22 जुलाई 2026
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शिवसेना (यूबीटी) के 6 सांसदों के विलय पर सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा अध्यक्ष और सांसदों को भेजा नोटिस

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शिवसेना (यूबीटी) के 6 सांसदों के विलय पर सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा अध्यक्ष और सांसदों को भेजा नोटिस

सारांश

शिवसेना (यूबीटी) के 6 सांसदों के शिंदे गुट में विलय को लोकसभा अध्यक्ष की मंजूरी मिलने के बाद अब यह मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुँच गया है। कोर्ट ने नोटिस जारी किया, लेकिन रोक लगाने से इनकार किया — दलबदल कानून की व्याख्या पर बड़ा फैसला दो सप्ताह में संभव।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 22 जुलाई 2026 को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के कार्यालय और 6 सांसदों को नोटिस जारी किया।
अदालत ने लोकसभा अध्यक्ष के विलय-मान्यता आदेश पर फिलहाल रोक लगाने से इनकार किया।
मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद निर्धारित है।
विलय के बाद लोकसभा में शिवसेना (यूबीटी) के सांसदों की संख्या 9 से घटकर 3 रह गई।
याचिका अरविंद सावंत ने दायर की; सुनवाई जस्टिस पी.एस.
नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने की।

सर्वोच्च न्यायालय ने 22 जुलाई 2026 को शिवसेना (यूबीटी) के 6 सांसदों के एकनाथ शिंदे गुट की शिवसेना में विलय को मान्यता देने के लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए अध्यक्ष कार्यालय और संबंधित छह सांसदों को नोटिस जारी किया। हालांकि, अदालत ने फिलहाल लोकसभा अध्यक्ष के आदेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया और मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद निर्धारित की।

मामले की पृष्ठभूमि

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने संसद के मानसून सत्र से पहले शिवसेना (यूबीटी) के 6 सांसदों के शिंदे गुट में विलय को दलबदल-विरोधी प्रावधानों के अंतर्गत मान्यता दी थी। इस निर्णय के बाद लोकसभा में शिवसेना (यूबीटी) के सांसदों की संख्या घटकर 3 रह गई, जिससे संसद में पार्टी के कामकाज पर सीधा असर पड़ा।

सुप्रीम कोर्ट में याचिका

शिवसेना (यूबीटी) के सांसद अरविंद सावंत ने लोकसभा अध्यक्ष के इस फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी। जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने याचिका की सुनवाई की। याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि इस विलय से संसद में एक राजनीतिक दल के रूप में शिवसेना (यूबीटी) का कामकाज बाधित हो गया है।

नेताओं की प्रतिक्रिया

शिवसेना (यूबीटी) के वरिष्ठ नेता संजय राउत ने मंगलवार को कहा, 'ये बागी नहीं बल्कि गद्दार हैं। भगत सिंह और सुखदेव जैसे क्रांतिकारी बागी थे। सोमवार को सड़कों पर उतरे छात्र भी बागी थे, लेकिन जो पैसे लेकर बिक गए, वे गद्दार हैं। अगर हमारे छह सांसद उनके साथ चले गए हैं, तो वे गद्दार हैं।' वहीं, शिवसेना के नेता संजय निरुपम ने पलटवार करते हुए कहा, 'छह सांसदों ने कोई गैरकानूनी कदम नहीं उठाया है। कानून उन्हें यह अधिकार देता है कि अगर उनके पास दो-तिहाई बहुमत है तो वे किसी भी पार्टी में शामिल हो सकते हैं।'

कानूनी और संवैधानिक पहलू

यह मामला ऐसे समय में आया है जब दलबदल-विरोधी कानून की व्याख्या को लेकर राजनीतिक और कानूनी हलकों में बहस तेज है। गौरतलब है कि महाराष्ट्र में 2022 की राजनीतिक उथल-पुथल के बाद से शिवसेना के दोनों गुटों के बीच विधायी मान्यता को लेकर कई कानूनी लड़ाइयाँ चल रही हैं। दलबदल-विरोधी प्रावधानों के तहत किसी दल के दो-तिहाई सदस्यों का विलय वैध माना जाता है — यही इस मामले का केंद्रीय विवाद है।

आगे क्या होगा

सर्वोच्च न्यायालय ने लोकसभा अध्यक्ष कार्यालय और छह सांसदों से दो सप्ताह के भीतर जवाब माँगा है। अदालत के अगले आदेश तक लोकसभा अध्यक्ष का फैसला प्रभावी रहेगा। यह फैसला महाराष्ट्र की राजनीति और संसद में दलबदल कानून की भावी व्याख्या पर दूरगामी असर डाल सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन सर्वोच्च न्यायालय का नोटिस यह संकेत देता है कि इस प्रक्रिया की संवैधानिक जाँच अभी बाकी है। 2022 के महाराष्ट्र संकट से लेकर अब तक शिवसेना से जुड़े हर बड़े राजनीतिक निर्णय को अदालत में चुनौती मिली है — यह पैटर्न दर्शाता है कि दलबदल कानून की मौजूदा व्याख्या विधायिका और न्यायपालिका के बीच एक अनसुलझा तनाव बनी हुई है। असली सवाल यह है कि क्या 'दो-तिहाई बहुमत' की शर्त राजनीतिक पुनर्गठन के लिए ढाल बन गई है या वास्तविक वैचारिक मतभेद का प्रतिबिंब — और अदालत का अगला फैसला इसी रेखा को परिभाषित करेगा।
RashtraPress
22 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट ने शिवसेना (यूबीटी) विलय मामले में किसे नोटिस जारी किया?
सर्वोच्च न्यायालय ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के कार्यालय और शिंदे गुट में शामिल हुए छह सांसदों को नोटिस जारी किया है। अदालत ने दो सप्ताह के भीतर जवाब माँगा है।
लोकसभा अध्यक्ष ने शिवसेना (यूबीटी) के 6 सांसदों के विलय को क्यों मंजूरी दी?
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने दलबदल-विरोधी कानून के प्रावधानों के तहत विलय को मान्यता दी, जिसके अनुसार किसी दल के दो-तिहाई सदस्यों का विलय वैध माना जाता है। इस फैसले के बाद शिवसेना (यूबीटी) के लोकसभा सांसदों की संख्या घटकर 3 रह गई।
इस मामले में याचिका किसने दायर की और किस आधार पर?
शिवसेना (यूबीटी) के सांसद अरविंद सावंत ने यह याचिका दायर की। उनका तर्क है कि इस विलय से संसद में शिवसेना (यूबीटी) का राजनीतिक दल के रूप में कामकाज बाधित हो गया है।
क्या सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा अध्यक्ष के फैसले पर रोक लगाई?
नहीं, सर्वोच्च न्यायालय ने फिलहाल लोकसभा अध्यक्ष के आदेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। अगली सुनवाई तक विलय की मान्यता प्रभावी रहेगी।
इस विलय विवाद का महाराष्ट्र की राजनीति पर क्या असर पड़ेगा?
यह मामला दलबदल-विरोधी कानून की व्याख्या पर सर्वोच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण फैसला ला सकता है, जिसका असर महाराष्ट्र ही नहीं, पूरे देश की संसदीय राजनीति पर पड़ेगा। 2022 से चले आ रहे शिवसेना के दोनों गुटों के बीच कानूनी संघर्ष में यह एक और अहम पड़ाव है।
राष्ट्र प्रेस
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