तुनहुआंग में तीसरा विश्व सिनोलॉजिस्ट सम्मेलन: 70 देशों के 300 से अधिक विद्वान चीनी सभ्यता पर मंथन
सारांश
मुख्य बातें
चीन के गानसू प्रांत के ऐतिहासिक शहर तुनहुआंग में तीसरा विश्व सिनोलॉजिस्ट सम्मेलन आयोजित हो रहा है, जिसमें लगभग 70 देशों के 300 से अधिक प्रतिनिधि चीनी और विदेशी सभ्यताओं के एकीकरण जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श कर रहे हैं। यह सम्मेलन वैश्विक विद्वानों को एक मंच पर लाने का अनूठा प्रयास है, जहाँ सांस्कृतिक संवाद के नए आयाम तलाशे जा रहे हैं।
उद्घाटन समारोह की मुख्य बातें
उद्घाटन समारोह में फ्रांस की सिनोलॉजिस्ट गुर्नी ने चीन के साथ अपने दीर्घकालिक संबंध साझा किए। उन्होंने विशेष रूप से 'सांस्कृतिक विरासत की वापसी पर कानून' का परिचय दिया, जिसे सांस्कृतिक अवशेषों को वापस करने की प्रक्रिया को सरल बनाने के उद्देश्य से मई 2026 में फ्रांस में लागू किया गया था। यह कानून अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक संरक्षण के क्षेत्र में एक उल्लेखनीय कदम माना जा रहा है।
सभ्यतागत संवाद पर विशेषज्ञों के विचार
सम्मेलन में उपस्थित अतिथियों ने कहा कि चीनी सभ्यता में निहित 'स्वर्ग के नीचे सभी एक परिवार हैं' और 'सद्भाव और सह-अस्तित्व' की अवधारणाएँ वर्तमान वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए महत्वपूर्ण सबक प्रदान करती हैं। विद्वानों का मत है कि ये प्राचीन मूल्य आज के भू-राजनीतिक तनावों के बीच प्रासंगिक बने हुए हैं।
चीन की वैश्विक सभ्यतागत पहल
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) केंद्रीय समिति के अंतर्राष्ट्रीय विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि वर्तमान में वैश्विक सभ्यतागत विभाजन बार-बार उभर रहे हैं। उन्होंने कहा कि चीन, चीनी और विदेशी सभ्यताओं के ज्ञान को एकत्रित कर दुनिया के लिए साझा समृद्धि प्राप्त करने के तरीके तलाशने हेतु सभी पक्षों के साथ मिलकर काम करने को तैयार है।
अनुभवात्मक गतिविधियाँ और सांस्कृतिक भ्रमण
सम्मेलन में भाग ले रहे सिनोलॉजिस्ट केवल शैक्षणिक चर्चाओं तक सीमित नहीं हैं — वे तुनहुआंग की ऐतिहासिक धरोहरों, गुफाओं और सांस्कृतिक स्थलों की यात्राओं के माध्यम से चीन की गहरी समझ भी हासिल कर रहे हैं। गौरतलब है कि तुनहुआंग प्राचीन सिल्क रोड का एक प्रमुख केंद्र रहा है और यहाँ की मोगाओ गुफाएँ यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल हैं।
आगे की राह
यह सम्मेलन ऐसे समय में आयोजित हो रहा है जब वैश्विक स्तर पर सांस्कृतिक कूटनीति को नई गति मिल रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मंच पूर्व-पश्चिम सांस्कृतिक संवाद को मजबूत करने में सहायक हो सकते हैं।