यूएन सुरक्षा परिषद की अफगानिस्तान पर खुली बैठक, चीन ने महिला अधिकारों और आतंकवाद पर दबाव बढ़ाया
सारांश
मुख्य बातें
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने 17 सितंबर 2026 को अफगानिस्तान की स्थिति पर एक खुली बैठक आयोजित की, जिसमें अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अफगान मुद्दे पर व्यापक और समन्वित दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान किया गया। बैठक में संयुक्त राष्ट्र में चीन के स्थायी प्रतिनिधि मंडल के कार्यवाहक प्रभारी सुन लेई ने अफगानिस्तान के साथ सद्भावपूर्ण संवाद जारी रखने और धैर्य के साथ कूटनीतिक प्रयास बढ़ाने पर ज़ोर दिया।
चीन का रुख और मुख्य आह्वान
सुन लेई ने कहा कि सभी पक्षों को अफगान सरकार के साथ अपने संपर्क और संवाद के परिणामों को संजोना चाहिए, सद्भावना बनाए रखनी चाहिए और धैर्य रखना चाहिए। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि अफगानिस्तान की राष्ट्रीय परिस्थितियों और विकास के चरण का सम्मान करते हुए पारस्परिक चिंता वाले मुद्दों पर व्यावहारिक संचार को मज़बूत किया जाए, ताकि आपसी विश्वास बढ़े और मतभेदों को सुलझाया जा सके।
चीनी प्रतिनिधि के अनुसार, इस प्रक्रिया का दीर्घकालिक लक्ष्य अफगानिस्तान का अंतरराष्ट्रीय समुदाय में क्रमिक एकीकरण सुनिश्चित करना है — एक ऐसा लक्ष्य जो 2021 में तालिबान के सत्ता में लौटने के बाद से वैश्विक कूटनीति की केंद्रीय चुनौती बना हुआ है।
महिलाओं के अधिकार: चीन का आग्रह
चीनी पक्ष ने अफगान सरकार से सभी अफगान नागरिकों, जिनमें महिलाएँ भी शामिल हैं, के मूलभूत अधिकारों की गारंटी देने का स्पष्ट आग्रह किया। यह उल्लेखनीय है, क्योंकि तालिबान शासन के तहत महिलाओं की शिक्षा और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी पर लगाई गई पाबंदियाँ अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय रही हैं।
आतंकवाद विरोधी सहयोग पर ज़ोर
चीन ने अफगानिस्तान से आतंकवाद विरोधी प्रयासों को तेज़ करने और अफगान सीमाओं के भीतर सभी आतंकवादी ताकतों को जल्द से जल्द समाप्त करने का आग्रह किया। साथ ही, क्षेत्रीय देशों के साथ आतंकवाद-विरोधी संवाद और सहयोग को और मज़बूत बनाने की अपील भी की गई। गौरतलब है कि चीन की सीमा अफगानिस्तान से लगती है और वह पूर्वी तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट (ETIM) जैसे समूहों की गतिविधियों को लेकर विशेष रूप से चिंतित रहा है।
व्यापक संदर्भ: अफगानिस्तान की अंतरराष्ट्रीय स्थिति
यह बैठक ऐसे समय में आई है जब तालिबान शासित अफगानिस्तान को किसी भी देश ने आधिकारिक तौर पर मान्यता नहीं दी है। मानवीय संकट, आर्थिक अलगाव और महिला अधिकारों पर पाबंदियाँ अंतरराष्ट्रीय संबंधों में सबसे बड़ी बाधा बनी हुई हैं। संयुक्त राष्ट्र की विशेष दूत की रिपोर्टें लगातार अफगान आबादी की बिगड़ती स्थिति को रेखांकित करती रही हैं।
इस पृष्ठभूमि में चीन का यह बयान, धैर्य और संवाद पर बल देते हुए, पश्चिमी देशों के अधिक कठोर रुख से अलग एक संतुलन-साधक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। आने वाले हफ्तों में सुरक्षा परिषद में अफगानिस्तान पर और बहस होने की संभावना है।