10 अगस्त 2026
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ऑपरेशन टाइगर: शिंदे गुट में शामिल हुए यूबीटी के 6 सांसद, लोकसभा में उद्धव की ताकत 9 से घटकर 3

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ऑपरेशन टाइगर: शिंदे गुट में शामिल हुए यूबीटी के 6 सांसद, लोकसभा में उद्धव की ताकत 9 से घटकर 3

सारांश

एकनाथ शिंदे के 'ऑपरेशन टाइगर' ने उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) को लोकसभा में हाशिये पर धकेल दिया — 9 सांसदों में से 6 एक झटके में शिंदे खेमे में। विकास निधि की राजनीति और आंतरिक कलह ने इस टूट को जन्म दिया।

मुख्य बातें

22 जून 2026 को 'ऑपरेशन टाइगर' के तहत शिवसेना (यूबीटी) के 6 लोकसभा सांसद एकनाथ शिंदे के गुट में शामिल हुए।
लोकसभा में शिंदे गुट की संख्या 7 से बढ़कर 13 और यूबीटी की संख्या 9 से घटकर 3 हो गई।
बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर अलग गुट की मान्यता माँगी; दलबदल विरोधी कानून की दो-तिहाई सीमा पूरी की।
बागियों ने विपक्ष में रहने के कारण निर्वाचन क्षेत्रों में ₹5 करोड़ एमपीएलएडी तक सीमित रहने और विकास निधि न मिलने को कारण बताया।
ओमराजे निंबालकर के दलबदल के पीछे पिता की हत्या मामले में आरोपियों के बरी होने और सीबीआई अपील के आश्वासन की भी भूमिका बताई जा रही है।
उद्धव ठाकरे ने यवतमाल, वाशिम और हिंगोली से राज्यव्यापी जनसंपर्क अभियान शुरू किया।

महाराष्ट्र की राजनीति में 22 जून 2026 को एक बड़ा भूचाल आया, जब उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की शिवसेना ने 'ऑपरेशन टाइगर' को सफलतापूर्वक अंजाम देते हुए शिवसेना (यूबीटी) के 6 लोकसभा सांसदों को अपने गुट में शामिल कर लिया। इस राजनीतिक उलटफेर के बाद उद्धव ठाकरे की पार्टी की संसदीय संख्या 9 से घटकर महज 3 रह गई है।

कौन हैं छह बागी सांसद

शिंदे गुट में शामिल होने वाले छह सांसदों में ओमप्रकाश भूपालसिंह उर्फ ओमराजे निंबालकर (धाराशिव/उस्मानाबाद), नागेश बापुराव पाटिल आष्टीकर (हिंगोली), संजय हरिभाऊ जाधव (परभणी), संजय उत्तमराव देशमुख (यवतमाल-वाशिम), भाऊसाहेब राजाराम वाकचौरे (शिरडी) और संजय दीना पाटिल (मुंबई उत्तर पूर्व) शामिल हैं। उद्धव ठाकरे के साथ केवल तीन सांसद बचे हैं — अरविंद सावंत (मुंबई दक्षिण), अनिल देसाई (मुंबई दक्षिण मध्य) और राजभाऊ वाजे (नासिक)।

दलबदल विरोधी कानून से कैसे बचे

दिल्ली में आयोजित शिवसेना (यूबीटी) की संसदीय दल की बैठक में 9 में से 6 सांसदों की अनुपस्थिति ने दरार के संकेत पहले ही दे दिए थे। इसके बाद बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर अलग गुट के रूप में मान्यता देने का अनुरोध किया। गौरतलब है कि दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता से बचने के लिए किसी दल के कम-से-कम दो-तिहाई सांसदों का एकसाथ आना अनिवार्य है — और छह सांसदों ने मिलकर यह सीमा पार कर ली।

बागियों ने क्यों छोड़ा उद्धव का साथ

नागेश आष्टीकर और ओमराजे निंबालकर ने स्वीकार किया कि विपक्ष में रहने के कारण पिछले दो वर्षों में उनके निर्वाचन क्षेत्रों को विकास निधि से वंचित रहना पड़ा। उनके अनुसार, ₹5 करोड़ की सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (एमपीएलएडी) पर्याप्त नहीं थी और राज्य-समर्थित निधि के अभाव में उनका जमीनी प्रभाव कमजोर पड़ रहा था। आष्टीकर ने फेसबुक लाइव के माध्यम से कहा कि उद्धव ठाकरे के प्रति उनके मन में कोई व्यक्तिगत दुर्भावना नहीं है, किंतु दिल्ली बैठक में अनुपस्थित रहने के बाद संजय राउत जैसे वरिष्ठ नेताओं द्वारा प्रदर्शित 'अपमानजनक भाषा' और अविश्वास से वे आहत थे।

निंबालकर के दलबदल की अलग पृष्ठभूमि

ओमराजे निंबालकर का यह कदम उस समय आया जब सत्र न्यायालय ने उनके पिता पवनराजे निंबालकर की हत्या के आरोपियों को बरी कर दिया। निंबालकर ने बताया कि उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से उनकी मुलाकात करवाई और उन्हें आश्वासन दिया कि सीबीआई इस फैसले के खिलाफ अपील करेगी।

उद्धव का पलटवार और आगे की राह

उद्धव ठाकरे ने नुकसान की भरपाई के लिए राज्यव्यापी जनसंपर्क अभियान शुरू किया है, जिसकी शुरुआत बागी सांसदों के निर्वाचन क्षेत्रों — यवतमाल, वाशिम और हिंगोली — से की गई है। उन्होंने दलबदलुओं पर चुनाव के बाद 'खुद को बेचने' का आरोप लगाया। यह ऐसे समय में आया है जब महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन अपनी स्थिति और मजबूत करने की कोशिश में है, और विपक्षी महा विकास आघाड़ी (MVA) के भीतर एकजुटता पर सवाल उठ रहे हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि जमीन पर है — क्या वे बचे तीन सांसदों और राज्य विधायकों के बल पर अपनी पार्टी की स्वतंत्र पहचान बनाए रख सकते हैं? दलबदल विरोधी कानून की दो-तिहाई सीमा का बार-बार इस्तरह उपयोग यह भी सवाल उठाता है कि क्या यह कानून अपने मूल उद्देश्य — राजनीतिक स्थिरता — को पूरा कर पा रहा है।
RashtraPress
10 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'ऑपरेशन टाइगर' क्या है और इसका महाराष्ट्र की राजनीति पर क्या असर पड़ा?
'ऑपरेशन टाइगर' उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की शिवसेना द्वारा चलाया गया वह अभियान है जिसके तहत 22 जून 2026 को शिवसेना (यूबीटी) के 6 लोकसभा सांसदों को शिंदे गुट में शामिल कराया गया। इससे लोकसभा में उद्धव ठाकरे की पार्टी की संख्या 9 से घटकर 3 रह गई।
कौन से 6 सांसद शिंदे गुट में शामिल हुए?
ओमराजे निंबालकर (धाराशिव), नागेश आष्टीकर (हिंगोली), संजय जाधव (परभणी), संजय देशमुख (यवतमाल-वाशिम), भाऊसाहेब वाकचौरे (शिरडी) और संजय दीना पाटिल (मुंबई उत्तर पूर्व) — ये छह सांसद औपचारिक रूप से शिंदे गुट में शामिल हुए। उद्धव ठाकरे के साथ अरविंद सावंत, अनिल देसाई और राजभाऊ वाजे बचे हैं।
दलबदल विरोधी कानून के बावजूद ये सांसद अयोग्य क्यों नहीं हुए?
दलबदल विरोधी कानून के अनुसार, अयोग्यता से बचने के लिए किसी दल के कम-से-कम दो-तिहाई सांसदों का एकसाथ दलबदल करना जरूरी है। यूबीटी के 9 में से 6 सांसदों ने एकसाथ शिंदे गुट का दामन थामा, जो दो-तिहाई की सीमा पूरी करता है, इसलिए वे अयोग्यता से बच गए।
बागी सांसदों ने उद्धव ठाकरे का साथ छोड़ने का क्या कारण बताया?
बागी सांसदों ने कहा कि विपक्ष में रहने के कारण पिछले दो वर्षों में उनके निर्वाचन क्षेत्रों को राज्य-समर्थित विकास निधि नहीं मिली और ₹5 करोड़ की एमपीएलएडी राशि पर्याप्त नहीं थी। इसके अलावा नागेश आष्टीकर ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की 'अपमानजनक भाषा' और आंतरिक अविश्वास को भी कारण बताया।
उद्धव ठाकरे इस राजनीतिक झटके के बाद क्या कर रहे हैं?
उद्धव ठाकरे ने बागी सांसदों के निर्वाचन क्षेत्रों — यवतमाल, वाशिम और हिंगोली — से शुरुआत करते हुए राज्यव्यापी जनसंपर्क अभियान शुरू किया है। उन्होंने दलबदलुओं पर चुनाव के बाद 'खुद को बेचने' का आरोप लगाया है।
राष्ट्र प्रेस
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