लोकसभा स्पीकर ने 6 यूबीटी सांसदों का शिंदे गुट में विलय मंजूर किया, उद्धव ठाकरे की ताकत घटकर 3 रह गई
सारांश
मुख्य बातें
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 18 जुलाई 2026 को शिवसेना (यूबीटी) के छह बागी सांसदों के महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की शिवसेना में विलय को औपचारिक मान्यता दे दी। इस फैसले से उद्धव ठाकरे की पार्टी की लोकसभा में सदस्य संख्या 9 से घटकर मात्र 3 रह गई है, जबकि शिंदे गुट की ताकत 7 से बढ़कर 13 हो गई है। यह घटनाक्रम 20 जुलाई से शुरू होने वाले संसद के मानसून सत्र से ठीक पहले सामने आया है।
मुख्य घटनाक्रम
लोकसभा सचिवालय ने सभी छह सांसदों को विलय की औपचारिक अनुमति दे दी है। बागी सांसदों में ओमप्रकाश भूपालसिंह उर्फ ओमराजे निंबालकर (धाराशिव/उस्मानाबाद), नागेश बापुराव पाटिल आष्टीकर (हिंगोली), संजय हरिभाऊ जाधव (परभणी), संजय उत्तमराव देशमुख (यवतमाल-वाशिम), भाऊसाहेब राजाराम वाकचौरे (शिरडी) और संजय दीना पाटिल (मुंबई उत्तर पूर्व) शामिल हैं।
गौरतलब है कि पिछले महीने शिंदे गुट ने 'ऑपरेशन टाइगर' के तहत यूबीटी में फूट डाली थी, जिसके बाद ये सांसद औपचारिक रूप से शिंदे खेमे में शामिल हो गए थे। अब लोकसभा अध्यक्ष की मंजूरी से यह विलय संसदीय रूप से भी वैध हो गया है।
उद्धव खेमे में कौन बचा
विलय के बाद शिवसेना (यूबीटी) के लोकसभा में केवल तीन सांसद शेष हैं — अरविंद सावंत (मुंबई दक्षिण), अनिल देसाई (मुंबई दक्षिण मध्य) और राजभाऊ वाजे (नासिक)। यह संख्या दल-बदल विरोधी कानून की न्यूनतम सीमा से भी नीचे है, जिससे पार्टी की संसदीय स्थिति कमज़ोर हो गई है।
इसी के साथ, तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी सांसद जो एनसीपीआई में शामिल हुए हैं, उन्हें भी सदन में अलग बैठने की अनुमति मिल गई है।
यूबीटी की तीखी प्रतिक्रिया
शिवसेना (यूबीटी) के प्रवक्ता आनंद दुबे ने इस फैसले की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा, '2022 में जब हमारी पार्टी को तोड़ा जा रहा था, तब से हम लड़ाई लड़ रहे हैं। हमारी पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह चुरा लिया गया। इसमें तत्कालीन राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने कितनी बड़ी भूमिका निभाई, वो जगजाहिर है।'
दुबे ने यह भी आरोप लगाया कि लोकसभा स्पीकर ने दोनों पक्षों को सुने बिना अपना फैसला दे दिया। उन्होंने कहा, 'हमारे जो सांसद चुराए गए, वो हमारे नाम और चुनाव चिन्ह पर चुनकर आए थे। ऐसे में यह एकतरफा निर्णय लोकतंत्र के कमज़ोर होने का संकेत है।' उन्होंने न्यायालय का रास्ता अपनाने का संकेत भी दिया, हालांकि स्वीकार किया कि अदालतों में 'तारीख पर तारीख' की समस्या है।
मानसून सत्र पर असर
यह राजनीतिक उथल-पुथल ऐसे समय में आई है जब संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई से 13 अगस्त 2026 तक चलने वाला है। एनडीए की कोशिश है कि बढ़ी हुई संसदीय ताकत के बल पर महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को आगे बढ़ाया जाए, जिसके लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी।
दूसरी ओर, विपक्ष नीट पेपर लीक, अयोध्या राम मंदिर चंदा विवाद और महंगाई जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरने की तैयारी में है। बदले हुए संसदीय समीकरणों में विपक्ष की एकजुटता की परीक्षा होगी।
आगे क्या होगा
शिवसेना (यूबीटी) के न्यायालय जाने के संकेत के बाद यह मामला कानूनी लड़ाई का रूप ले सकता है। यह ऐसे समय में है जब 2022 के मूल शिवसेना विभाजन से जुड़े मामले अभी भी न्यायपालिका में विचाराधीन हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस विलय से महाराष्ट्र में 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले उद्धव ठाकरे की सौदेबाजी की शक्ति और कमज़ोर होगी।