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शिवसेना (यूबीटी) सांसदों के दलबदल पर ओम बिरला से मिले सावंत-देसाई, संविधान की 10वीं अनुसूची का दिया हवाला

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शिवसेना (यूबीटी) सांसदों के दलबदल पर ओम बिरला से मिले सावंत-देसाई, संविधान की 10वीं अनुसूची का दिया हवाला

सारांश

शिवसेना (यूबीटी) के अरविंद सावंत और अनिल देसाई ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मिलकर पार्टी के 9 सांसदों के कथित दलबदल पर संविधान की 10वीं अनुसूची का हवाला दिया। स्पीकर ने आश्वासन दिया कि फैसला संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार होगा; अब तक कोई औपचारिक पत्र नहीं मिला।

मुख्य बातें

शिवसेना (यूबीटी) नेता अरविंद सावंत और अनिल देसाई ने 24 जून 2025 को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात की।
पार्टी के 9 सांसद 2024 लोकसभा चुनाव में 'मशाल' चिह्न पर जीते थे; कथित दलबदल पर विवाद है।
18 जून को दोनों नेताओं ने स्पीकर को लिखित आवेदन देकर पार्टी का पक्ष सुने बिना निर्णय न लेने का आग्रह किया था।
देसाई ने संविधान की 10वीं अनुसूची का हवाला देते हुए कहा कि सांसदों का सीधा विलय संवैधानिक रूप से संभव नहीं।
लोकसभा अध्यक्ष के कार्यालय को अब तक संबंधित सांसदों की ओर से कोई औपचारिक पत्र नहीं मिला।
स्पीकर ने आश्वासन दिया कि निर्णय पूरी तरह संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर होगा।

शिवसेना (यूबीटी) के वरिष्ठ नेता अरविंद सावंत और अनिल देसाई ने 24 जून 2025 को नई दिल्ली में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात कर पार्टी के सांसदों के कथित दलबदल का मामला उनके समक्ष रखा। दोनों नेताओं ने स्पीकर से आग्रह किया कि इस विषय में कोई भी निर्णय संविधान और दलबदल विरोधी कानून के प्रावधानों के अनुरूप ही लिया जाए।

मुलाकात की पृष्ठभूमि

गौरतलब है कि 18 जून को सावंत और देसाई ने लोकसभा अध्यक्ष को एक लिखित आवेदन देकर अनुरोध किया था कि पार्टी का पक्ष सुने बिना इस मामले में कोई कदम न उठाया जाए। 2024 के लोकसभा चुनाव में शिवसेना (यूबीटी) के नौ सांसद पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न 'मशाल' पर जीतकर संसद पहुँचे थे — और यही इस विवाद की जड़ है।

संविधान की 10वीं अनुसूची का हवाला

बैठक के बाद पत्रकारों से बात करते हुए अनिल देसाई ने कहा कि संविधान की 10वीं अनुसूची में दलबदल को लेकर स्पष्ट प्रावधान हैं। उन्होंने कहा, 'किसी विधायक दल या सांसदों के समूह की संख्या चाहे कितनी भी हो, वह सीधे तौर पर किसी दूसरी पार्टी में विलय नहीं कर सकता।' देसाई ने यह भी बताया कि लोकसभा अध्यक्ष ने उन्हें आश्वस्त किया है कि जो भी फैसला होगा, वह पूरी तरह संवैधानिक प्रावधानों पर आधारित होगा।

स्पीकर कार्यालय का रुख

देसाई के अनुसार, स्पीकर कार्यालय ने मामले से जुड़े दस्तावेजों की जाँच करने और आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराने की बात कही है। यदि किसी सांसद की ओर से कोई औपचारिक आवेदन दिया गया है, तो उसमें रखी गई बातों की भी पड़ताल की जाएगी।

सावंत का बयान — औपचारिक पत्र अभी तक नहीं

अरविंद सावंत ने बताया कि बैठक के दौरान उन्होंने स्पीकर से पूछा कि क्या संबंधित सांसदों की ओर से कोई औपचारिक पत्र या आवेदन दिया गया है। सावंत के अनुसार, लोकसभा अध्यक्ष ने जानकारी दी कि उनके कार्यालय को अब तक इस संबंध में कोई औपचारिक पत्र प्राप्त नहीं हुआ है। सावंत ने कहा कि संविधान की रक्षा करना लोकसभा अध्यक्ष की संवैधानिक जिम्मेदारी है और किसी भी सांसद या समूह के दूसरी पार्टी में शामिल होने से पहले संवैधानिक प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है।

आगे की राह

शिवसेना (यूबीटी) नेता अब स्पीकर कार्यालय की प्रक्रिया आगे बढ़ने का इंतजार कर रहे हैं। पार्टी का स्पष्ट रुख है कि दलबदल के किसी भी मामले में अंतिम निर्णय संविधान और दलबदल विरोधी कानून के अनुसार ही होना चाहिए। यह मामला महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना के भीतर चल रहे दीर्घकालिक विभाजन की पृष्ठभूमि में और अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जिसे सर्वोच्च न्यायालय भी अनसुलझा छोड़ चुका है। 10वीं अनुसूची की व्याख्या को लेकर लोकसभा अध्यक्ष का निर्णय एक नज़ीर बन सकता है। विडंबना यह है कि जिस स्पीकर पद से निष्पक्षता की अपेक्षा होती है, वह स्वयं सत्तारूढ़ गठबंधन का हिस्सा है — और यूबीटी उसी गठबंधन के विरोध में है। बिना औपचारिक पत्र के प्रक्रिया का 'इंतजार' करना यूबीटी की रणनीति है, लेकिन असली परीक्षा तब होगी जब स्पीकर कार्यालय दस्तावेजों की जाँच पूरी करेगा।
RashtraPress
10 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शिवसेना (यूबीटी) सांसदों का दलबदल विवाद क्या है?
2024 के लोकसभा चुनाव में शिवसेना (यूबीटी) के 9 सांसद पार्टी के 'मशाल' चिह्न पर जीतकर आए थे। कथित तौर पर इनमें से कुछ सांसदों के किसी अन्य पार्टी में शामिल होने की बात सामने आई, जिस पर यूबीटी नेताओं ने दलबदल विरोधी कानून के तहत कार्रवाई की माँग की है।
संविधान की 10वीं अनुसूची दलबदल के मामले में क्या कहती है?
संविधान की 10वीं अनुसूची के अनुसार, कोई भी सांसद या विधायक सीधे किसी दूसरी पार्टी में विलय नहीं कर सकता। किसी भी बदलाव के लिए निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है, अन्यथा संबंधित सदस्य की सदस्यता रद्द हो सकती है।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने यूबीटी नेताओं को क्या आश्वासन दिया?
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने अरविंद सावंत और अनिल देसाई को आश्वस्त किया कि इस मामले में जो भी निर्णय लिया जाएगा, वह पूरी तरह संविधान के नियमों और प्रावधानों के आधार पर होगा। उन्होंने यह भी बताया कि अब तक संबंधित सांसदों की ओर से कोई औपचारिक पत्र कार्यालय को नहीं मिला है।
यूबीटी नेताओं ने लोकसभा अध्यक्ष को पहले कब संपर्क किया था?
शिवसेना (यूबीटी) नेता अरविंद सावंत और अनिल देसाई ने 18 जून को लोकसभा अध्यक्ष को लिखित आवेदन देकर अनुरोध किया था कि पार्टी का पक्ष सुने बिना इस मामले में कोई फैसला न लिया जाए। 24 जून की बैठक उसी प्रक्रिया की अगली कड़ी थी।
इस मामले में आगे क्या होगा?
स्पीकर कार्यालय मामले से जुड़े दस्तावेजों की जाँच करेगा और आवश्यक जानकारी एकत्र करेगा। यदि कोई औपचारिक आवेदन प्राप्त होता है, तो उसकी भी पड़ताल की जाएगी। शिवसेना (यूबीटी) नेता इस प्रक्रिया के आगे बढ़ने का इंतजार कर रहे हैं।
राष्ट्र प्रेस
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