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लोकसभा स्पीकर ने उद्धव गुट के 6 सांसदों को शिंदे की शिवसेना में दी मान्यता, संजय निरुपम बोले- यूबीटी खत्म हो रही है

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लोकसभा स्पीकर ने उद्धव गुट के 6 सांसदों को शिंदे की शिवसेना में दी मान्यता, संजय निरुपम बोले- यूबीटी खत्म हो रही है

सारांश

लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने उद्धव ठाकरे गुट के 6 सांसदों को शिंदे की शिवसेना का आधिकारिक हिस्सा मान लिया — 2022 के शिवसेना विभाजन की सबसे बड़ी संसदीय स्वीकृति। यह फैसला महाराष्ट्र की राजनीति में यूबीटी के लिए एक और गहरा झटका है।

मुख्य बातें

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 19 जुलाई 2026 को उद्धव ठाकरे गुट के 6 बागी सांसदों को शिंदे गुट की शिवसेना का आधिकारिक सदस्य माना।
यह फैसला संविधान के दो-तिहाई बहुमत वाले दल-बदल प्रावधान के आधार पर लिया गया।
शिवसेना नेता संजय निरुपम ने कहा कि उद्धव ठाकरे की पार्टी 'सिकुड़ रही है और खत्म हो रही है।' भाजपा विधायक राम कदम ने बताया कि स्पीकर ने इससे पहले TMC के 20 सांसदों के मामले में भी इसी तरह का फैसला लिया था।
शिवसेना नेता मिलिंद देवड़ा ने मानसून सत्र से पहले विपक्षी दलों के वॉकआउट को 'दुर्भाग्यपूर्ण' बताया।

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 19 जुलाई 2026 को उद्धव ठाकरे गुट (शिवसेना-यूबीटी) के 6 बागी सांसदों को एकनाथ शिंदे गुट की शिवसेना के आधिकारिक सदस्य के रूप में मान्यता प्रदान कर दी। स्पीकर के इस आदेश के बाद ये छहों सांसद अब संसद में शिंदे गुट की शिवसेना के साथ बैठेंगे। यह निर्णय संसद के नियमों, स्थापित परंपराओं और संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप लिया गया बताया गया है।

स्पीकर के फैसले की पृष्ठभूमि

संविधान के दल-बदल विरोधी प्रावधानों के तहत किसी दल के दो-तिहाई सांसद यदि एकजुट होकर किसी अन्य दल में विलय करें, तो उन्हें अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता। इसी संवैधानिक व्यवस्था के आधार पर लोकसभा अध्यक्ष ने यह आदेश जारी किया। गौरतलब है कि इससे पहले स्पीकर बिरला ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 सांसदों के मामले में भी इसी तरह का निर्णय लिया था, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह कोई अभूतपूर्व कदम नहीं है।

शिवसेना नेताओं की प्रतिक्रिया

शिवसेना नेता संजय निरुपम ने स्पीकर के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि यह आदेश यह सिद्ध करता है कि यूबीटी के 6 सांसदों का शिवसेना में शामिल होना पूरी तरह संवैधानिक ढाँचे के भीतर है। उन्होंने कहा, 'इन छह सांसदों ने किसी भी तरह का गैरकानूनी कदम नहीं उठाया था। कानून उन्हें अधिकार देता है कि वे दो-तिहाई बहुमत के साथ किसी भी पार्टी में शामिल हो सकते हैं।'

निरुपम ने उद्धव ठाकरे पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि यूबीटी की पार्टी 'लगातार सिकुड़ रही है, टूट रही है और खत्म हो रही है।' उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि 2019 में जब उद्धव ठाकरे ने कांग्रेस से हाथ मिलाने के लिए शिवसेना की मूल विचारधारा हिंदुत्व को छोड़ा, तब से उनका जनाधार कमज़ोर पड़ता गया।

भाजपा विधायक राम कदम ने कहा कि यह फैसला पूरी तरह संसद के नियमों और संविधान के अनुरूप है। उन्होंने कहा कि दो-तिहाई बहुमत के आधार पर यूबीटी गुट के 6 सांसदों को असली शिवसेना के आधिकारिक सदस्य के रूप में मान्यता दी गई है और उनके लिए अलग बैठने की व्यवस्था भी की गई है।

शाइना एनसी और मिलिंद देवड़ा का बयान

शिवसेना नेता शाइना एनसी ने कहा कि संविधान दो-तिहाई सांसदों को अलग होने की मान्यता देता है और लोकसभा स्पीकर ने उसी प्रावधान को लागू किया है। उन्होंने उद्धव गुट को आत्मचिंतन की सलाह देते हुए कहा कि उन्हें विचार करना चाहिए कि उनके नेता और कार्यकर्ता शिंदे की शिवसेना में क्यों शामिल हो रहे हैं।

शिवसेना नेता मिलिंद देवड़ा ने मानसून सत्र से पहले बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में कुछ विपक्षी दलों के वॉकआउट को 'दुर्भाग्यपूर्ण' बताया। उन्होंने कहा कि संसद का सुचारू संचालन केवल सत्तापक्ष की नहीं, बल्कि विपक्ष की भी जिम्मेदारी है।

आम जनता और राजनीति पर असर

यह फैसला महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना विभाजन के उस लंबे विवाद की एक और कड़ी है जो 2022 से चला आ रहा है। आलोचकों का कहना है कि इस तरह के दल-बदल संसदीय लोकतंत्र में मतदाताओं के जनादेश को कमज़ोर करते हैं, जबकि शिंदे गुट इसे संवैधानिक अधिकार बताता है। शिवसेना-यूबीटी के लिए यह झटका इसलिए भी बड़ा है क्योंकि संसद में उनकी संख्या और कमज़ोर हो गई है।

आगे क्या होगा

शिवसेना-यूबीटी के इन 6 सांसदों की सदस्यता को लेकर कानूनी लड़ाई अभी भी जारी रह सकती है, क्योंकि दल-बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता याचिकाएँ अदालत में विचाराधीन हो सकती हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह घटनाक्रम 2027 के महाराष्ट्र राजनीतिक समीकरणों को और प्रभावित कर सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह उस व्यापक प्रवृत्ति को रेखांकित करता है जिसमें दल-बदल विरोधी कानून के प्रावधानों का उपयोग बड़े दलों को तोड़ने के लिए किया जा रहा है। 2022 से शुरू हुई शिवसेना की यह टूट अब संसद में औपचारिक मान्यता के स्तर तक पहुँच गई है, जो उद्धव ठाकरे के लिए केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि संस्थागत पराजय भी है। असली सवाल यह है कि क्या यह 'दो-तिहाई' का फॉर्मूला लोकतांत्रिक जनादेश की रक्षा करता है या उसे दरकिनार करने का कानूनी रास्ता बन गया है — यह बहस सर्वोच्च न्यायालय में भी लंबित है।
RashtraPress
20 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

लोकसभा स्पीकर ने शिवसेना-यूबीटी के 6 सांसदों को शिंदे गुट में क्यों मान्यता दी?
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने संविधान के उस प्रावधान के आधार पर यह फैसला लिया जिसके तहत किसी दल के दो-तिहाई सांसद एकजुट होकर दूसरे दल में विलय कर सकते हैं और उन्हें अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता। इन 6 सांसदों ने इसी आधार पर शिंदे गुट की शिवसेना में शामिल होने का दावा किया था।
शिवसेना विभाजन का संसद में क्या असर होगा?
इस फैसले के बाद ये 6 सांसद अब संसद में शिंदे गुट की शिवसेना के साथ बैठेंगे, जिससे उद्धव ठाकरे गुट की संसदीय ताकत और कम हो जाएगी। शिवसेना-यूबीटी के लिए यह एक बड़ा संस्थागत झटका है।
संजय निरुपम ने उद्धव ठाकरे पर क्या आरोप लगाए?
शिवसेना नेता संजय निरुपम ने कहा कि उद्धव ठाकरे ने 2019 में कांग्रेस से हाथ मिलाने के लिए शिवसेना की मूल विचारधारा हिंदुत्व को छोड़ दिया था, जिसके बाद से उनकी पार्टी लगातार कमज़ोर हो रही है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि ठाकरे केवल पार्टी बचाने के लिए धार्मिक आयोजनों का सहारा ले रहे हैं।
क्या इस तरह का फैसला पहले भी हुआ है?
हाँ, भाजपा विधायक राम कदम के अनुसार लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने इससे पहले तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 सांसदों के मामले में भी इसी तरह का फैसला लिया था। यह संसदीय परंपरा और दो-तिहाई विलय के संवैधानिक प्रावधान पर आधारित है।
शिवसेना-यूबीटी के लिए आगे क्या विकल्प हैं?
शिवसेना-यूबीटी इस फैसले को कानूनी चुनौती दे सकती है, क्योंकि दल-बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता याचिकाएँ अदालत में विचार योग्य हैं। सर्वोच्च न्यायालय में शिवसेना विभाजन से जुड़े मामले पहले से ही लंबित हैं।
राष्ट्र प्रेस
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