड़कों पर होगी, न कि लोकसभा की सदस्यता सूचियों में। उद्धव ठाकरे गुट पर वैचारिक विचलन के जो आरोप लगाए जा रहे हैं, वे नए नहीं हैं — लेकिन हर बार जब कोई सांसद या विधायक पाला बदलता है, तो यह कथा और पुख्ता होती है। मुख्यधारा की कवरेज इस बात को अक्सर नज़रअंदाज़ करती है कि दलबदल की वैधता और जनादेश की वैधता दो अलग-अलग सवाल हैं।
RashtraPress
20 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

लोकसभा अध्यक्ष ने शिवसेना (यूबीटी) के 6 सांसदों के विलय को क्यों मान्यता दी?
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने दलबदल विरोधी कानून की दसवीं अनुसूची के तहत विलय को मान्यता दी, क्योंकि इन छह सांसदों के पास दो-तिहाई बहुमत था जो कानूनी रूप से दल-परिवर्तन के लिए आवश्यक है। यह आदेश 19 जुलाई 2026 को मानसून सत्र से पहले जारी किया गया।
दलबदल विरोधी कानून के तहत विलय कब वैध होता है?
दलबदल विरोधी कानून की दसवीं अनुसूची के अनुसार, यदि किसी दल के कम से कम दो-तिहाई सांसद एक साथ किसी अन्य दल में विलय करते हैं, तो उन्हें अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता। इन छह सांसदों ने इसी प्रावधान का उपयोग करते हुए शिंदे गुट में विलय किया।
इस फैसले से शिवसेना (यूबीटी) पर क्या असर पड़ेगा?
इस फैसले के बाद लोकसभा में शिवसेना (यूबीटी) की संख्या और कम हो जाएगी, जिससे विपक्षी गठबंधन में उसकी सौदेबाज़ी की शक्ति प्रभावित हो सकती है। माना जा रहा है कि ठाकरे गुट इस आदेश को कानूनी रूप से चुनौती दे सकता है।
संजय निरुपम ने उद्धव ठाकरे पर क्या आरोप लगाए?
शिवसेना नेता संजय निरुपम ने आरोप लगाया कि उद्धव ठाकरे की पार्टी ने अपनी मूल हिंदुत्व विचारधारा छोड़ दी है और विरोधी विचारधारा वाले दलों से गठबंधन कर लिया है। उन्होंने यह भी कहा कि जनता का भरोसा ठाकरे नेतृत्व से उठ चुका है और पार्टी लगातार बिखर रही है।
शिवसेना में विभाजन की शुरुआत कब हुई थी?
2022 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में हुई बगावत के बाद शिवसेना दो धड़ों — शिंदे गुट और उद्धव ठाकरे गुट (यूबीटी) — में बंट गई थी। तब से पार्टी के नाम, चुनाव चिह्न और विधायी सदस्यता को लेकर दोनों पक्षों के बीच कानूनी और राजनीतिक संघर्ष जारी है।
राष्ट्र प्रेस
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