सामना संपादकीय: 'संवाद बंद हुआ तो तानाशाही गिरती है' — शिवसेना (यूबीटी) का केंद्र पर सीधा हमला
सारांश
मुख्य बातें
शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने 22 जुलाई को अपने मुखपत्र 'सामना' के संपादकीय में केंद्र सरकार पर तीखा प्रहार करते हुए आरोप लगाया कि नई दिल्ली में हाल में हुए युवा विरोध प्रदर्शनों के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार अपने 'पतन के दौर' में प्रवेश कर चुकी है। संपादकीय में कहा गया कि जनता से संवाद स्थापित करने के बजाय सरकार बल प्रयोग का मार्ग अपना रही है, जो किसी भी शासन के लिए सबसे घातक संकेत होता है।
प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज और सरकार की कार्यशैली
संपादकीय में दावा किया गया कि पुलिस ने सड़कों पर प्रदर्शनकारियों पर लाठियाँ बरसाईं, लेकिन वे शांतिपूर्वक डटे रहे और पीछे नहीं हटे। इसमें कहा गया, 'जब ऐसे प्रदर्शनकारी पैदा हो जाते हैं, जो कहते हैं कि और मारो, लेकिन हम यहाँ से नहीं हटेंगे, तब तानाशाह उनका क्या बिगाड़ सकते हैं?' शिवसेना (यूबीटी) ने आरोप लगाया कि सोमवार को दिल्ली की सड़कों पर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में 'सरकारी दमन' का नजारा देखने को मिला।
संपादकीय के अनुसार, एक ओर प्रधानमंत्री को वैश्विक मंचों पर 'विश्वगुरु' के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, वहीं दूसरी ओर दिल्ली में युवा प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध प्रशासनिक कड़ाई सरकार की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है।
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग
शिवसेना (यूबीटी) ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का मुद्दा भी उठाया। संपादकीय में कहा गया कि मौजूदा युवा असंतोष के बीच उनसे इस्तीफा लेना आसान था, लेकिन प्रधानमंत्री ऐसा नहीं कर रहे। पार्टी ने दावा किया कि यदि एक मंत्री का इस्तीफा लिया गया, तो उसके बाद पूरी कैबिनेट में इस्तीफों की कतार लग सकती है।
भूमि अधिग्रहण और पर्यावरण विवाद
संपादकीय में देशभर में भूमि और पर्यावरण से जुड़े विवादों का भी उल्लेख किया गया। इसमें ऋषिकेश में पेड़ों की कटाई के विरुद्ध चल रहे आंदोलन, झारखंड और छत्तीसगढ़ में वन क्षेत्रों की कटाई तथा महाराष्ट्र के नासिक, अकोला, सोलापुर, भंडारा और बुलढाणा जिलों में भूमि अधिग्रहण, रिंग रोड निर्माण और अन्य बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं के विरोध में किसान आंदोलनों का जिक्र किया गया।
संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल
उद्धव ठाकरे की पार्टी ने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर कर रही है। संपादकीय में दावा किया गया कि न्यायपालिका में नियुक्तियाँ और चुनाव आयोग कार्यपालिका के प्रभाव में हैं। साथ ही महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की आलोचना करते हुए विधानसभा में विपक्ष के नेता की नियुक्ति न होने तथा संसदीय कार्यवाही को लेकर भी सवाल उठाए गए।
ऐतिहासिक संदर्भ और आगे की चेतावनी
संपादकीय में लीबिया, बांग्लादेश और नेपाल में हुए छात्र एवं युवा आंदोलनों का उदाहरण देते हुए कहा गया कि इतिहास गवाह है — जब शासकों और जनता के बीच संवाद पूरी तरह समाप्त हो जाता है, तब नागरिक असंतोष बढ़ता है और तानाशाही शासन का पतन होता है।
शिवसेना (यूबीटी) ने कहा, 'राजनीति में संवाद सबसे जरूरी होता है, लेकिन BJP और जनता के बीच संवाद खत्म हो चुका है। BJP के लिए मतदाता अब खरीदने की वस्तु बन गया है। 12 वर्षों तक इसी सोच के आधार पर चुनाव जीतने का दावा करने वाला अहंकार अब युवाओं के गुस्से के सामने धूल में मिल गया है।' यह ऐसे समय में आया है जब विपक्षी दलों ने केंद्र पर दबाव बनाने की रणनीति और तेज कर दी है।