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संजय राउत का बागी सांसदों पर तंज: 'बाज़ार में खड़े थे, बिक गए'; ₹25 करोड़ सेटलमेंट का दावा

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संजय राउत का बागी सांसदों पर तंज: 'बाज़ार में खड़े थे, बिक गए'; ₹25 करोड़ सेटलमेंट का दावा

सारांश

शिवसेना के 60वें स्थापना दिवस पर उद्धव गुट में दूसरी बड़ी टूट — छह सांसद शिंदे खेमे में। संजय राउत ने इसे 'सौदेबाजी' करार दिया और दावा किया कि हर बागी सांसद को ₹25 करोड़ के वादे से शांत किया गया। महाराष्ट्र की राजनीति में यह वफादारी का नहीं, बोली का खेल है।

मुख्य बातें

शिवसेना (यूबीटी) के छह लोकसभा सांसदों ने एकनाथ शिंदे गुट में शामिल होने का फैसला किया — यह चार वर्षों में दूसरी बड़ी टूट है।
बागी सांसदों में संजय दीना पाटिल , संजय देशमुख , नागेश पाटिल अष्टिकर , संजय जाधव , भाऊसाहेब वाकचौरे और ओमप्रकाश राजेनिंबालकर शामिल हैं।
संजय राउत ने दावा किया कि नाराज सांसदों को शांत करने के लिए प्रत्येक को ₹25 करोड़ अतिरिक्त देने का वादा किया गया — यह आरोप अभी स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं हुआ है।
सभी छह सांसदों ने पार्टी के 'थ्री-लाइन व्हिप' का उल्लंघन करते हुए दिल्ली की अहम संसदीय बैठक में हिस्सा नहीं लिया।
शिवसेना (यूबीटी) ने छह सांसदों को कारण बताओ नोटिस जारी कर संसदीय सदस्यता रद्द करने की प्रक्रिया शुरू की।
राउत ने चेतावनी दी कि ED-CBI की कार्रवाई रुके तो महाराष्ट्र में BJP सात टुकड़ों में बंट जाएगी।

शिवसेना (यूबीटी) के वरिष्ठ सांसद और मुख्य प्रवक्ता संजय राउत ने शुक्रवार, 20 जून 2025 को पार्टी छोड़कर एकनाथ शिंदे गुट में शामिल हुए छह बागी लोकसभा सांसदों पर तीखा हमला बोला। राउत ने आरोप लगाया कि इन सांसदों ने अपनी राजनीतिक वफादारी की बोली लगवाई और कैबिनेट पद को लेकर हुए विवाद के बाद उन्हें शांत करने के लिए आधी रात को वित्तीय समझौता करना पड़ा।

मुख्य घटनाक्रम

शिवसेना के 60वें स्थापना दिवस के अवसर पर उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले गुट को उस समय बड़ा झटका लगा जब छह लोकसभा सांसदोंसंजय दीना पाटिल, संजय देशमुख, नागेश पाटिल अष्टिकर, संजय जाधव, भाऊसाहेब वाकचौरे और ओमप्रकाश राजेनिंबालकर — ने महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के गुट में शामिल होने का फैसला किया। यह चार वर्षों के भीतर शिवसेना (यूबीटी) में दूसरी बड़ी टूट है। इन सांसदों ने पार्टी के कड़े 'थ्री-लाइन व्हिप' के बावजूद दिल्ली में हुई एक अहम संसदीय बैठक में हिस्सा नहीं लिया था।

राउत के गंभीर आरोप

राउत ने इस घटनाक्रम को 'बंटवारा' मानने से साफ इनकार किया। उन्होंने कहा, 'वे खुद को बेचने के लिए बाज़ार में खड़े थे।' उनके शब्दों में, 'कोई व्यक्ति तब पार्टी छोड़ता है जब वह किसी विचारधारा से जुड़ा हो। जब कोई खुद को बेचने के लिए बाज़ार में खड़ा हो और कोई उसे खरीद ले, तो इसे सौदेबाजी कहते हैं, बंटवारा नहीं। हमारे छह लोग दो दिन पहले बाजार में खड़े थे, उन्होंने खुद पर कीमत का टैग लगाया और बिक गए। वे किसी महान क्रांतिकारी सोच की वजह से पार्टी छोड़कर नहीं गए हैं।'

राउत ने दावा किया कि केंद्र सरकार में मंत्री पद को लेकर अंदरूनी कलह के बाद, शेष पाँच नाराज सांसदों को शांत करने के लिए आधी रात को एक वित्तीय समझौता हुआ। उनके अनुसार, प्रत्येक सांसद को अगले एक वर्ष में ₹25 करोड़ अतिरिक्त देने का वादा किया गया, बशर्ते वे सार्वजनिक रूप से कोई हंगामा न करें। यह आरोप राउत ने लगाए हैं और इनकी स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।

सुरक्षा और जवाबदेही पर सवाल

राउत ने यह भी सवाल उठाया कि ये सांसद अभी भारी पुलिस सुरक्षा के बीच कहीं छिपे हुए हैं। उन्होंने कहा, 'अगर आपने कोई अपराध या पाप नहीं किया है, तो आपको पुलिस के इतने बड़े दस्ते की क्या जरूरत है? क्या महाराष्ट्र का गृह विभाग सिर्फ गद्दारों की सुरक्षा के लिए है, जबकि महिलाओं के खिलाफ अपराध बढ़ रहे हैं?'

भाजपा और ईडी-सीबीआई पर निशाना

राउत ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) पर भी हमला बोला। उन्होंने एक वरिष्ठ BJP नेता के उस दावे को खारिज किया जिसमें कहा गया था कि सांसद इसलिए पार्टी छोड़कर गए क्योंकि उद्धव ठाकरे कांग्रेस के साथ जुड़ गए थे। राउत ने तर्क दिया कि जब ये छह सांसद महा विकास अघाड़ी (MVA) के बैनर तले चुनाव जीते थे, तब कांग्रेस गठबंधन का हिस्सा थी और उसके कार्यकर्ताओं ने इनके लिए काम किया था। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर प्रवर्तन निदेशालय (ED) और केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) जैसी जाँच एजेंसियों को आधे घंटे के लिए भी रोक दिया जाए, तो महाराष्ट्र में BJP सात टुकड़ों में बंट जाएगी और गिरीश महाजन सबसे पहले पार्टी छोड़ेंगे।

अनुशासनात्मक कार्रवाई और आगे की राह

शिवसेना (यूबीटी) ने अनुपस्थित छह सांसदों को उनकी संसदीय सदस्यता रद्द करने के लिए कारण बताओ नोटिस जारी किए हैं। राउत ने बागी सांसदों को सीधी चुनौती देते हुए कहा कि अगर उनमें जरा भी शर्म बची है, तो वे अपने सांसद पद से इस्तीफा दें और जनता का सामना करें। गौरतलब है कि शिवसेना स्थापना दिवस पर ठाकरे और शिंदे, दोनों गुट अलग-अलग बड़े कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं, जो महाराष्ट्र की राजनीति में गहरी दरार को उजागर करता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

प्रलोभन पार्टी बदलवाता है। असली सवाल यह है कि शिवसेना (यूबीटी) चार वर्षों में दूसरी बड़ी टूट क्यों नहीं रोक पाई — यह संगठनात्मक कमज़ोरी उद्धव ठाकरे की नेतृत्व क्षमता पर भी सवाल खड़े करती है। कारण बताओ नोटिस और इस्तीफे की माँग राजनीतिक दबाव की रणनीति है, कानूनी समाधान नहीं; असली परीक्षा अब अदालत और चुनाव आयोग में होगी।
RashtraPress
10 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शिवसेना (यूबीटी) के छह सांसदों ने पार्टी क्यों छोड़ी?
इन सांसदों ने केंद्र सरकार में कैबिनेट पद को लेकर हुए अंदरूनी विवाद के बाद एकनाथ शिंदे गुट में शामिल होने का फैसला किया। संजय राउत के अनुसार, यह किसी विचारधारा की वजह से नहीं, बल्कि राजनीतिक सौदेबाजी का नतीजा है।
संजय राउत ने ₹25 करोड़ सेटलमेंट का क्या दावा किया?
राउत ने आरोप लगाया कि शेष पाँच नाराज सांसदों को शांत करने के लिए आधी रात को एक वित्तीय समझौता हुआ, जिसमें प्रत्येक को अगले एक वर्ष में ₹25 करोड़ अतिरिक्त देने का वादा किया गया। यह दावा राउत का है और इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
शिवसेना (यूबीटी) ने बागी सांसदों के खिलाफ क्या कार्रवाई की?
पार्टी ने छह सांसदों को कारण बताओ नोटिस जारी किए हैं और उनकी संसदीय सदस्यता रद्द करने की प्रक्रिया शुरू की है। इन सांसदों ने पार्टी के 'थ्री-लाइन व्हिप' का उल्लंघन कर दिल्ली की अहम संसदीय बैठक में हिस्सा नहीं लिया था।
कौन-से छह सांसद शिंदे गुट में शामिल हुए?
संजय दीना पाटिल, संजय देशमुख, नागेश पाटिल अष्टिकर, संजय जाधव, भाऊसाहेब वाकचौरे और ओमप्रकाश राजेनिंबालकर — ये छह लोकसभा सांसद एकनाथ शिंदे के गुट में शामिल हुए हैं।
शिवसेना में यह कितनी बड़ी टूट है?
यह चार वर्षों के भीतर शिवसेना (यूबीटी) में दूसरी बड़ी टूट है। पहली टूट 2022 में हुई थी जब एकनाथ शिंदे ने बड़ी संख्या में विधायकों के साथ पार्टी छोड़ी थी, जिससे उद्धव ठाकरे सरकार गिर गई थी।
राष्ट्र प्रेस
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