18 जुलाई 2026
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लोकसभा स्पीकर ने 6 यूबीटी सांसदों का शिंदे गुट में विलय मंजूर किया, उद्धव ठाकरे की ताकत घटकर 3 रह गई

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लोकसभा स्पीकर ने 6 यूबीटी सांसदों का शिंदे गुट में विलय मंजूर किया, उद्धव ठाकरे की ताकत घटकर 3 रह गई

सारांश

लोकसभा स्पीकर की मंजूरी से उद्धव ठाकरे का संसदीय किला ढह गया — 9 से 3 सांसद। शिंदे गुट 13 सांसदों के साथ मज़बूत हुआ। मानसून सत्र से पहले यह झटका एनडीए को संविधान संशोधन के लिए बहुमत जुटाने में मददगार साबित हो सकता है।

मुख्य बातें

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 18 जुलाई 2026 को शिवसेना (यूबीटी) के 6 बागी सांसदों का एकनाथ शिंदे की शिवसेना में विलय औपचारिक रूप से मंजूर किया।
शिवसेना (यूबीटी) की लोकसभा सदस्य संख्या 9 से घटकर 3 हो गई; शिंदे गुट की संख्या 7 से बढ़कर 13 हुई।
यूबीटी में बचे सांसद: अरविंद सावंत (मुंबई दक्षिण), अनिल देसाई (मुंबई दक्षिण मध्य), राजभाऊ वाजे (नासिक)।
यूबीटी प्रवक्ता आनंद दुबे ने आरोप लगाया कि स्पीकर ने दोनों पक्षों को सुने बिना फैसला दिया; न्यायालय जाने के संकेत दिए।
मानसून सत्र 20 जुलाई से 13 अगस्त 2026 तक; एनडीए महिला आरक्षण व परिसीमन विधेयक के लिए दो-तिहाई बहुमत जुटाने की कोशिश में।

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 18 जुलाई 2026 को शिवसेना (यूबीटी) के छह बागी सांसदों के महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की शिवसेना में विलय को औपचारिक मान्यता दे दी। इस फैसले से उद्धव ठाकरे की पार्टी की लोकसभा में सदस्य संख्या 9 से घटकर मात्र 3 रह गई है, जबकि शिंदे गुट की ताकत 7 से बढ़कर 13 हो गई है। यह घटनाक्रम 20 जुलाई से शुरू होने वाले संसद के मानसून सत्र से ठीक पहले सामने आया है।

मुख्य घटनाक्रम

लोकसभा सचिवालय ने सभी छह सांसदों को विलय की औपचारिक अनुमति दे दी है। बागी सांसदों में ओमप्रकाश भूपालसिंह उर्फ ओमराजे निंबालकर (धाराशिव/उस्मानाबाद), नागेश बापुराव पाटिल आष्टीकर (हिंगोली), संजय हरिभाऊ जाधव (परभणी), संजय उत्तमराव देशमुख (यवतमाल-वाशिम), भाऊसाहेब राजाराम वाकचौरे (शिरडी) और संजय दीना पाटिल (मुंबई उत्तर पूर्व) शामिल हैं।

गौरतलब है कि पिछले महीने शिंदे गुट ने 'ऑपरेशन टाइगर' के तहत यूबीटी में फूट डाली थी, जिसके बाद ये सांसद औपचारिक रूप से शिंदे खेमे में शामिल हो गए थे। अब लोकसभा अध्यक्ष की मंजूरी से यह विलय संसदीय रूप से भी वैध हो गया है।

उद्धव खेमे में कौन बचा

विलय के बाद शिवसेना (यूबीटी) के लोकसभा में केवल तीन सांसद शेष हैं — अरविंद सावंत (मुंबई दक्षिण), अनिल देसाई (मुंबई दक्षिण मध्य) और राजभाऊ वाजे (नासिक)। यह संख्या दल-बदल विरोधी कानून की न्यूनतम सीमा से भी नीचे है, जिससे पार्टी की संसदीय स्थिति कमज़ोर हो गई है।

इसी के साथ, तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी सांसद जो एनसीपीआई में शामिल हुए हैं, उन्हें भी सदन में अलग बैठने की अनुमति मिल गई है।

यूबीटी की तीखी प्रतिक्रिया

शिवसेना (यूबीटी) के प्रवक्ता आनंद दुबे ने इस फैसले की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा, '2022 में जब हमारी पार्टी को तोड़ा जा रहा था, तब से हम लड़ाई लड़ रहे हैं। हमारी पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह चुरा लिया गया। इसमें तत्कालीन राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने कितनी बड़ी भूमिका निभाई, वो जगजाहिर है।'

दुबे ने यह भी आरोप लगाया कि लोकसभा स्पीकर ने दोनों पक्षों को सुने बिना अपना फैसला दे दिया। उन्होंने कहा, 'हमारे जो सांसद चुराए गए, वो हमारे नाम और चुनाव चिन्ह पर चुनकर आए थे। ऐसे में यह एकतरफा निर्णय लोकतंत्र के कमज़ोर होने का संकेत है।' उन्होंने न्यायालय का रास्ता अपनाने का संकेत भी दिया, हालांकि स्वीकार किया कि अदालतों में 'तारीख पर तारीख' की समस्या है।

मानसून सत्र पर असर

यह राजनीतिक उथल-पुथल ऐसे समय में आई है जब संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई से 13 अगस्त 2026 तक चलने वाला है। एनडीए की कोशिश है कि बढ़ी हुई संसदीय ताकत के बल पर महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को आगे बढ़ाया जाए, जिसके लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी।

दूसरी ओर, विपक्ष नीट पेपर लीक, अयोध्या राम मंदिर चंदा विवाद और महंगाई जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरने की तैयारी में है। बदले हुए संसदीय समीकरणों में विपक्ष की एकजुटता की परीक्षा होगी।

आगे क्या होगा

शिवसेना (यूबीटी) के न्यायालय जाने के संकेत के बाद यह मामला कानूनी लड़ाई का रूप ले सकता है। यह ऐसे समय में है जब 2022 के मूल शिवसेना विभाजन से जुड़े मामले अभी भी न्यायपालिका में विचाराधीन हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस विलय से महाराष्ट्र में 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले उद्धव ठाकरे की सौदेबाजी की शक्ति और कमज़ोर होगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

चुनाव चिन्ह और अब संसदीय प्रतिनिधित्व — सब शिंदे गुट के पास चला गया। आलोचकों का कहना है कि जब मूल विभाजन का मामला अभी न्यायपालिका में है, तब विलय को इतनी जल्दी मंजूरी देना प्रक्रियागत सवाल उठाता है। एनडीए के लिए यह संसदीय अंकगणित में सुधार है, लेकिन विपक्ष के लिए यह संस्थागत तटस्थता पर सवाल उठाने का नया हथियार भी बन गया है। असली परीक्षा यह होगी कि क्या उद्धव ठाकरे अदालत में वह राहत पा सकते हैं जो उन्हें संसद में नहीं मिली।
RashtraPress
18 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

लोकसभा स्पीकर ने किन 6 सांसदों के विलय को मंजूरी दी?
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने ओमप्रकाश भूपालसिंह निंबालकर (धाराशिव), नागेश पाटिल आष्टीकर (हिंगोली), संजय जाधव (परभणी), संजय देशमुख (यवतमाल-वाशिम), भाऊसाहेब वाकचौरे (शिरडी) और संजय दीना पाटिल (मुंबई उत्तर पूर्व) के शिंदे गुट में विलय को मंजूरी दी। ये सभी पहले शिवसेना (यूबीटी) के टिकट पर चुने गए थे।
'ऑपरेशन टाइगर' क्या था?
'ऑपरेशन टाइगर' एकनाथ शिंदे की शिवसेना द्वारा चलाया गया वह अभियान था जिसके तहत उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) के छह लोकसभा सांसदों को शिंदे गुट में शामिल कराया गया। यह अभियान मानसून सत्र 2026 से पहले पिछले महीने अंजाम दिया गया।
इस विलय के बाद लोकसभा में शक्ति संतुलन कैसे बदला?
विलय के बाद शिवसेना (यूबीटी) के लोकसभा सांसदों की संख्या 9 से घटकर 3 रह गई है, जबकि शिंदे गुट की संख्या 7 से बढ़कर 13 हो गई है। यूबीटी में अब केवल अरविंद सावंत, अनिल देसाई और राजभाऊ वाजे बचे हैं।
उद्धव ठाकरे गुट अब क्या कदम उठा सकता है?
शिवसेना (यूबीटी) के प्रवक्ता आनंद दुबे ने न्यायालय जाने के संकेत दिए हैं। हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि अदालती प्रक्रिया में समय लगता है। 2022 के मूल विभाजन से जुड़े मामले पहले से ही न्यायपालिका में विचाराधीन हैं।
मानसून सत्र पर इस विलय का क्या असर होगा?
20 जुलाई से 13 अगस्त 2026 तक चलने वाले मानसून सत्र में एनडीए की संसदीय ताकत बढ़ने से महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक के लिए दो-तिहाई बहुमत जुटाना आसान हो सकता है। विपक्ष नीट पेपर लीक, महंगाई और अन्य मुद्दों पर सरकार को घेरने की तैयारी में है।
राष्ट्र प्रेस
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