यूएनजीए में अंतरराष्ट्रीय कानून के दोहरे मानदंडों पर विश्व नेताओं का एकजुट विरोध, मैक्रों बोले — 'न्याय के बिना शांति नहीं'
सारांश
मुख्य बातें
संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) के मंच से 27 सितंबर 2026 को यूरोप, मध्य पूर्व, अफ्रीका और कैरेबियन के दर्जनों नेताओं ने एक स्वर में चेतावनी दी कि अंतरराष्ट्रीय कानून को चुनिंदा तरीके से लागू करने की प्रवृत्ति वैश्विक व्यवस्था की नींव खोखली कर रही है। नेताओं का कहना था कि युद्ध रोकने और सरकारों को जवाबदेह ठहराने के लिए बनाई गई संस्थाओं पर भरोसा तेज़ी से घट रहा है।
मुख्य घटनाक्रम: किसने क्या कहा
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा कि दुनिया के सामने विकल्प साफ है — या तो अंतरराष्ट्रीय न्याय की राह चुनें, या उस व्यवस्था की ओर लौटें जहाँ केवल ताकत मायने रखती है। उन्होंने कहा, 'न्याय के बिना शांति नहीं हो सकती।' मैक्रों ने इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस (आईसीजे) के प्रति अपना समर्थन दोहराया और उस व्यवस्था की आलोचना की जहाँ, उनके शब्दों में, 'गलत काम करने वालों को सजा का डर नहीं रह जाता।'
कतर के अमीर शेख तमीम बिन हमद अल थानी ने कहा कि जब तक फिलिस्तीन के मुद्दे को नज़रअंदाज़ किया जाता रहेगा, दुनिया में न्यायपूर्ण अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था संभव नहीं है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि कानून सभी पर समान रूप से लागू होना चाहिए।
जॉर्डन के राजा अब्दुल्ला द्वितीय ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय के पास प्रतिबंध लगाने, संपत्तियाँ फ्रीज़ करने, व्यापारिक पाबंदियाँ थोपने और कूटनीतिक अलगाव के कई औज़ार मौजूद हैं — लेकिन उनके अनुसार, इजरायल की कार्रवाइयों के मामले में इनका 'लगातार और एकसमान इस्तेमाल नहीं किया गया।' उन्होंने व्यंग्यात्मक अंदाज़ में कहा कि 'प्रस्ताव वहीं खत्म हो जाते हैं जहाँ से शुरू होते हैं — कागज पर।'
अफ्रीका और वैश्विक दक्षिण की आवाज़
घाना के राष्ट्रपति जॉन महामा ने खुलकर चेतावनी दी कि दुनिया 'एकतरफा फैसलों, कानून की अनदेखी और बहुपक्षीय नियमों के कमजोर होने की खतरनाक दिशा' में जा रही है। उन्होंने इजरायल और फिलिस्तीन के लिए टू-स्टेट सॉल्यूशन का समर्थन किया, हमास की आतंकवादी कार्रवाइयों की निंदा की और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की कि 'आम नागरिकों की तकलीफ को कूटनीतिक भाषा के पीछे छिपाना बंद किया जाए।'
गुयाना के राष्ट्रपति इरफान अली ने कहा कि जलवायु आपदाएँ, खाद्य असुरक्षा और संघर्ष सभी गंभीर हैं, लेकिन बहुपक्षीय व्यवस्था का कमज़ोर होना 'संभवतः सबसे ज़्यादा चिंता की बात' है।
संस्थागत सुधार के प्रस्ताव
स्लोवेनिया के प्रधानमंत्री जनेज जान्शा ने एक स्वतंत्र निगरानी व्यवस्था बनाने का प्रस्ताव दिया, जो यह आकलन करे कि किसी संकट पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने कूटनीतिक, मानवीय और कानूनी स्तर पर क्या कदम उठाए। उनका उद्देश्य, उनके अनुसार, 'राजनीतिक नतीजे थोपना नहीं बल्कि यह पता लगाना है कि क्या अलग-अलग मामलों में चुनिंदा तरीके से कार्रवाई हो रही है।'
नीदरलैंड के प्रधानमंत्री रॉब जेटन ने इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट (आईसीसी) को कमज़ोर करने की कोशिशों का विरोध किया। उन्होंने कहा कि इस अदालत की नींव न्यूरेमबर्ग और टोक्यो के ऐतिहासिक मुकदमों की विरासत पर रखी गई थी। जेटन ने मध्यम शक्ति वाले देशों से जवाबदेही की इस व्यवस्था को बचाने में सक्रिय भूमिका निभाने की अपील की।
इजरायल और फिलिस्तीन का पक्ष
इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि इजरायलियों के खिलाफ होने वाले हमलों पर अंतरराष्ट्रीय मीडिया पर्याप्त ध्यान नहीं देता, जबकि इजरायली सेटलर्स की कथित हिंसा को अनुपातहीन कवरेज मिलती है। उन्होंने इजरायल की सैन्य कार्रवाइयों को 7 अक्टूबर को हमास के हमले और ईरान से उत्पन्न खतरों का जवाब बताया।
फिलिस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास वीज़ा न मिलने के कारण न्यूयॉर्क नहीं पहुँच सके और उन्होंने रिकॉर्ड किए गए वीडियो संदेश के ज़रिए महासभा को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि मौजूदा संघर्ष फिलिस्तीनी लोगों के अस्तित्व और टू-स्टेट सॉल्यूशन, दोनों के लिए खतरा बन गया है।
भारत का रुख और आगे की राह
यह ऐसे समय में आया है जब भारत लगातार संयुक्त राष्ट्र चार्टर, विवादों के शांतिपूर्ण समाधान और संप्रभुता के सम्मान का समर्थन करता रहा है। भारत का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में ग्लोबल साउथ को उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए और वैश्विक नियम सभी देशों पर एकसमान रूप से लागू होने चाहिए — तभी बहुपक्षीय व्यवस्था पर भरोसा कायम रह सकता है।
स्विट्जरलैंड के राष्ट्रपति गाई पार्मेलिन ने सरकारों से अपील की कि आपसी संपर्क और संवाद के रास्ते बंद न किए जाएँ। उन्होंने कहा कि बातचीत के लिए हर मुद्दे पर सहमति जरूरी नहीं — लेकिन संपर्क बनाए रखना वार्ता की मेज पर वापसी का रास्ता खोलता है। महासभा के इस सत्र में उठे सवाल संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था के भविष्य को तय करने वाली बहस की आहट हैं।