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शिंदे गुट पर दलबदल कानून लागू हो, अयोग्य घोषित किया जाए: अरविंद सावंत

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शिंदे गुट पर दलबदल कानून लागू हो, अयोग्य घोषित किया जाए: अरविंद सावंत

सारांश

शिवसेना (UBT) सांसद अरविंद सावंत ने सर्वोच्च न्यायालय में जारी सुनवाई के बाद स्पष्ट किया — दलबदल कानून शिंदे गुट पर भी लागू होता है और उन्हें अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए। उन्होंने चुनाव आयोग के फैसले को असंवैधानिक बताया और कहा कि पार्टी का अर्थ सिर्फ विधायक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय और राज्य स्तर की कार्यकारिणी होती है।

मुख्य बातें

अरविंद सावंत ने कहा कि कपिल सिब्बल के तर्कों से साबित होता है कि दलबदल कानून एकनाथ शिंदे गुट पर भी लागू होता है।
सावंत ने चुनाव आयोग (ECI) के शिवसेना चिह्न और नाम शिंदे गुट को सौंपने के फैसले को असंवैधानिक बताया।
उन्होंने कहा — संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत 'दो-तिहाई' का अर्थ दो-तिहाई राजनीतिक पार्टी है, न कि केवल सांसद या विधायक।
अनिल देसाई और सावंत ने मिलकर चुनाव आयोग को पत्र लिखकर फैसले को असंवैधानिक बताया था।
सावंत ने बालासाहेब ठाकरे द्वारा गोपीनाथ मुंडे को पार्टी न छोड़ने की सलाह देने का भी उल्लेख किया।

सर्वोच्च न्यायालय में शिवसेना के पार्टी चिह्न और नाम को लेकर जारी सुनवाई के बीच शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के सांसद अरविंद सावंत ने 17 अगस्त को स्पष्ट रूप से कहा कि एकनाथ शिंदे गुट पर दलबदल कानून लागू होता है और उन्हें अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए। उन्होंने वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल द्वारा कोर्ट में रखे गए तर्कों को 'संतोषजनक' बताया और चुनाव आयोग के फैसले को बड़ी संवैधानिक चूक करार दिया।

सावंत का मुख्य तर्क: पार्टी सिर्फ विधायकों से नहीं बनती

सावंत ने जोर देकर कहा कि चुनाव आयोग (ECI) ने पार्टी का चिह्न और नाम शिंदे गुट को सौंपकर गलती की। उनके शब्दों में, 'पार्टी का मतलब विधायक तो नहीं है। पार्टी की कार्यकारिणी राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर होती है।' उन्होंने कहा कि यह पूरा मामला संविधान के तहत तय किए गए मानकों के अनुरूप नहीं है।

सावंत ने यह भी कहा कि उन्होंने और अनिल देसाई ने मिलकर चुनाव आयोग को एक पत्र दिया था, जिसमें इस फैसले को असंवैधानिक बताया गया था। उनका कहना था कि संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत 'दो-तिहाई' का अर्थ केवल सांसद या विधायक नहीं, बल्कि दो-तिहाई राजनीतिक पार्टी है।

दलबदल कानून और अयोग्यता की माँग

सावंत ने कहा कि कपिल सिब्बल ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष कई कानूनी मिसालों का हवाला देते हुए साबित किया है कि दलबदल कानून शिंदे गुट पर भी लागू होता है। उन्होंने कहा, 'उन्हें तब अयोग्य घोषित नहीं किया गया था, लेकिन अब किया जाना चाहिए।'

उनके अनुसार, पार्टी विभाजन तभी वैध माना जा सकता है जब पार्टी स्वयं यह निर्णय ले और उसके दो-तिहाई पदाधिकारी — ऑफिस बेयरर्स से लेकर सांसद और विधायक तक — उसे मंजूरी दें।

गोपीनाथ मुंडे विवाद पर प्रतिक्रिया

सावंत ने कांग्रेस नेता पृथ्वीराज चव्हाण द्वारा दिवंगत भारतीय जनता पार्टी (BJP) नेता गोपीनाथ मुंडे पर दिए गए बयान पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि बालासाहेब ठाकरे ने स्वयं मुंडे को पार्टी न छोड़ने की सलाह दी थी — यह इस बहस में एक अलग ऐतिहासिक संदर्भ जोड़ता है।

आगे क्या होगा

यह ऐसे समय में आया है जब सर्वोच्च न्यायालय में शिवसेना के पार्टी चिह्न और नाम को लेकर सुनवाई अहम मोड़ पर है। गौरतलब है कि यह मामला महाराष्ट्र की राजनीति में सत्ता और वैधता के सवाल को सीधे प्रभावित करता है। अगली सुनवाई में न्यायालय का रुख यह तय करेगा कि दलबदल कानून की व्याख्या किस दिशा में जाती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

क्योंकि 'दो-तिहाई पार्टी' की परिभाषा पर भारतीय न्यायशास्त्र में अभी तक स्पष्टता नहीं है। चुनाव आयोग के फैसले को 'गलत' बताना राजनीतिक रूप से सुविधाजनक है, लेकिन आयोग ने भी अपनी प्रक्रिया के तहत निर्णय लिया था। यह मामला भविष्य में दलबदल कानून की सीमाओं को फिर से परिभाषित कर सकता है।
RashtraPress
18 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अरविंद सावंत ने शिंदे गुट की अयोग्यता पर क्या कहा?
सावंत ने कहा कि कपिल सिब्बल के तर्कों से साबित होता है कि दलबदल कानून शिंदे गुट पर भी लागू होता है और उन्हें अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए। उनके अनुसार, उन्हें पहले अयोग्य नहीं किया गया था, लेकिन अब यह होना चाहिए।
शिवसेना पार्टी चिह्न विवाद क्या है?
2022 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बड़ी संख्या में विधायकों के अलग होने के बाद चुनाव आयोग ने शिवसेना का नाम और चुनाव चिह्न (धनुष-बाण) शिंदे गुट को सौंप दिया। उद्धव ठाकरे गुट ने इस फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी है।
दसवीं अनुसूची और 'दो-तिहाई' का नियम क्या है?
संविधान की दसवीं अनुसूची दलबदल विरोधी कानून से संबंधित है। सावंत का तर्क है कि इसके तहत 'दो-तिहाई' का अर्थ केवल सांसद या विधायक नहीं, बल्कि पूरी दो-तिहाई राजनीतिक पार्टी — यानी पदाधिकारी, सांसद और विधायक सभी — होना चाहिए।
चुनाव आयोग के फैसले पर उद्धव गुट की क्या आपत्ति है?
उद्धव गुट का कहना है कि चुनाव आयोग ने पार्टी चिह्न सौंपते समय केवल विधायकों की संख्या देखी, जबकि पार्टी की राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय कार्यकारिणी को नजरअंदाज किया। सावंत और अनिल देसाई ने इसे असंवैधानिक बताते हुए आयोग को पत्र भी लिखा था।
इस मामले में आगे क्या होने की संभावना है?
सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई जारी है और अदालत का फैसला यह तय करेगा कि दलबदल कानून शिंदे गुट पर लागू होता है या नहीं। यह निर्णय महाराष्ट्र की राजनीति और भविष्य में पार्टी विभाजन के मामलों पर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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